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Class 7 हिन्दी – अध्याय-11: नीलकंठ

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-महादेवी वर्मा 

सारांश

नीलकंठ पाठ लेखिका महादेवी द्वारा लिखा गया रेखाचित्र है। इस रेखाचित्र में उनके द्वारा पाले गए मोर जिसे उन्होंने नीलकंठ नाम दिया था उसका वर्णन किया गया है। इस रेखाचित्र में उन्होंने नीलकंठ के स्वभाव, व्यवहार और चेष्टाओं का विस्तार से वर्णन किया है।

कहानी का सार कुछ इस प्रकार है-

एक बार लेखिका अतिथि को स्टेशन पहुँचाकर लौटते समय बड़े मियाँ चिड़ियावाले वाले के यहाँ से मोर-मोरनी के दो बच्चे उठा लाई। घर पहुँचकर घर वालों ने उन बच्चों को देखा तो सभी ने एक स्वर में कहा कि लेखिका को ठग लिया गया है क्योंकि ये मोर नहीं तीतर के बच्चे हैं। इस पर लेखिका चिढ़कर उन बच्चों को अपने पढ़ाई वाले कमरे में ले आईं। बच्चे लेखिका के कमरे में इधर-उधर घूमते रहे। जब वे लेखिका से कुछ ही दिनों में घुल-मिल गए तो वे लेखिका की ओर अपना ध्यान आकर्षित करने के लिए हरकतें करने लगे। अब वे जैसे ही थोड़े बड़े हुए लेखिका ने अन्य पशु-पक्षियों के साथ उन्हें भी जालीघर में रख दिया। धीरे-धीरे दोनों बड़े होकर सुंदर मोर-मोरनी में बदल गए।

मोर के सिर की कलगी बड़ी, चमकीली और चोंच तीखी हो गई थी। गर्दन लंबी नीले-हरे रंग की थी। पंखों में भी चमक आने लगी थी। मोरनी का विकास मोर के समान सौन्दर्यपूर्ण नहीं था परन्तु फिर भी वह मोर की उपयुक्त सहचारिणी थी। लेखिका ने मोर की नीली गरदन के कारण उसका नाम रखा नीलकंठ और मोरनी हमेशा नीलकंठ की छाया की तरह उसके साथ रहने के कारण उसका नाम राधा रखा गया।

नीलकंठ लेखिका के चिड़ियाघर का स्वामी बन गया। जब कोई पक्षी नीलकंठ की बात न मानता तो वह चोंच के प्रहारों से उसे दंड देता था। एक बार एक साँप ने खरगोश के बच्चे को अपने मुँह में दबा लिया था। नीलकंठ ने अपने चोंच के प्रहार से उस साँप के न केवल टुकड़े कर दिए बल्कि पूरी रातभर उस नन्हें खरगोश के बच्चे को पंखों में दबाए गर्मी देता रहा।

वसंत पर मेघों की साँवली छाया छाने पर नीलकंठ अपने इन्द्रधनुषी पंखों को फैलाकर एक सहजात लय ताल में नाचता रहता। लेखिका का को उसका यूँ नृत्य करना बड़ा अच्छा लगता था। अनेक विदेशी महिलाओं ने तो उसकी मुद्राओं को अपने प्रति सम्मान समझकर उसे ‘परफेक्ट जेंटलमैन’ की उपाधि ही दे दी थी। नीलकंठ और राधा को वर्षा ऋतु ही अच्छी लगती थी। उन्हें बादलों के आने से पहले ही उसकी सूचना मिल जाती थी और फिर बादलों की गडगडाहट, वर्षा की रिमझिम और बिजली की चमक के साथ ही उसके नृत्य का वेग भी बढ़ता ही जाता।

एक दिन लेखिका किसी कार्यवश बड़े मियाँ की दुकान से गुजरी तो एक मोरनी जिसके पंजें टूटे थे सात रुपए देकर खरीद लाई। मरहमपट्टी के बाद एक ही महीने में वह ठीक हो गई और डगमगाती हुई चलने लगी। इसी डगमगाने के कारण लेखिका ने उसका नाम कुब्जा रखा। उसे भी जालीघर पहुँचा दिया गया। कुब्जा नाम के अनुरूप ही उसका स्वभाव भी सिद्ध हुआ। नीलकंठ और राधा को साथ रहने ही न देती। उसने अपने चोंच के प्रहार से राधा की कलगी और पंख तोड़ दिए। नीलकंठ उससे दूर भागता था पर वह नीलकंठ के साथ ही रहना चाहती थी। यहाँ तक कि कुब्जा ने राधा के दोनों अंडे भी तोड़ दिए थे। इस कारण राधा और नीलकंठ की प्रसन्नता का अंत हो गया। लेखिका को लगा कुछ दिनों में सबकुछ ठीक हो जाएगा। परन्तु ऐसा न हुआ।

तीन-चार महीने के बाद एक सुबह लेखिका ने नीलकंठ को मरा हुआ पाया। न उसे कोई बीमारी हुई थी और न ही उसके शरीर पर कोई चोट के निशान थे। लेखिका ने उसे अपनी शाल में लपेटकर संगम में प्रवाहित कर दिया। नीलकंठ के न रहने पर राधा कई दिन तक कोने में बैठी नीलकंठ का इन्तजार करती रही। इसके विपरीत कुब्जा ने उसके न रहने पर उसकी खोज आरंभ कर दी थी। एक दिन लेखिका की अल्सेशियन कुतिया कजली कुब्जा के सामने पड़ गई आदत अनुसार उसने अपने चोंच से कजली पर प्रहार कर दिया। इस पर कजली ने भी उसकी गर्दन पर अपने दाँत लगा दिए। कुब्जा का इलाज करवाया गया परन्तु वह ठीक न हो पाई और उसकी भी मृत्यु हो गई। राधा अब भी नीलकंठ की प्रतीक्षा कर रही है। बादलों को देखते ही वह अपनी केका ध्वनि से उसे बुलाती है।

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निबंध से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 116-117)

प्रश्न 1 मोर-मोरनी के नाम किस आधार पर रखे गए?

उत्तर- मोर की गर्दन नीली थी, इसलिए उसका नाम नीलकंठ रखा गया और मोरनी सदा मोर के आस-पास घूमती रहती थी, इसलिए उसका नाम राधा रखा गया।

प्रश्न 2 जाली के बड़े घर में पहुँचने पर मोर के बच्चों का किस प्रकार स्वागत हुआ?

उत्तर- जाली के बड़े घर में मोर के बच्चों के पहुँचते ही वहाँ हलचल मच गई। अन्य जीवों को वैसा ही कौतूहल हुआ जैसा नववधू के आगमन पर परिवार के बाकी सदस्यों को होता है। लक्का कबूतर नाचना छोड़ कर दौड़ पड़े और उनके चारों और घूम-घूमकर गुटरगूं करने लगे। बड़े खरगोश गंभीर भाव से कतार में बैठकर उन्हें परखने लगे। छोटे खरगोश उनके आसपास उछलकूद मचाने लगे। तोते मानो सही निरीक्षण के लिए एक आँख बंद करके उन्हें देखने लगे।

प्रश्न 3 लेखिका को नीलकंठ की कौन सी चेष्टाएँ बहुत भाती थीं?

उत्तर- लेखिका को नीलकंठ का गर्दन ऊँची कर देखना, विशेष भंगिमा के साथ उसे नीची कर दाना चुगना और पानी पीना तथा गर्दन टेढ़ी कर शब्द सुनना आदि चेष्टाएँ बहुत भाती थीं। इनके अतिरिक्त पंखों को फैलाकर उसका नृत्य करना भी लेखिका को बहुत अच्छा लगता था।

प्रश्न 4 “इस आनंदोत्सव की रागिनी में बेमेल स्वर कैसे बज उठा’-वाक्य किस घटना की ओर संकेत कर रहा है?

