अध्याय-2: प्राणियों में पोषण
पोषण
सजीवों द्वारा भोजन ग्रहण करने एवं इसके उपयोग की विधि को पोषण कहते हैं। जिस प्रक्रिया से आपके भोजन और आहार के जो भी गुण व तत्व इत्यादि होते हैं वे आपके शरीर को प्राप्त होते हैं जैसे कि प्रोटीन (मांस पेशियों के विकास में सहायक) , कार्बोहायड्रेट( ऊर्जा देते हैं), विटामिन (रोग प्रतिरोधक क्षमता,आंखों, त्वचा, बालों, हड्डियों, नाखूनों का स्वास्थ्य आदि के लिए ज़िम्मेदार),खनिज एवं लवण (हड्डियों, रक्त मज़्ज़ा के स्वास्थ्य एवं रक्तचाप नियंत्रण के लिए उपयोगी) उसे पोषण कहा जाता है तथा अंग्रेज़ी में न्यूट्रिशन(Nutrition)। इसके लिए पोषक तत्वों को भोजन में लेना ही नहीं बल्कि उनका अपनी आंतों के ज़रिए हमारे शरीर में जज़्ब (अब्सॉर्ब) होना भी ज़रूरी है।
पालन पोषण के अर्थ में जब पोषण शब्द का प्रयोग होता है तब उसका अर्थ होता है नरचरिंग (Nurturing) यानी किसी जीव (वनस्पति या जन्तु) की समुचित देखभाल करके उसे बड़ा करना। पालन यानी अपब्रिंगिंग (Upbringing) है।
भोजन कई रासायनिक पदार्थों के सम्मिश्रण से बना होता है।
- वसा
- प्रोटीन
- विटामिन
- कार्बोहाइड्रेट
- खनिज लवण
वसा
वसा कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन की तरह ही कार्बनिक योगिक होते हैं, जो प्रकृति में बहुतायत में उपलब्ध हैं, वसा गिलिसरीन (Glycerin) तथा वसीय अम्ल (fatty acids) का मिश्रण होता है।
जिन्हें छूने पर चिकनाई महसूस होती है। 1 ग्राम वसा से लगभग शरीर को 9 कैलोरी ऊर्जा की प्राप्ति होती है। वसा मुख्यत: प्राकृतिक तेल, सूरजमुखी, मूंगफली, पनीर दूध, मक्खन, मछली मांस में प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।
प्रोटीन
प्रोटीन भी एक प्रकार के कार्बनिक योगिक (Organic Compound) होते हैं, जो कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से मिलने से बनते हैं। प्रोटीन का हमारे आहार में सबसे प्रमुख स्थान होता है। क्योंकि यह शरीर की वृद्धि विकास (Growth development) और टूट-फूट की मरम्मत करने के लिए उत्तरदाई होता है। प्रोटीन के द्वारा ही रक्त मांसपेशियाँ, तंतु, त्वचा, बाल आदि निर्मित होते हैं।
इसलिए जीवित रहने के लिए प्रोटीन बहुत ही आवश्यक होती है। अधिकतर एंजाइम्स, हारमोंस, एंटीजन, एंटीबॉडी सब प्रोटीन के ही बने होते हैं।
प्रोटीन मुख्य रूप से दालों में अनाज में चावल में दूध में तथा मांसाहारी पदार्थ (Non-vegetarian food) में भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
विटामिन
विटामिन कार्बनिक पदार्थ होते हैं, जो शरीर में भोज्य पदार्थों के द्वारा पहुंचते हैं तथाअपनी उपस्थिति के कारण विभिन्न प्रकार की चयापचय क्रियाओं (Metabolic activities) में मदद करते हैं तथा शारीरिक वृद्धि तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विटामिन दो प्रकार के होते हैं, जल में घुलनशील विटामिन और वसा में घुलनशील विटामिन। जल में घुलनशील विटामिन विटामिन बी (Vitamin-B) और विटामिन सी (Vitamin-C) होते हैं, जबकि वसा में घुलनशील विटामिन विटामिन ए (Vitamin-A) विटामिन डी (Vitamin-D) विटामिन ई (Vitamin-E) विटामिन के (Vitamin-K) होते हैं।