उत्तर- इस आनंदोत्सव की रागिनी में बेमेल स्वर कैसे बज उठा’-वाक्य नीलकंठ और राधा के प्रेम और आनंद भरे जीवन में कुब्जा के आगमन की ओर संकेत कर रहा है। नीलकंठ और राधा खुशी-खुशी अपना वक्त गुजार रहे थे कि कुब्जा ने आकर उनके जीवन की सारी प्रसन्नता का अंत कर दिया। वह उन दोनों को कभी साथ नहीं रहने देती थी। राधा को नीलकंठ के साथ देखकर वह उसे चोंच से मारने दौड़ती। वह किसी अन्य जीव को भी नीलकंठ के पास नहीं जाने देती थी। वह चाहती थी कि नीलकंठ केवल उसके साथ रहे और नीलकंठ उससे दूर भागता रहता था। कुब्जा ने उसके शांतिपूर्ण जीवन में ऐसा कोलाहल मचाया कि बेचारे नीलकंठ के जीवन का ही अंत हो गया।

प्रश्न 5 बसंत ऋतु में नीलकंठ के लिए जालीघर में बंद रहना असहनीय क्यों हो जाता था?

उत्तर- नीलकंठ को फलों के वृक्षों से अधिक फूलों से लदे नए पत्तों वाले वृक्ष भाते थे। वसंत ऋतु में जब आम के वृक्ष सुनहली मंजरियों से लद जाते थे, अशोक नए लाल पल्लवों से ढंक जाता था, तब जाली घर में वह इतना अस्थिर और बेचैन हो उठता था कि उसे बाहर छोड़ देना पड़ता था।

प्रश्न 6 जाली घर में रहने वाली सभी जीव एक-दूसरे के मित्र बन गए थे, पर कुब्जा के साथ ऐसा संभव क्यों नहीं हो पाया?

उत्तर- जाली घर में रहने वाले सभी जीव एक-दूसरे के मित्र बन गए थे, पर कुब्जा के साथ ऐसा संभव नहीं हो पाया क्योंकि कुब्जा किसी से मित्रता करना ही नहीं चाहती थी। वह सबसे लड़ती रहती थी। उसे केवल नीलकंठ के साथ रहना पसंद था। वह और किसी को उसके पास नहीं जाने देती थी। किसी को उसके साथ देखते ही वह चोंच से मारना शुरू कर देती थी।

प्रश्न 7 नीलकंठ ने खरगोश के बच्चे को साँप से किस तरह बचाया? इस घटना के आधार पर नीलकंठ के स्वभाव की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर- साँप ने शिशु खरगोश के शरीर का पिछला हिस्सा मुँह में दबा लिया था। खरगोश चींची करता हुआ चीख रहा था। नीलकंठ दूर ऊपर झूले में सो रहा था। खरगोश की आवाज सुनकर एक झटके में वह नीचे आ गया। अपनी सहज-चेतना से ही वह समझ गया कि साँप के फन पर चोंच मारने से खरगोश घायल हो सकता है। इसलिए उसने साँप के फन के पास पंजों से दबाया और फिर चोंच से इतना मारा कि वह अधमरा हो गया। खरगोश उसके पंजे से छूट तो गया, पर बेसुध सा वहीं पड़ा रहा। साँप का काम तमाम कर नीलकंठ खरगोश के पास गया और रात भर उसे अपने पंखों के नीचे रखे ऊष्णता देता रहा।

इस घटना से नीलकंठ के स्वभाव की कई विशेषताओं का पता चलता है। वह वीर था, साहसी था। उसमें मानवीय भावनाएँ भी विद्यमान थीं। अपने साथियों के प्रति प्रेम और उनकी रक्षा का ख्याल भी था।

निबंध से आगे प्रश्न (पृष्ठ संख्या 117)

प्रश्न 1 यह पाठ एक रेखाचित्र’ है। रेखाचित्र की क्या-क्या विशेषताएँ होती हैं? जानकारी प्राप्त कीजिए और लेखिका के लिखे किसी अन्य रेखाचित्र को पढ़िए।

उत्तर- रेखाचित्र किसी के जीवन के मुख्य-मुख्य अंगों को प्रस्तुत करती है। इसको कोई एक कहानी नहीं होती है, वरन संपूर्ण जीवन की छोटी बड़ी घटनाओं का समावेश होता है। रेखाचित्र में भावात्मकता और संवेदना होती है। महादेवी वर्मा द्वारा लिखित अन्य रेखाचित्र पुस्तकालय से लेकर पढ़िए।

प्रश्न 2 वर्षा ऋतु में जब आकाश में बादल घिर आते हैं तब मोर पंख फैलाकर धीरे-धीरे मचलने लगता है -यह मोहक दृश्य देखने। का प्रयास कीजिए।

उत्तर- अभयारण्य में इस तरह के दृश्य देखे जा सकते हैं।

प्रश्न 3 पुस्तकालय से ऐसी कहानियों, कविताओं या गीतों को खोजकर पढ़िए जो वर्षा ऋतु और मोर के नाचने से संबंधित हों।

उत्तर-

NCERT Solutions for Class 7 Hindi Vasant Chapter 15 नीलकंठ (महादेवी वर्मा) 1

अनुमान और कल्पना प्रश्न (पृष्ठ संख्या 117)

प्रश्न 1 निबंध में आपने ये पंक्तियां पढ़ी है- ‘मैं अपने शाल में लपेटकर उसे संगम ले गई। जब गंगा की बीच धार में उसे प्रवाहित किया गया तब उसके पंखों की चंद्रिकाओं से बिंबित-प्रतिबिंबित होकर गंगा को चौड़ा पाट एक विशाल मयूर के समान तरंगित हो उठा।’ इन पंक्तियों में एक भावचित्र है। इसके आधार पर कल्पना कीजिए और लिखिए कि मोरपंख की चंद्रिका और गंगा की लहरों में क्या-क्या समानताएँ लेखिका ने देखी होंगी जिसके कारण गंगा का चौड़ा पाट एक विशाल मयूर पंख के समान तरंगित हो उठा।

उत्तर- लेखिका ने जब मोर को गंगा की धारा में प्रवाहित किया होगा तो उसकी लंबी पूंछ के पंख गीले होकर गंगा की धारा पर फैल गए होंगे। उन मोर पंखों की चंद्रिकाओं की परछाई गंगा की जल धारा पर दिखाई देती होगी और आगे बढ़ती हुई लहरों में वे प्रतिबिंब द्विगुणित होते जाते होंगे। इस प्रकार गंगा का चौड़ा पाट किसी विशाल मयूर पंख की भांति तरंगित हो उठा होगा। गंगा की लहरों के हिलने-डुलने में मोर के पंखों की थिरकन का आभास होता होगा।

प्रश्न 2 नीलकंठ की नृत्य-भंगिमा का शब्दचित्र प्रस्तुत करें।

उत्तर- नीलकंठ अपने इंद्रधनुषी गुच्छे जैसे पंखों को मंडलाकार बना कर नाचता था। उसके नृत्य में एक सहजात लय-ताल रहता था। आगे-पीछे, दाएं-बाएँ, उसके घूमने में भी एक क्रम रहता था तथा वह बीच-बीच में एक निश्चित अंतराल पर थम-थम भी जाता था। वर्षा होने पर तीव्र गति में उसके नृत्य के साथ उसकी केका की ध्वनि भी सुनाई देती रहती थी।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 117-118)

प्रश्न 1 ‘रूप’ शब्द से कुरूप, स्वरूप, बहुरूप आदि शब्द बनते हैं। इसी प्रकार नीचे लिखे शब्दों से अन्य शब्द बनाओ-

गंध, रंग, फल, ज्ञान

उत्तर-

गंधगंधहीन, सुगंध, दुर्गंध
रंगरंगहीन, रंगीला, रंगीन, बदरंग
फलफलहीन, फलदार, सफल, निष्फल
ज्ञाननहीन, ज्ञानवान, विज्ञान, ज्ञानी, अज्ञानी

प्रश्न 2 विस्मयाभिभूत शब्द विस्मय और अभिभूत दो शब्दों के योग से बना है। इसमें विस्मय के य के साथ अभिभूत के अ के मिलने से या हो गया है। अ आदि वर्ण हैं। ये सभी वर्ण-ध्वनियों में व्याप्त हैं। व्यंजन वर्गों में इसके योग को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जैसे क् + अ = क इत्यादि। अ की मात्रा के चिह्न () से आप परिचित हैं। अ की भाँति किसी शब्द में आ के भी जुड़ने से अकार की मात्रा ही लगती है, जैसे- मंडल + आकार = मंडलाकार। मंडल और आकार की संधि करने पर (जोड़ने पर) मंडलाकार शब्द बनता है और मंडलाकार शब्द का विग्रह करने पर (तोड़ने पर) मंडल और आकार दोनों अलग होते हैं। नीचे दिए गए शब्दों की संधि-विग्रह कीजिए-

संधि-

नील + आभ = ……………..

नव + आगंतुक = ……………….

विग्रह-

सिंहासन = …………….

मेघाच्छन्न = …………….

उत्तर-

संधि-

नील + आभ = नीलाभ

नव + आगंतुक = नवागंतुक

विग्रह-

सिंहासन = सिंह + आसन

मेघाच्छन्न = मेघ + आच्छन्न

class 7 हिन्दी – अध्याय-10: खानपान की बदलती तस्वीर

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-प्रयाग शुक्ल

सारांश

खानपान की बदलती तस्वीर लेखक प्रयाग शुक्ल द्वारा लिखा गया प्रसिद्ध निबंध हैं।

निबंध का सार कुछ इस प्रकार है-

पिछले 10-15 वर्षों से हमारी खानपान की संस्कृति में बड़ा बदलाव है। इडली, डोसा, सांभर, रसम न केवल दक्षिण भारत तक सीमित न होकर पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया है। इसके साथ ही ढाबा संस्कृति भी लगभग पूरे देश में फैल चूकी है। आपको कहीं भी रोटी, दाल, साग प्राप्त हो जाएगा। फास्टफूड में बर्गर, नुडल्स सभी के नाम आज आम हो चुके हैं। टू मिनट नूडल्स, नमकीन के कई प्रकार घर-घर में जगह बनाते जा रहे हैं। गुजराती ढोकला, गाठिया अब देश के कई हिस्सों में स्वाद लेकर खाया जाता है। बंगाली मिठाइयाँ पहले की तुलना में कई शहरों में उपलब्ध है। स्थानीय व्यंजनों के साथ ही अन्य प्रदेशों के व्यंजन पकवान भी हर क्षेत्र में मिलने लगे हैं और मध्यम वर्गीय जीवन में भोजन विविधता में अपनी जगह बना ली है। ब्रेड जो अंग्रजों के राज में केवल साहब लोगों तक सीमित थी। वह अब कस्बों तक नाश्ते के रूप में लाखों भारतीय के घरों में आपको देखने के लिए आसानी से मिल जायेगी। खानपान की बदलती संस्कृति से नयी पीढ़ी ज्यादा प्रभावित है। स्थानीय व्यंजन अब घटकर कुछ चीजों तक ही सीमित होकर राह गए हैं। बंबई की पावभाजी हो या दिल्ली के छोले- कुलचे की दुनिया अब सीमित हो गई है। मथुरा के पेडों नमकीन की माँग कम होती जा रही है। गृहणियाँ भी उन व्यंजनों में रूचि लेती हैं जो कम समय में तैयार हो जाय। शहरी जीवन की भागमभाग और मंहगाई ने भी लोगों को कई चीजों से वंचित कर दिया है।

खानपान की मिश्रित संस्कृति का सकारत्मक पक्ष यह है कि महिलाएँ जल्दी तैयार हो जाने वाले व्यंजन बनाना पसंद करती हैं। स्वतंत्रता के बाद उद्योग-धंधों, नौकरियों-तबादलों का विस्तार हुआ है जिसके कारण एक जगह का खानपान दूसरी जगह पहुँचा है। खानपान की मिश्रित संस्कृति ने राष्ट्रीय एकता के बीज भी विकसित किये हैं। इसके साथ ही उस क्षेत्र की बोली-बानी, भाषा-भूषा आदि को भी स्थान दिया जाना चाहिए। आज हम आधुनिकता के चले कई स्थानीय व्यंजनों को छोड़ चुके हैं। पश्चिम की नकल में कई ऐसे चीजों को अपना रहें हैं जो हमारे अनुकूल है ही नहीं। खानपान की मिश्रित संस्कृति हमें कुछ चीजें चुनने का अवसर देती है, जिसका लाभ हम उठा पा रहे हैं। अत: हमें विकसित संस्कृति को हमेशा जाँचते परखते रहना चाहिए

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निबंध से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 105)

प्रश्न 1 खानपान की मिश्रित संस्कृति से लेखक का क्या मतलब है? अपने घर के उदाहरण देकर इसकी व्याख्या करें।

उत्तर- खानपान की मिश्रित संस्कृति से लेखक का मतलब विभिन्न प्रदेशों के खान-पान के मिश्रित रूप से है। आज हमें एक ही घर में हमें कई प्रान्तों के खाने देखने के लिए मिल जाते हैं। उदाहरण के तौर पर मेरा घर दिल्ली में है जहाँ पराठे आदि ज्यादा बनते हैं परन्तु खानपान की मिश्रित संस्कृति की वजह से साम्भर-डोसा, इडली जो की दक्षिण भारत का प्रमुख भोजन है वो भी बनता है।

प्रश्न 2 खानपान में बदलाव के कौन से फ़ायदे हैं? फिर लेखक इस बदलाव को लेकर चिंतित क्यों है?

उत्तर- खानपान में बदलाव के कई फायदे हैं जैसे हमारी खाने में रूचि बनी रहती है, देश-विदेश के व्यंजन पता चलते हैं, इससे भारत की राष्ट्रीय एकता भी बनी रहती है। साथ ही इससे जल्दी बनने वाले खानों का उपलब्ध होने लगी हैं जिससे समय की भी बचत होती है। हम अपने स्वास्थ्य और स्वाद के अनुसार भी भोजन का चयन कर सकते हैं।

इन सब फायदों के बावजूद लेखक इसलिए चिंतित हैं क्योंकि इसके नुकसान भी हैं जैसे स्थानीय भोजन की लोकप्रियता का कम हो हो रही है साथ ही खाद्य पदार्थों में शुद्धता की कमी होती जा रही है। कुछ लोग उन व्यंजनों का प्रयोग अत्याधिक करने लगे हैं जो केवल स्वाद देते हैं परन्तु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।

प्रश्न 3 खानपान के मामले में स्थानीयता का क्या अर्थ है?

उत्तर- खानपान के मामले में स्थानीयता का अर्थ है कि वे व्यंजन जो स्थानीय आधार पर बनते थे। जैसे मुम्बई की पाव-भाजी, दिल्ली के छोले-कुलचे, आगरा के पेठे आदि।

निबंध से आगे प्रश्न (पृष्ठ संख्या 106-107)

प्रश्न 1 घर में बातचीत करके पता कीजिए कि आपके घर में क्या चीजें पकती हैं और क्या चीजें बनी-बनाई बाज़ार से आती हैं? इनमें से बाज़ार से आनेवाली कौन सी चीजें आपके माँ-पिता जी के बचपन में घर में बनती थीं?

उत्तर- मैं उत्तर भारतीय निवासी हैं। हमारे घर में कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं तथा कई तरह के बाजार से लाया जाता है। घर में बनने वाली चीजें एवं बाजार से आने वाली चीजों की तालिका नीचे दी जा रही है।

हमारे घर में बननेवाली चीजें बाजार से आनेवाली चीजें
दाल
रोटी
सब्ज़ी, कड़ी
राजमा-चावल
छोले, भटूरे, खीर,
हलवा
समोसे
जलेबी
ब्रेड पकौड़े
बरफ़ी, आइसक्रीम
ढोकला
गुलाबजामुन

प्रश्न 2 यहाँ खाने, पकाने और स्वाद से संबंधित कुछ शब्द दिए गए हैं। इन्हें ध्यान से देखिए और इनका वर्गीकरण कीजिए-

उबालना, तलना, भूनना, सेंकना, दाल, भात, रोटी, पापड़, आलू, बैंगन, खट्टा, मीठा, तीखा, नमकीन, कसैला

भोजनकैसे पकायास्वाद
   

उत्तर-

भोजनकैसे पकायास्वाद
दालउबालनानमकीन
भातउबालनाफीका/ नमकीन
रोटीसेंकनाफीका/ मीठा
पापड़तलना/ सेंकनानमकीन
आलूउबालनानमकीन
बैंगनतलना/ भूननानमकीन/ कसैला

प्रश्न 3 छौंक, चावल, कढ़ी

इन शब्दों में क्या अंतर है? समझाइए। इन्हें बनाने के तरीके विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग हैं। पता करें कि आपके प्रांत में इन्हें कैसे बनाया जाता है?