यह सभी अस्थि, दातों, त्वचा, बाल, आंखों, संबंधी विभिन्न अंगों की क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए लाभदायक और महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं
कार्बोहाइड्रेट
कार्बोहाइड्रेट वे पोषक पदार्थ होते हैं, जिनका भोज्य पदार्थों में विशेष स्थान होता है। क्योंकि यह भारत ही नहीं बल्कि विश्व के सभी जीव जंतुओं का मुख्य पोषक पदार्थ (Main nutrients) होता है।
दैनिक कार्य करने के लिए, सभी प्रकार की गतिविधियों के लिए, कार्बोहाइड्रेट्स की अतुलनीय भूमिका होती है। कार्बोहाइड्रेट्स कार्बन (Carbon) हाइड्रोजन (Hydrogen) और ऑक्सीजन (Oxigen) से मिलकर बने होते हैं।
जिस में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अनुपात जल के समान अर्थात 2:1 होता है। कार्बोहाइड्रेट शरीर को लगभग 70% ऊर्जा (Energy) प्रदान करते हैं।
कार्बोहाइड्रेट्स, चावल, मक्का, गेहूं, बाजरा, चुकंदर, शकरकंद तथा विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थ में उपस्थित होता है। कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) तीन प्रकार का होता है।
● शुगर – जब हमारा पाचन तंत्र कार्बोहाइड्रेट को तोड़ता है, तो प्रतिक्रिया स्वरूप यह ग्लूकोज के रूप में परिविर्तत हो जाता है। शरीर इसका इस्तेमाल ऊर्जा के रूप में करता है।
खनिज लवण
वे अकार्बनिक पदार्थ जो हमारे शरीर के लिए सूक्ष्म मात्रा में आवश्यक होते हैं।
किंतु अपनी उपस्थिति के कारण ही विभिन्न प्रकार की अभिक्रियाओ को सुचारू रूप से चलाने में सहायता प्रदान करते हैं. उन्हें खनिज लवण कहा जाता है। मानव शरीर में लगभग 24% खनिज लवण विद्यमान होते हैं। खनिज लवण हमारे शरीर का महत्व 4% भाग बनाते हैं।
किंतु यह वृद्धि और विकास के लिए परम आवश्यक होते हैं। जिनमें कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटेशियम, सल्फेट, सोडियम, क्लोरीन, मैग्नीशियम मुख्य खनिज लवण के अंतर्गत आते हैं। इसके साथ ही सूक्ष्म खनिज लवण के अंतर्गत लोहा, मैग्नीज, तांबा, आयोडीन, कोबाल्ट, क्लोरीन आदि को शामिल किया गया है। प्राणियों के पोषण में पोषक तत्त्वो की आवश्यकता आहार ग्रहण करने की विधि और शरीर में इसके उप्योगबकी विधि सम्मिलित हैं। कार्बोहाइड्रेट संघटक जटिल पदार्थ हैं।
पाचन
जटिल खाद्य पदार्थों का सरल को सरल में रूप में बदल देते है, इस प्रक्रम को पाचन कहते हैं।
प्राणियों में पोषण की आवश्यकताओं के लिए भोजन अंतर्ग्रहण की विधियाँ एवं शरीर मे इनका उपयोग सम्मिलित है।हार नाल तथा स्त्रावी ग्रन्थियाँ संयुक्त रूप से मानव के पाचन तंत्र का निर्माण करती हैं।
- मुख-गुहिका
- ग्रसिका
- आमाशय
- क्षुद्रांत्र (छोटी आँत)
- बृहदांत्र (बड़ी आँत)
- गुदा
ये सभी भाग मिलकर आहार नाल (पाचन नली) का निर्माण करते हैं।
पाचक रस स्त्रावित करने वाली मुख्य ग्रन्थियाँ है:
- लार-ग्रन्थि
- यकृत
अग्न्याशय
लार-ग्रन्थि
लार ग्रंथियां हमारे मुंह में मौजूद एक ऐसा अंग हैं जो लार बनाती है। यह केवल स्तनधारियों में पाई जाती है। यह एक एक्सोक्राइन ग्रंथि है जो शरीर के बाहर या शरीर के गुहा के भीतर पदार्थों को निकालती है।लार में बलगम, लवण, जीवाणुरोधी यौगिक, एंजाइम और पानी के साथ विभिन्न रसायन शामिल होते हैं जो मुंह में पीएच को नियंत्रित करते हैं। क्या आप जानते हैं कि जब हम किसी स्वादिष्ट भोजन को देखते है या सोचते है तो लार की मात्रा बढ़ जाती है? परन्तु जब हम सोते है तो यह घट जाती है। मूल रूप से, लार एक जल पदार्थ है और पाचन तंत्र का एक हिस्सा है। लार ग्रंथियां 24 घंटे में लगभग 1 से 1.5 लीटर तक लार को स्रावित करती हैं।