उत्तर- छौंक, चावल और कढ़ी में निम्न अंतर है-

छौंक-यह प्याज, टमाटर, जीरा व अन्य मसालों से बनता है। कढ़ाई या किसी छोटे आकार के बर्तन में घी या तेल गर्म करके उनमें स्वादानुसार प्याज, टमाटर व जीरे को भूना जाता है। कई बार इसमें धनिया, हरी मिर्च, कसूरी मेथी, इलाइची व लौंग आदि भी डाले जाते हैं। छौंक जितना चटपटा बनाया जाए सब्जी उतनी स्वाद बनती है।

चावल-चावल कई प्रकार से बनते हैं।

उबले (सादा) चावल–एक भाग चावल व तीन भाग पानी डालकर उबालकर बनाना। चावल पकने पर फालतू पानी बहा देना।

पुलाव-जीरे व प्याज को घी में भूनकर चावलों में छौंक लगाना। खूब सारी सब्ज़ियाँ डालकर पकाना। इसमें पानी नापकर डाला जाता है। जैसे एक गिलास चावल तो दो गिलास पानी। कई बार सब्जियों को अलग पकाकर चावलों में मिलाया भी जाता है।

खिचड़ी-चावलों को दाल के साथ मिलाकर बनाना। इसमें पानी अधिक मात्रा में डाला जाता है। जैसे-एक भाग चावल, आधा भाग दाल व तीन से चार भाग पानी। पकने के बाद जीरे व गर्म मसाले का छौंक लगाया जाता है।

(नोट-इन सब में नमक स्वादानुसार डाला जाता है।)

इसके अतिरिक्त खाने का रंग, गुड़ या चीनी डालकर मीठे चावल भी बनाए जाते हैं। कढ़ी-बेसन और दही मिलाकर, उसमें खूब पानी डालकर उबाला जाता है फिर उसमें बेसन के पकौड़े बनाकर डाले जाते हैं। पकने पर इसमें स्वादानुसार मसाले डालकर छौंक लगाया जाता है।

यदि हम ध्यान से इनमें अंतर करें तो पाएँगे कि कढ़ी एक प्रकार की सब्जी, छौंक किसी सब्ज़ी या दाल को स्वाद बनाने वाला व चावल जिन्हें सब्जी, दाल या दही के साथ खाया जाता है।

प्रश्न 4 पिछली शताब्दी में खानपान की बदलती हुई तसवीर का खाका खींचें तो इस प्रकार होगा

सन् साठ का दशक- छोले-भटूरे

सन् सत्तर का दशक- इडली-डोसा सन्

अस्सी का दशक- तिब्बती (चीनी) भोजन

सन् नब्बे का दशक- पीज़ा, पाव-भाजी।

  • इसी प्रकार आप कुछ कपड़ों या पोशाकों की बदलती तसवीर का खाका खींचिए।

उत्तर-

दशकमहिलाओं की पोशाकपुरुषों की पोशाक
सन् साठसाड़ी-ब्लाउज/ लहंगा-चोली/ सलवार-कमीजधोती-कुर्ता, पैंट-शर्ट, कुर्ता-पाजामा
सन् सत्तरसाड़ी-ब्लाउज/ सलवार-कमीज, स्कर्ट-टॉप/ बेलबाटम-टॉपपैंट-शर्ट, कुर्ता-पाजामा, कोट-पैंट-टाई
सन् अस्सीसाड़ी-ब्लाउज/ सलवार-कमीज स्कर्ट-टॉप/ जींस-टॉप कोट-पैंट-टाई/ जींस-टीशर्टपैंट-शर्ट कुर्ता-पाजामा
सन् नब्बेसाड़ी-ब्लाउज/ सलवार कमीज/ स्कर्ट-टॉप/ जींस-टॉपपैंट-शर्ट, कुर्ता-पाजामा, जींस-टी शर्ट/ कोट-पैंट-टाईशेरवानी/ पठानी सूट

प्रश्न 5 मान लीजिए कि आपके घर कोई मेहमान आ रहे हैं जो आपके प्रांत का पांरपरिक भोजन करना चाहते हैं। उन्हें खिलाने के लिए घर के लोगों की मदद से एक व्यंजन-सूची (मेन्यू) बनाइए।

उत्तर- व्यंजन-सूची (मेन्यू)

  • चावल सादा
  • रायता
  • पुलाव
  • पापड़
  • चावल जीरा
  • चिप्स
  • आम अचार, नीबू अचार, करेला अचार, कटहल अचार, गाजर अचार, भरवां मिर्च अचार मिश्रित
  • सलाद
  • पूड़ी
  • तवा रोटी,  मटर-पनीर, दाल-अरहर, रुमाली रोटी, शाही पनीर, दाल-मटर, तंदूरी रोटी, पनीर, मिक्स दाल-मसूर, मिस्सी रोटी, आलू-पालक, दाल-उरद, नान(सादा), आलू-गोभी, दाल-मिक्स, कुलचे
  • आलू-सोयाबीन, दाल मखनी
  • आलू-राजमा, दाल-तड़का, पूड़ी बेसन, आलू-मेथी, दाल-फ्राई कचौड़ी (दाल), कढ़ी-पालक, कचौड़ी (आलू), बैगन का भरता, पराँठे
  • कढ़ी-गाजर, बेसन नान आलू, गोभी कढ़ी-मिक्स
  • कढ़ी-पकौड़ा, मेंथी-पालक, आलू-मटर-टमाटर.

अनुमान और कल्पना प्रश्न (पृष्ठ संख्या 107)

प्रश्न 1 ‘फास्ट फूड’ यानी तुरंत भोजन के भफे-नुकसान पर कक्षा में वाद-विवाद करें।

उत्तर- ‘फास्ट फूड’ समय की बचत करते हैं और ये स्वादिष्ट भी होते हैं परंतु ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं और कई तरह की बीमारियों को न्यौता देते हैं।

प्रश्न 2 हर शहर, कस्बे में कुछ ऐसी जगहें होती हैं जो अपने किसी खास व्यंजन के लिए जानी जाती हैं। आप अपने शहर, कस्बे का नक्शा बनाकर उसमें ऐसी सभी जगहों को दर्शाइए।

उत्तर- कुछ शहरों के उदाहरण

NCERT Solutions for Class 7 Hindi Chapter 14 खानपान की बदलती तस्वीर – Merit  Batch

प्रश्न 3 खानपान के मामले में शुद्धता का मसला काफी पुराना है। आपने अपने अनुभव में इस तरह की मिलावट को देखा है? किसी फिल्म या अखबारी खबर के हवाले से खानपान में होनेवाली मिलावट के नकसानों की चर्चा कीजिए।

उत्तर- खानपान में शुद्धता स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। अशुद्ध खाद्य पदार्थ कई तरह की बीमारियों को न्यौता देते हैं। फिर भी आजकल भोज्य पदार्थों में मिलावट बढ़ती ही जा रही है। हम दूध से ही इसकी शुरुआत कर सकते हैं। दूध में पानी मिलाना तो अब सामान्य सी बात हो गई है। पिसे हुए मसालों में भी कई तरह की मिलावट की जा रही हैं। हाल ही में अखबारों में यह खबर आई थी कि रेडिमेड मसालों में घोड़े की लीद मिलाई जा रही हैं, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। आज के मुनाफाखोरी के युग में लोग कोई भी समझौता करने को तैयार हैं। लोगों को स्वास्थ्य की फिक्र जरा भी नहीं है। यह कोई नहीं जानना चाहता कि इस तरह की मिलावट शरीर पर क्या असर डालती हैं। लाभ कमाने के चक्कर में लोगों ने अपने कर्तव्य की ओर से आँखें मूंद ली हैं। यह प्रवृत्ति खतरनाक हैं। हमें सजग होकर खाद्य पदार्थों में किसी भी तरह की मिलावट का विरोध करना चाहिए।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 107)

प्रश्न 1 खानपान शब्द, खान और पान दो शब्दों को जोड़कर बना है। खानपान शब्द में और छिपा हुआ है। जिन शब्दों के योग में और, अथवा, या जैसे योजक शब्द छिपे हों, उन्हें द्वंद्व समास कहते हैं। नीचे द्वंद्व समास के कुछ उदाहरण दिए गए हैं। इन वाक्यों में प्रयोग कीजिए और अर्थ समझिए-

सीना-पिरोना, भला-बुरा, चलना-फिरना,लंबा-चौड़ा, कहा-सुनी, घास-फूस।

उत्तर- दादी माँ सीना-पिरोना अच्छी तरह जानती हैं।

राजू भला-बुरा कुछ नहीं समझता।

चलना-फिरना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

सड़क पर मैंने एक लंबा-चौड़ा फौजी देखा।

दोनों भाइयों में कुछ कहा-सुनी हो गई है।

उसका घर घास-फूस का बना हुआ है।

प्रश्न 2 कई बार एक शब्द सुनने या पढ़ने पर कोई और शब्द याद आ जाता है। आइए शब्दों की ऐसी कड़ी बनाएँ। नीचे शुरूआत की गई है। उसे आप आगे बढ़ाइए। कक्षा में मौखिक सामूहिक गतिविधि के रूप में भी इसे दिया जा सकता है-

इडली – दक्षिण – केरल – ओणम् – त्योहार – छुट्टी – आराम..

उत्तर- आराम – कुर्सी – लकड़ी – पेड़ – जंगल – जानवर – चिड़ियाघर

Class 7 हिन्दी – अध्याय-9: एक तिनका

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-हरिऔध

काव्यांश

एक तिनका कविता में कवि हरिऔध जी ने हमें घमंड ना करने की प्रेरणा दी है। इस कविता के अनुसार, एक दिन वो बड़े घमंड के साथ अपने घर की मुंडेर पर खड़े होते हैं, तभी उनकी आँख में एक तिनका गिर जाता है। उन्हें बड़ी तकलीफ होती है और जैसे-तैसे तिनका उनकी आँख से निकल जाता है। तिनके के निकलने के साथ ही कवि के मन से घमंड भी निकल जाता है और उन्हें सरल जीवन जीने का महत्त्व समझ आ जाता है।

भावार्थ

मैं घमण्डों में भरा ऐंठा हुआ।

एक दिन जब था मुण्डेरे पर खड़ा।

आ अचानक दूर से उड़ता हुआ।

एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।1।

भावार्थ- उपर्युक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि वे एक दिन बड़े ही घमंड में भरे हुए अपनी छत की मुंडेर पर खड़े थे। अचानक उसी समय एक तिनका कहीं से उड़कर उनकी आँख में चला जाता है।

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा।

लाल होकर आँख भी दुखने लगी।

मूँठ देने लोग कपड़े की लगे।

ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी ।2।

भावार्थ- इन पक्तियों में कवि ने उनकी आँख में तिनका जाने के बाद उनकी हालत का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि आँख में तिनका चले जाने से उन्हें बड़ी ही बेचैनी होने लगी। उनकी आँख लाल हो गयी और दुखने लगी। लोग कपड़े का उपयोग करके उनकी आँख से तिनका निकालने की कोशिश करने लगे। इस दौरान उनकी ऐंठ और घमंड बिल्कुल चूर हो कर दूर भाग गई।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया।

तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिए।

ऐंठता तू किसलिए इतना रहा।

एक तिनका है बहुत तेरे लिए।3।

भावार्थ- उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने तिनका निकल जाने के बाद अपनी हालत का वर्णन किया है। वे इन पंक्तियों में कहते हैं कि जैसे-तैसे उनकी आँखों से तिनका निकल गया। इसके बाद उन्हें मन में एक ख़याल आया कि उन्हें घमंड नहीं करना चाहिए था, उनका घमंड तो एक मामूली तिनके ने ही तोड़ दिया।

साथ ही इन पक्तियों के द्वारा कवि हमें घमंड न करने का संदेश भी दे रहे हैं। कवि के अनुसार मनुष्य का घमंड चूर करने के लिए एक तिनके भी काफी होता है।

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कविता से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 100)

प्रश्न 1 नीचे दी गई कविता की पंक्तियों को सामान्य वाक्य में बदलिए।

जैसे- एक तिनका आँख में मेरी पड़ा- मेरी आँख में एक तिनका पड़ा।

मूँठ देने लोग कपड़े की लगे- लोग कपड़े की मूँठ देने लगे।

  1. एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा-
  2. आँख में तिनका चले जाने के कारण आँख लाल होकर दुखने लगी-
  3. ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी–
  4. जब किसी ढब से निकल तिनका गया–

उत्तर- 

  1. एक दिन जब मैं अपनी छत की मुंडेर पर खड़ा था।
  2. आँख में तिनका चले जाने के कारण आँख लाल होकर दुखने लगी।
  3. बेचारी ऐंठ दबे पावों भागी।
  4. किसी तरीके से आँख से तिनका निकाला गया।

प्रश्न 2 ‘एक तिनका’ कविता में किस घटना की चर्चा की गई है, जिससे घमंड नहीं करने का संदेश मिलता है?

उत्तर- ‘एक तिनका’ कविता में ‘हरिऔध’ जी ने उस समय की घटना का वर्णन किया है, जब कवि अपने-आप को श्रेष्ठ समझने लगा था। उसके इस घमंड को एक छोटे से तिनके ने चूर-चूर कर दिया। उस छोटे से तिनके के कारण कवि की नाक में दम हो गया था। उस तिनके को निकालने के लिए कई प्रयास किए गए और जब किसी तरीके से वह निकल गया तो कवि को समझ आया कि उसका अभिमान तोड़ने के लिए एक छोटा तिनका भी बहुत है। अत: कवि और तिनके के उदहारण द्वारा इस कविता में हमें घमंड न करने की सीख दी गई है।

प्रश्न 3 आँख में तिनका पड़ने के बाद घमंडी की क्या दशा हुई?

उत्तर- आँख में तिनका पड़ने के बाद घमंडी की आँख दर्द के कारण लाल हो गई। वह बैचैन हो उठा और किसी भी तरह से आँख से तिनका निकालने का प्रयत्न करने लगा।

प्रश्न 4 घमंडी की आँख से तिनका निकालने के लिए उसके आसपास लोगों ने क्या किया?

उत्तर- घमंडी की आँख से तिनका निकालने के लिए उसके आसपास लोगों ने कपड़े की मूँठ बनाकर उसकी आँख पर लगाकर तिनका निकालने का प्रयास किया।

प्रश्न 5 ‘एक तिनका’ कविता में घमंडी को उसकी ‘समझ’ ने चेतावनी दी–

  • ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,
  • एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

इसी प्रकार की चेतावनी कबीर ने भी दी है–

  • तिनका कबहूँ न निंदिए, पाँव तले जो होय।
  • कबहूँ उड़ि आँखिन परै, पीर घनेरी होय।।

इन दोनों में क्या समानता है और क्या अंतर? लिखिए।

उत्तर- इन दोनों काव्यांश में यह समानता है कि दोनों में ही तिनके के उदाहरण द्वारा यह समझाने का प्रयास किया है कि एक छोटा-सा तिनका भी मनुष्य को परेशानी में डाल सकता है।

इन दोनों काव्यांश में यह अंतर है कि जहाँ कवि हरिऔधजी जी ने हमें घमंड न करने की सीख दी है वहीँ कबीरजी ने हमें किसी को भी तुच्छ न समझने की सीख दी है।

अनुमान और कल्पना प्रश्न (पृष्ठ संख्या 100-101)