वास्तव में 99% लार में पानी होता है। यह मुंह को नम और स्वच्छ रखता है, चबाने, निगलने और पाचन प्रक्रिया में मदद करता है।
यकृत
यकृत लीवर को कहते हैं या मनुष्य शरीर में महत्वपूर्ण अंग है जो कि पाचन में सहायक है यह पित्त रस का बनाता है वसा को पचाने में सहायता करता है तथा शरीर की अशुद्धि का अवशोषण करता है यकृत को जिगर या कलेजा एवं अंग्रेजी में Liver कहते हैं जो मानव शरीर का एक अंग हैं यकृत केवल कशेरुकी प्राणियों में पाया जाता है।
यह भोजन में ली गई वसा के अपघटन में पाचन क्रिया को उत्प्रेरक एवं तेज करने का कार्य करता हैं। इसका एकत्रीकरण पित्ताशय में होता हैं यकृत अतिरिक्त वसा को प्रोटीन में परिवर्तित करता हैं एवं अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में परिवर्तित करने का भी कार्य करता हैं। जो कि आवश्यकता पढ़ने पर शरीर को प्रदान किए जाते है।
अग्न्याशय
अग्न्याशय भी एक सहायक पाचनांग होता है। इसका आकार सी (C) जैसा होता है।
यह “C” की आकृति की ग्रहणी (duodenum) के दो भुजाओं के बीच में से निकलता है, जो यकृत तथा आमाशय के नीचे की ओर स्थित होता है। जो आंत्रयोजनी द्वारा सधी हुई, मछली के जैसे आकार की कोमल एवं गुलाबी से रंग की चपटी हुई मिश्रित ग्रन्थि (mixed gland) होती है।
यह कोशिकायें एक विशेष प्रकार की झिल्ली के द्वारा घिरी रहती हैं। जबकि इनको मैलोरी अजान अभिरंजक से लाल रंग में रंग सकते हैं।
पाचक रस
पाचक रस जटिल पदार्थों को सरल रूप में बदल देते हैं।
अंतर्ग्रहण
भोजन के अंतर्ग्रहण मुख द्वारा होता है। आहार को शरीर के अंदर लेने की क्रिया अंतर्ग्रहण कहलाती हैं।
दांत
वयस्कों के पास आमतौर पर 32 दांत होते हैं।
दांतो के प्रकार कुछ इस तरह के हैं।
कृंतक या छेदक दांत :- दांत के प्रकार में कृतंक दांत तेज धार वाले छैनी जैसे चौड़े होते हैं और भोजन के पकड़ने, काटने या कुतरने का कार्य करती है। हर जबड़े (Jaw) में इनकी संख्या चार होती है।
भेदक या रदनक दांत :- रदनक दांत नुकीले दांत होते हैं और भोजन को चीरने या फाड़ने का कार्य करती है। प्रत्येक जबड़े में दो की संख्या में होते हैं।
अग्रचवर्णक दांत :- दांत के प्रकार में अग्रचवर्णक दांत किनारे पर चपटे, चौकोर व रेखादार होते हैं। इनका कार्य भोजन को चबाना है और ये हमारे प्रत्येक जबड़े में 4 की संख्या में होते हैं।
चर्वणक दांत :- दांत के प्रकार (Types of teeth) में चर्वणक दांत के सिर चौरस व तेज धार के होते हैं। इसका मुख्य कार्य भोजन को चबाना है और प्रत्येक जबड़े में छह की संख्या में होते
मुख एवं मुख-गुहिका
भोजन का अंतर्ग्रहण मुख द्वारा होता है। आहार को शरीर के अंदर लेने की क्रिया अंतर्ग्रहण कहलाती हैं।
लार रस चावल के मंड को शर्करा में बदल देता है।
जीभ एक माँसल पेशीय अंग है, जो पीछे की ओर मुख-गुहिका के अधर तल से जुड़ीं होती हैं। हम बोलने के लिए जीभ का उपयोग करते हैं।
जीभ पर स्वाद-कलिकाएँ होती हैं, जिनकी सहायता से हमें विभिन्न प्रकार के स्वाद का पता चलता है।