प्रश्न 1 इस कविता को कवि ने ‘मैं’ से आरम्भ किया है- ‘मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ’। कवि का यह ‘मैं’ कविता पढ़नेवाले व्यक्ति से भी जुड़ सकता है और तब अनुभव यह होगा कि कविता पढ़नेवाला व्यक्ति अपनी बात बता रहा है। यदि कविता में मैं की जगह ‘वह’ या कोई नाम लिख दिया जाए, तब कविता के वाक्यों में बदलाव आ जाएगा। कविता में ‘मैं’ के स्थान पर ‘वह’ या कोई नाम लिखकर वाक्यों के बदलाव को देखिए और कक्षा में पढ़कर सुनाइए।

उत्तर- वह घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,

एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा।

आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,

एक तिनका आँख में उसकी पड़ा।

वह झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा,

लाल होकर आँख भी दुखने लगी।

मूंठ देने लोग कपड़े की लगे,

ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया,

तब ‘समझ’ ने यों उसे ताने दिए।

ऐंठता वो किसलिए इतना रहा,

एक तिनका है बहुत उसके लिए।

प्रश्न 2 नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए-

ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी,

तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिए।

  • इन पंक्तियों में ऐंठ’ और ‘समझ’ शब्दों का प्रयोग सजीव प्राणी की भाँति हुआ है। कल्पना कीजिए, यदि ‘ऐंठ’ और ‘समझ’ किसी नाटक में दो पात्र होते तो उनका अभिनय कैसा होता?

उत्तर- ‘ऐंठ’ अकड़कर चलती। घमंड में भरी होती। रूखे स्वर में बात करती। किसी को कुछ न समझती। उसे किसी बात की परवाह न होती।

‘समझ’ शांत स्वभाव की होती। उसका व्यवहार नम्र, विनीत तथा सरल होता। वह सबका आदर करती। उसकी बातों में समझदारी होती।

प्रश्न 3 नीचे दी गई कबीर की पंक्तियों में तिनका शब्द का प्रयोग एक से अधिक बार किया गया है। इनके अलग-अलग अर्थों की जानकारी प्राप्त करें।

उठा बबूला प्रेम का, तिनका उड़ा अकास।

तिनका-तिनका हो गया, तिनका तिनके पास।

उत्तर- जिस प्रकार हवा के झोंके से तिनके उड़कर आकाश में चले जाते हैं उसी प्रकार ईश्वर के प्रेम में लीन हृदय सांसारिक मोह-माया के बंधनों से मुक्त होकर ऊपर उठ जाता है। वह आत्मा का परिचय प्राप्त कर परमात्मा से मिल जाता है अर्थात उसे अपने अस्तित्व की पहचान हो जाती है और वह सभी प्रकार की बाधाओं से विरत हो ईश्वर के करीब पहुँच जाता है।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 101)

प्रश्न 1 ‘किसी ढब से निकलना’ का अर्थ है किसी ढंग से निकलना। ‘ढब से’ जैसे कई वाक्यांशों से आप परिचित होंगे, जैसे धम से वाक्यांश हैं लेकिन ध्वनियों में समानता होने के बाद भी ढब से और धम से जैसे वाक्यांशों के प्रयोग में अंतर है। ‘धम से’, ‘छप से’ इत्यादि का प्रयोग ध्वनि द्वारा क्रिया को सूचित करने के लिए किया जाता है। नीचे कुछ ध्वनि द्वारा क्रिया को सूचित करने वाले वाक्यांश और कुछ अधूरे वाक्य दिए गए हैं। उचित वाक्यांश चुनकर वाक्यों के खाली स्थान भरिए

छप से, टप से, थर्र से, फुर्र से, सन् से

  1. मेंढक पानी में___________कूद गया।
  2. नल बंद होने के बाद पानी की एक बूंद ___________चू गई।
  3. शोर होते ही चिड़िया ___________उड़ी।
  4. ठंडी हवा___________गुज़री, मैं ठंड में___________काँप गया।

उत्तर-

  1. मेंढक पानी में छप से कूद गया।
  2. नल बंद होने के बाद पानी की एक बूँद टप से चू गई।
  3. शोर होते ही चिड़िया फुर्र से उड़ी।
  4. ठंडी हवा सन् से गुजरी, मैं ठंड में थर्र से काँप गया।

Class 7 हिन्दी – अध्याय-8: रहीम की दोहे

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-रहीम

सारांश

रहीम के दोहे हमें कई तरह की नैतिक शिक्षा और जीवन का गहरा ज्ञान देते हैं। पाठ में दिए गए दोहों में सच्चे मित्र, सच्चे प्रेम, परोपकार, मनुष्य की सहनशक्ति आदि के बारे में बहुत ही सरल और मनोहर ढंग से बताया है।

पहले दोहे में रहीम ने सच्चे मित्र के बारे में ज्ञान दिया है।

दूसरे दोहे में मछली के उदाहरण द्वारा सच्चे प्रेम को दर्शाया है।

तीसरे दोहे में रहीम परोपकार के महत्त्व की बात करते हैं जो उन्होंने वृक्ष और सरोवर के माध्यम से बताया है।

चौथे दोहे में रहीम ने निर्धन होने के बाद अपने पुराने संपन्न दिनों को याद करने का कोई मोल न होने के बारे में बादलों के उदाहरण से समझाया है।

पाँचवें और अंतिम दोहे में रहीम ने सहनशीलता के बारे में धरती के माध्यम से समझाया है।

भावार्थ

कहि ‘रहीम’ संपति सगे, बनत बहुत बहु रीति।

बिपति-कसौटी जे कसे, सोई सांचे मीत॥

भावार्थ- उपर्युक्त दोहे में कवि रहीम कहते हैं कि हमारे सगे-संबंधी तो किसी संपत्ति की तरह होते हैं, जो बहुत सारे रीति-रिवाजों के बाद बनते हैं। परंतु जो व्यक्ति मुसीबत में आपकी सहायता कर, आपके काम आए, वही आपका सच्चा मित्र होता है।

जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।

‘रहिमन’ मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह॥

भावार्थ- उपर्युक्त दोहे में रहीमदास ने सच्चे प्रेम के बारे में बताया है। उनके अनुसार, जब नदी में मछली पकड़ने के लिए जाल डालकर बाहर निकाला जाता है, तो जल तो उसी समय बाहर निकल जाता है। क्योंकि उसे मछली से कोई प्रेम नहीं होता। मगर, मछली पानी के प्रेम को भूल नहीं पाती है और उसी के वियोग में प्राण त्याग देती है।

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।

कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

भावार्थ- उपर्युक्त दोहे रहीमदास कहते हैं कि जिस प्रकार वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते और नदी-तालाब अपना पानी स्वयं नहीं पीते। ठीक उसी प्रकार, सज्जन और अच्छे व्यक्ति अपने संचित धन का उपयोग केवल अपने लिए नहीं करते, वो उस धन से दूसरों का भला करते हैं।

थोथे बादर क्वार के, ज्यों ‘रहीम’ घहरात।

धनी पुरुष निर्धन भये, करैं पाछिली बात॥

भावार्थ- उपर्युक्त दोहे में रहीम दास जी ने कहते हैं कि जिस प्रकार बारिश और सर्दी के बीच के समय में बादल केवल गरजते हैं, बरसते नहीं हैं। उसी प्रकार, कंगाल होने के बाद अमीर व्यक्ति अपने पिछले समय की बड़ी-बड़ी बातें करते रहते हैं, जिनका कोई मूल्य नहीं होता है।

धरती की सी रीत है, सीत घाम औ मेह।

जैसी परे सो सहि रहै, त्‍यों रहीम यह देह॥

भावार्थ- उपर्युक्त दोहे में कवि रहीम ने मनुष्य के शरीर की सहनशीलता के बारे में बताया है। वो कहते हैं कि मनुष्य के शरीर की सहनशक्ति बिल्कुल इस धरती के समान ही है। जिस तरह धरती सर्दी, गर्मी, बरसात आदि सभी मौसम झेल लेती है, ठीक उसी तरह हमारा शरीर भी जीवन के सुख-दुख रूपी हर मौसम को सहन कर लेता है।

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दोहे से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 84)

प्रश्न 1 पाठ में दिए गए दोहों की कोई पंक्ति कथन है और कोई कथन को प्रमाणित करनेवाला उदाहरण। इन दोनों प्रकार की पंक्तियों को पहचान कर अलग-अलग लिखिए।

उत्तर- उदहारण वाले दोहे

तरवर फल नहिं खात है, सरवर पियत न पान।

कहि रहीम परकाज हित, संपति-संचहि सुजान।।

थोथे बादर क्वार वके, ज्यों रहीम घहरात।

धनी पुरुष निर्धन भए, करें पाछिली बात।।

धरती की-सी रीत है, सीत घाम औ मेह।

जैसी परे सो सहि रहे, त्यों रहीम यह देह।।

कथन वाले दोहे 

जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।

रहिमन मछरी नीर को, तऊ न छाँड़ति छोह।।

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।

बिपति कसौटी जे कसे, तेई साँचे मीत।।

प्रश्न 2 रहीम ने क्वार के मास में गरजनेवाले बादलों की तुलना ऐसे निर्धन व्यक्तियों से क्यों की है जो पहले कभी धनी थे और बीती बातों को बताकर दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं? दोहे के आधार पर आप सावन के बरसने और गरजनेवाले बादलों के विषय में क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर- क्वार के मास बादल केवल गरजते हैं, बरसते नहीं हैं जैसे वे निर्धन व्यक्ति जो पहले कभी धनी थे और बीती बातों को बताकर दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं इसलिए कवि ने दोनों में समानता स्पष्ट की है।

दोहे से आगे प्रश्न (पृष्ठ संख्या 85)

प्रश्न 1 नीचे दिए गए दोहों में बताई गई सच्चाइयों को यदि हम अपने जीवन में उतार लें तो उनके क्या लाभ होंगे? सोचिए और लिखिए-

  1. तरुवर फल ………………. सचहिं सुजान।। 
  2. धरती की-सी ………………. यह देह।।

उत्तर- 

  1. इसे अपने जीवन में उतार लेने से हमारे मन से लालच और मोह खत्म हो जाएगा और परोपकार की भावना जागेगी। इससे हमें आत्म-संतुष्टि प्राप्त होगी और हम सही अर्थों में मनुष्य बन पायेंगें।
  2. इसे अपने जीवन में उतार लेने से हम अपने शरीर और मन को सहनशील बना पायेंगें जिससे सुख और दुःख दोनों को सहजता से स्वीकार कर पायेंगें।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 85)

प्रश्न 1 निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित हिन्दी रूप लिखिए-

जैसे- परे-पड़े (रे, ड़े)

बिपति, मछरी, बादर, सीत 

उत्तर- बिपति – विपत्ति

मछरी – मछली

बादर – बादल

सीत – शीत

प्रश्न 2 नीचे दिए उदाहरण पढ़िए-

  1. बनत बहुत बहु रीत।
  2. जाल परे जल जात बहि।
  • उपर्युक्त उदाहरणों की पहली पंक्ति में ‘ब’ का प्रयोग कई बार किया गया है और दूसरी में ‘ज’ का प्रयोग। इस प्रकार बार- बार एक ध्वनि के आने से भाषा की सुंदरता बढ़ जाती है। वाक्य रचना की इस विशेषता के अन्य उदाहरण खोजकर लिखिए।

उत्तर- संपत्ति संचहि सुजान।

रघुपति राघव राजा राम।

काली लहर कल्पना काली, काल कोठरी काली।

चारू चंद्र की चंचल किरणें।

Class 7 हिन्दी – अध्याय-7: अपूर्व अनुभव

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-तेत्सुको कुरियानागी

सारांश

यह कहानी मूलतः जापानी भाषा में लिखी गई है। जिसमें तोमोए में पढ़ने वाले तोत्तो-चान तथा यासुकी-चान नामक दो जापानी बच्चों के पेड़ पर चढ़ने के संघर्ष को दिखाया गया है।

कहानी का सार कुछ इस प्रकार है-

तोमोए का हर-एक बच्चा बाग के एक-एक पेड़ को खुद के चढ़ने का पेड़ मानता था।

और वह उनकी निजी संपत्ति होती थी। यहाँ तक कि किसी दूसरे के पेड़ पर चढ़ने की अनुमति माँगी जाती थी।

तोत्तो-चान का पेड़ मैदान के बाहरी हिस्से में कुहोन्बुत्सु जाने वाली सड़क के पास था। उस बड़े पेड़ पर चढ़ने पर पैर फिसलने लगते थे। ठीक से चढ़ने पर ज़मीन से छह फुट की ऊँचाई पर स्थित द्विशाखा तक पहुँचा जा सकता था। वह झूले जैसी आरामदेह जगह थी। तोत्तो-चान अक्सर खाने की छुट्टी के समय या स्कूल के बाद उस पर चढ़ी मिलती। वहाँ से वह दूर आकाश को या सड़क पर आने-जाने लोगों को देखती।

एक दिन तोत्तो-चान यासुकी-चान को अपने पेड़ पर चढ़ने का न्योता देती है। यासुकी-चान को पोलियो हो गया था, जिस कारण वह पेड़ पर चढ़ नहीं सकता था। अपने इसी पोलियो की बीमारी के कारण वह किसी भी पेड़ को अपनी निजी संपत्ति नहीं समझता था।

तोत्तो-चान यासुकी-चान के साथ मिलकर उसे पेड़ पर चढ़ाने की योजना बनाती है। वे अपने घर में माता-पिता को भी इस बारे में कुछ नहीं बताते। तोत्तो-चान अपनी माँ से झूठ बोलती है कि वह यासुकी-चान के घर जा रही है। वह यासुकी-चान को स्कूल में मिलती है और उसे लेकर अपने पेड़ के पास पहुँचती है। इस पेड़ पर वह कई बार चढ़ चुकी थी। तोत्तो-चान चाहती थी कि अब यासुकी-चान भी उस पेड़ पर चढ़े। यासुकी-चान भी पेड़ पर चढ़ने के विचार से बहुत उत्साहित था।

तोत्तो-चान उसे अपने पेड़ के पास ले गई। वहाँ वह चौकीदार के यहाँ से एक सीढ़ी उठाकर ले आई। सीढ़ी को घसीटकर पेड़ के तने के सहारे लगा देती है। वह यासुकी-चान को पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करने के लिए कहती है। यासुकी-चान बिना सहारे के एक सीढ़ी भी नहीं चढ़ पाता। वह निराश हो जाता है परन्तु तोत्तो-चान हार नहीं मानती और फिर चौकीदार के छप्पर की ओर दौड़कर वहाँ से तिपाई सीढ़ी घसीट लाती है। पसीने से लथपथ तिपाई सीढ़ी को द्विशाखा से लगा देती है। तोत्तो-चान उसको एकएक सीढ़ी पर चढ़ाकर उसे पूरा सहारा दे रही थी। यासुकी-चान भी पूरी शक्ति लगाकर पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। आखिरकार वह पेड़ के पास तक पहुँच ही जाता है। तभी तोत्तो-चान को लगता है कि उनकी सारी मेहनत बेकार हो गई है चूँकि यासुकी-चान पेड़ के पास तो पहुँच गया था किंतु पेड़ पर नहीं चढ़ पा रहा था।

तोत्तो-चान का रोने का मन होने लगा लेकिन वह रोती नहीं है। तोत्तो-चान यासुकी-चान को पेड़ का सहारा लेकर लेटने के लिए कहती है। वह उसे पेड़ की ओर पूरी शक्ति से खींचने लगती है। यह एक खतरे से भरा काम था। यासुकी-चान को तोत्तो-चान पर पूरा विश्वास था। अंत में तोत्तो-चान यासुकी-चान को अपने पेड़ पर खींचकर लाने में सफल हो ही जाती है। पसीने से लथपथ तोत्तो-चान सम्मान से यासुकी-चान का अपने पेड़ पर स्वागत करती है। वे दोनों काफ़ी देर तक पेड़ पर बैठकर इधर-उधर की बातें करते रहे। यासुकी-चान के लिए पेड़ पर चढ़ने का यह पहला और अंतिम अवसर था।