भोजन नली
ग्रासनली (ईसॉफगस) लगभग 25 सेंटीमीटर लंबी एक संकरी पेशीय नली होती है जो मुख के पीछे गलकोष से आरंभ होती है, सीने से थोरेसिक डायफ़्राम से गुज़रती है और उदर स्थित हृदय द्वार पर जाकर समाप्त होती है। ग्रासनली, ग्रसनी से जुड़ी तथा नीचे आमाशय में खुलने वाली नली होती है।
आमाशय
आमाशय मोटी भित्ति वाली एक थैलीनुमा संरचना है।यह चपटा एवं श्श्रश् की आकृति का होता है तथा आहार नाल का सबसे चैड़ा भाग है। यह एक ओर ग्रसिका ;ग्रास नलीद्ध से खाद्य प्राप्त करता है तथा दूसरी ओर क्षुद्रांत्रा में खुलता है। आमाशय का आंतरिक अस्तर ;सतहद्ध श्लेष्मल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रस स्रावित करता है। श्लेष्मल आमाशय वेफ आंतरिक अस्तर को सुरक्षा प्रदान करता है। अम्ल अनेक ऐसे जीवाणुओं को नष्ट करता है, जो भोजन वेफ साथ वहाँ तक पहुँच जाते हैं। साथ ही यह माध्यम को अम्लीय बनाता है जिससे पाचक रसों को क्रिया करने में सहायता मिलती है। पाचक रस ;जठर रसद्ध प्रोटीन को सरल पदार्थों में विघटित कर देता है।
क्षुद्रांत्र में अवशोषण
भोजन के सभी घटकों का पाचन क्षुद्रांत्र में पूरा हो जाता है। क्षुद्रांत्र में अवशोषण एवं स्वांगीकरण-क्षुद्रांत्र लगभग 7.5 मीटर लम्बी अत्यधिक कुंडलित नली होती है। यह यकृत एवं अग्न्याशय से स्त्राव प्राप्त करती है। इसके अतिरिक्त इसकी भित्ति से भी कुछ रस स्लावित होते हैं। आंशिक रूप से पचा भोजन क्षुद्रांत्र के निचले भाग में पहुँचता है जहाँ आंत्र रस पाचन क्रिया को पूर्ण कर देता है। पचा हुआ भोजन अवशोषित होकर क्षुद्रांत्र की भित्ति में स्थित रुधिर वाहिकाओं में चला जाता है। इस प्रक्रम को .अवशोषण. कहते हैं । क्षुद्रांत्र की आंतरिक भित्ति पर अंगुली के समान उभरी हुई संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें .दीर्घरोम. अथवा रसांकुर कहते हैं। ये दीर्घरोम पचे हुए भोजन के अवशोषण हेतु तल क्षेत्र बढ़ा देते हैं। प्रत्येक दीर्घरोम में सूक्ष्म रुधिर वाहिकाओं का जाल फैला रहता है। दीर्घरोम की सतह से पचे हुए भोजन का अवशोषण होता है। अवशोषित पदार्थों का स्थानान्तरण रुधिर वाहिकाओं द्वारा शरीर के विभिन्न भागों तक होता है, जहाँ उनका उपयोग जटिल पदार्थों को बनाने में किया जाता है। इस प्रक्रम को .स्वांगीकरण. कहते हैं। कोशिकाओं में उपस्थित ग्लूकोस का विघटन ऑक्सीजन की सहायता से कार्बन डाई-आक्साइड एवं जल में हो जाता है और ऊर्जा मुक्त होती है। भोजन का वह भाग, जिसका पाचन नहीं हो पाता अथवा अवशोषण नहीं होता, बृहदांत्र में भेज दिया जाता।
अवशोषण :- पचा हुआ भोजन अवशोषित होकर क्षुद्रांत्र की भीति से रुधिर वाहिकाओं में जाने की प्रक्रिया अवशोषण कहलाता है।
दीर्घरोम :- पचे हुए भोजन के अवशोषण की तल क्षेत्र को बढ़ा देते है।
स्वांगीकरण :- अवशोषित पदार्थों का स्थानांतरण रुधिर वाहिकाओं द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में जटिल पदार्थों को बनाने में किया जाता है।
बृहदांत्र (बड़ी आँत)
बृहदांत्रा, क्षुद्रांत्रा की अपेक्षा चैड़ी एवं छोटी होती है।यह लगभग 1.5 मीटर लंबी होती है। इसका मुख्य कार्य जल एवं वुफछ लवणों का अवशोषण करना है। बचा हुआ अपचित पदार्थ मलाशय में चला जाता है तथा अर्ध ठोस मल के रूप में रहता है। समय-समय पर गुदा द्वारा यह मल बाहर निकाल दिया जाता है। इसे निष्कासन कहते हैं।
घास खाने वाले जंतुओं में पाचन
गाय, भैंस तथा घास खाने वाले जन्तु-
रूमेन :- ये जन्तु पहले घास को जल्दी-जल्दी निगलकर आमाशय के एक भाग में भंडारित कर लेते है। यह भाग रूमेन ( प्रथम आमाशय ) कहलाता है। रुमिनैन्ट में आमाशय चार वर्गों ने बँटा होता है। रूमेन में आंशिक पाचन होता है, जिसे जुगाल (कड) कहते है। बाद में जन्तु इसको छोटे पिंडको के रूप में पुनः मुख में लाता है तथा जिसे वह चबाता रहता है जिसे रोमन्थन (जुगाली करना) कहते है। ऐसे जन्तु रुमिनैन्ट अथवा रोमन्थी कहलाते हैं। घास में सेलुलोस की प्रचुरता होती है, जो एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट है। रुमिनैन्ट जन्तु ही सेलुलोस का पाचन कर सकते है बहुत से जन्तु एवं मानव सेलुलोस का पाचन नही कर पाते।
घोड़ा, खरगोश आदि में क्षुद्रांत्र एवं बृहदांत्र के बीच एक थैलीनुमा बड़ी संरचना होती हैं।
अमीबा में संभरण एवं पाचन
अमीबा जलाशयों में पाया जाने वाला एककोशिक जीव है। अमीबा के कोशिका में एक कोशिका झिल्ली होती है । अमीबा निरंतर अपनी आकृति एवं स्थिति बदलता रहता है। पादाभ (कृत्रिम पाँव) जिससे ये गति करते है एवं भोजन पकड़ते हैं। खाद्य पदार्थ उसकी खाद्य धानी में फँस जाते है। खाद्य धानी में ही पाचक रस स्रावित होते है जिससे खाद्य पदार्थ को सरल रूप में बदल देते है
NCERT SOLUTIONS
प्रश्न (पृष्ठ संख्या 21-23)
प्रश्न 1 जीवों उचित शब्द द्वारा रिक्त स्थानो कि पूर्ति कीजिए |
- मानव पाचन के मुख्य चरण …………, ………., ………., एवं …….. है |
- मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि का नाम ………… है |
- आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एवं ……… का स्राव होता है, जो भोजन पर क्रिया करते है|
- क्षुद्रांत की आंतरिक भित्ति पर अंगुली के समान अनेक प्रवर्ध होते है, जो ……… कहलाते है |
- अमीबा अपने भोजन का पाचन ……… में करता है |
उत्तर-
- अंतग्रहन, पाचन, अवशोषण, स्वगीकरण एव निष्कासन
- यकृत
- आमाशयी
- दिर्घरोम
- खघधानी |
प्रश्न 2 सत्य एवं असत्य कथनो को चिन्ह किजिए |
- मंड का पाचन आमाशय से प्रारंभ होता है |
- जीभ लाला-ग्रंधी को भोजन के साथ मिलाने में सहायता करती है |
- पित्ताशय में रस अस्थायी रूप से भंडारित होता है
- रुमिनैनट निगली हुई घास को को अपने मुख में वापस लाकर धीरे-धीरे चबाते रहते है |
उत्तर-
- असत्य
- सत्य
- सत्य
- सत्य
प्रश्न 3 निम्न में से सही विकल्प पर (tick) का चिन्ह लगाईए |
- वसा का पूर्णरूपेण पाचन जिस अंग में होता है, वह है
- आमाशय
- मुख
- क्षुद्रांत्र
- बृहदानत्र
- जल का अवशोषण मुख्यत: जिस अंग दवारा होता है, वह है-
- आमाशय
- ग्रसिका
- क्षुद्रांत्र
- बृहदानत्र
उत्तर-
- iii
- iv
प्रश्न 4 कालम A में दिए गए कथनों का मिलन कालम B में दिए गए कथनों से किजिए |
उत्तर-
प्रश्न 5 दीघ्ररोम क्या है? वह कहा पाए जाते है एवं उनके कार्य क्या है ?
उत्तर–
- सुद्रांत्र या छोटी आंत की भीतरी दीवार पर हजारो अंगुली जैसी रचनाए उभरी रहती है | इन्हे दीघ्ररोम कहते है |
- दिर्घरोम सुद्रांत्र में
प्रश्न 6 पित कहाँ निर्मित होता है ? यह भोजन के किस घटक के पाचन में सहायता करता है?
उत्तर- पित का निर्माण यकृत में होता है और इसका संग्रहण पिताशय में होता है | यह भोजन में उपस्थित वसा का पाचन करता है |
प्रश्न 7 उस कार्बोहाइड्रेट का नाम लिखिए जिसका पाचन रुमिनैंट द्वरा किया जाता है परन्तु मानव द्वारा नहीं | इसका कारण बताइए |
उत्तर- उस कार्बोहाइड्रेट का नाम सेलुलोज है जिसका पाचन मनुष्य नहीं करता है | यह सिर्फ रुमिनैंट (मवेशी) द्वारा ही इसका पाचन होता है | इसका कारण यह है कि सेलुलोज एक विशेष प्रकार का कार्बोहाइड्रेट है और इसका पाचन रूमिनैन्टस कर सकते है रूमिनैन्टस में क्षुद्रांत्र एवं बृहदांत्र के बीच एक थैलीनुमा बड़ी संरचना होती है, जहाँ भोजन के सेलुलोस का पाचन यहाँ पर कुछ जीवाणुओं द्वारा किया जाता है, जो मनुष्य के आहार नाल में अनुपस्थित होते हैं |
प्रश्न 8. क्या कारण है कि हमें ग्लूकोस से ऊर्जा तुरंत प्राप्त होता है ?
उत्तर- ग्लूकोस शर्करा का सरल रूप है जिसे पाचित करना बहुत ही आसान है और यह तुरंत ही आँतों द्वारा अवशोषित हो जाता है | यही कारण है कि हमें ग्लूकोस से तुरंत ऊर्जा प्राप्त होता है |
प्रश्न 9 आहार नाल के कौन-से भाग द्वारा निम्न क्रियाएँ संपादित होती हैं
- पचे भोजन का अवशोषण ————— ।
- भोजन को चबाना ————— ।
- जीवाणु नष्ट करना ————— ।
- भोजन का संपूर्ण पाचन ————— ।
- मल का निर्माण ————— ।
उत्तर-
- क्षुद्रांत
- मुँह
- आमाशय
- क्षुद्रांत
- बृहदान्त्र
प्रश्न 10 मानव एवं अमीबा के पोषण में कोई एक समानता एवं एक अंतर लिखिए।
उत्तर- मानव एवं अमीबा के पोषण में समानता : ये दोनों ही विषमपोषी पोषण करते है – क्योंकि दोनों में ये सभी क्रियाएँ होती हैं जिनमें खाद्धय पदार्थों का सरल पदार्थों में परिवर्तित किया जाता है एवं ऊर्जा मुक्त होती है साथ ही साथ इनमें
- अंतर्ग्रहण,
- पाचन
- अवशोषण,
- स्वांगीकरण एवं
- निष्कासन आदि भी होता है |
मानव एवं अमीबा के पोषण में अंतर : अमीबा में पाचन क्रिया बहुत ही सरल है जबकि मनुष्य में यह बहुत ही जटिल है |
प्रश्न 11 कॉलम A में दिए गये शब्दों का मिलान कॉलम B के उचित कथन से कीजिए।
उत्तर-
प्रश्न 12 चित्र में दिए हुए पाचन तंत्र के आरेख को नामांकित कीजिए।
उत्तर-
प्रश्न 13. क्या हम केवल हरी सब्जियों/घास का भोजन कर जीवन निर्वाह कर सकते हैं।
उत्तर-
- नहीं। हरी सब्जियों/घास में केवल सेल्युलोज पाया जाता है जिसका पाचन मानव पाचन तंत्र में नहीं होता है। अत: हम केवल हरी सब्जियों/घास का भोजन कर जीवन निर्वाह नहीं कर सकते हैं।
- हम जानते हैं कि जानवर, कवक, बैक्टीरिया, गैर-हरे पौधे और मनुष्य में अपना भोजन बनाने की क्षमता नहीं होती है। वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपने भोजन के लिए स्वपोषी पर निर्भर करते हैं। हरे पौधे (पत्तेदार सब्जियां/घास) सौर ऊर्जा को फंसाते हैं और ग्लूकोज के रूप में अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। इसलिए, हम कह सकते हैं कि पत्तेदार सब्जियां और घास हमें जीवित रहने में मदद करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान कर सकती हैं।