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पाठ से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 81)

प्रश्न 1 यासुकी-चान को अपने पेड़ पर चढ़ाने के लिए तोत्तो-चान ने अथक प्रयास क्यों किया? लिखिए।

उत्तर- यासुकी-चान को पोलियो था, इसलिए वह न तो किसी पेड़ पर चढ़ पाता था और न किसी पेड़ को निजी संपत्ति मानता था। जबकि जापान के शहर तोमोए में हर एक बच्चे का एक निजी पेड़ था। तोत्तो-चान जानती थी कि यासुकी-चान आम बालक की तरह पेड़ पर चढ़ने के लिए इच्छुक है। अत: उसकी इसी इच्छा को पूरा करने के लिए तोत्तो-चान ने यासुकी-चान को पेड़ पर चढ़ाने के लिए अथक प्रयास किया।

प्रश्न 2 दृढ़ निश्चय और अथक परिश्रम से सफलता पाने के बाद तोत्तो-चान और यासुकी-चान को अपूर्व अनुभव मिला, इन दोनों के अपूर्व अनुभव कुछ अलग-अलग थे। दोनों में क्या अंतर रहे? लिखिए।

उत्तर- तोत्तो-चान का अनुभव– तोत्तो-चान स्वयं तो रोज ही अपने निजी पेड़ पर चढ़ती थी और खुश होती थी परंतु आज पोलियो से ग्रस्त अपने मित्र यासुकी-चान को पेड़ की द्विशाखा तक पहुँचाने से उसे प्रसन्नता के साथ-साथ अपूर्व आत्म संतुष्टि भी प्राप्त हुई।

यासुकी-चान का अनुभव– यासुकी-चान को पेड़ पर चढ़ कर अत्यधिक प्रसन्नता हुई उसकी मन की इच्छा पूरी हो गई। उसने पेड़ पर चढ़कर दुनिया को निहारा।

प्रश्न 3 पाठ में खोजकर देखिए– कब सूरज का ताप यासुकी-चान और तोत्तो-चान पर पड़ रहा था, वे दोनों पसीने से तरबतर हो रहे थे और कब बादल का एक टुकड़ा उन्हें छाया देकर कड़कती धूप से बचाने लगा था। आपके अनुसार इस प्रकार परिस्थिति के बदलने का कारण क्या हो सकता है?

उत्तर- सूरज का ताप उन पर तब पड़ रहा था। जब तोत्तो-चान और यासुकी-चान एक तिपाई-सीढ़ी के द्वारा पेड़ की द्विशाखा तक पहुँच रहे थे। बादल का टुकड़ा बीच-बीच में छाया करके उन्हें कड़कती धूप से बचा रहा था। जब तोत्तो-चान अपनी पूरी ताकत से यासुकी-चान को पेड़ की ओर खींच रही थी। इस प्रकार परिस्थिति बदलने का कारण मेरे अनुसार दोनों मित्रों के प्रति प्रकृति की सहृदयता थी। प्रकृति भी चाहती थी कि दोनों बच्चे अपने-अपने प्रयास में सफल हो।

प्रश्न 4 ‘यासुकी-चान को लिए पेड़ पर चढ़ने का यह ….. अंतिम मौका था’ – इस अधूरे वाक्य को पूरा कीजिये और लिखकर बताइए कि लेखिका ने ऐसा क्यों लिखा होगा।

उत्तर- लेखिका ने ऐसा इसलिए लिखा होगा क्योंकि एक तो यासुकी-चान पोलियो से पीड़ित था और वह स्वयं पेड़ पर चढ़ने में असमर्थ था। दूसरा तोत्तो-चान बहुत जोखिम उठा कर अपने माता-पिता को बिना बताए उसे पेड़ पर चढ़ा पाई थी परन्तु शायद वह दोबारा ऐसा कभी ना कर पाएँ।

पाठ से आगे प्रश्न (पृष्ठ संख्या 81)

प्रश्न 1 तोत्तो-चान ने अपनी योजना को बड़ों से इसलिए छिपा लिया कि उसमें जोखिम था, यासुकी-चान के गिर जाने की संभावना थी। फिर भी उसके मन में यासुकी-चान को पेड़ पर चढ़ाने की दृढ़ इच्छा थी। ऐसी दृढ़ इच्छाएँ बुद्धि और कठोर परिश्रम से अवश्य पूरी हो जाती हैं। आप किस तरह की सफलताके लिए तीव्र इच्छा और बुद्धि उपयोग कर कठोर परिश्रम करना चाहते हैं?

उत्तर- हम कुछ ऐसे कार्यों के लिए कठिन परिश्रम और बुद्धि का प्रयोग करेंगे जिसमें हम किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट ला सकें।

प्रश्न 2 हम अकसर बहादुरी के बड़े-बड़े कारनामों के बारे में सुनते रहते हैं, लेकिन ‘अपूर्व अनुभव’ कहानी एक मामूली बहादुरी और जोखिम की ओर हमारा ध्यान खींचती है। यदि आपको अपने आसपास के संसार में कोई रोमांचकारी अनुभव प्राप्त करना हो तो कैसे प्राप्त करेंगे?

उत्तर- रोमांच का अनुभव उन्हीं कार्यों में होता है, जिन्हें करने में खतरा हो या डर हो। छात्र स्वयं उत्तर दे कि ऐसा कौन सा काम है जिसे करके वे रोमांचकारी अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

अनुमान और कल्पना प्रश्न (पृष्ठ संख्या 81-82)

प्रश्न 1 अपनी माँ से झूठ बोलते समय तोत्तो-चान की नज़रें नीचे क्यों थीं?

उत्तर- उसका झूठ पकड़ा न जाए इसलिए अपनी माँ से झूठ बोलते समय तोत्तो-चान की नज़रें नीचे थीं।

प्रश्न 2 यासुकी-चान जैसे शारीरिक चुनौतियों से गुज़रनेवाले व्यक्तियों के लिए चढ़ने-उतरने की सुविधाएँ हर जगह नहीं होतीं। लेकिन कुछ जगहों पर ऐसी सुविधाएँ दिखाई देती हैं। उन सुविधावाली जगहों की सूची बनाइए।

उत्तर- निजी और सरकारी अस्पतालों, बस अड्डों, रेलवे स्थानकों, विमान तलों, शॉपिग मालों व मेट्रो रेल जैसे स्थानों में शारीरिक चुनौतियों से गुजरने वाले व्यक्तियों के लिए चढ़ने-उतरने के लिए विशेष रैंप और लिफ्ट की सुविधाएँ दी जाती है।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 82)

प्रश्न 1 द्विशाखा शब्द द्वि और शाखा के योग से बना है- दो और शाखा का अर्थ है-डाल। द्विशाखा पेड़ के तने का वह भाग है जहाँ से दो मोटी-मोटी डालियाँ एक साथ निकलती हैं। द्वि की भाँति आप त्रि से बननेवाला शब्द त्रिकोण जानते होंगे। त्रि का अर्थ है तीन। इस प्रकार चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ और दस संख्यावाची संस्कृत शब्द उपयोग में अकसर आते हैं। इन संख्यावाची शब्दों की जानकारी प्राप्त कीजिए और देखिए कि क्या इन शब्दों की ध्वनियाँ अंग्रेजी संख्या के नामों से कुछ-कुछ मिलती-जुलती है, जैसे हिन्दी-आठ, संस्कृत-अष्ट, अंग्रेजी-एट।

उत्तर-

हिंदीसंस्कृतअंग्रेजी
एकएकमवन
दोद्वविटू
तीनत्रिर्थी
चारचतुर्थफोर
पाँचपंचफाइव
छःषष्ठसिक्स
सातसप्तसेवन
आठअष्टएट
नौनवमनाइन
दसदशटेन

प्रश्न 2 पाठ में ‘ठिठियाकर हँसने लगी’, ‘पीछे से धकियाने लगी’ जैसे वाक्य आए हैं। ठिठियाकर हँसने के मतलब का आप अवश्य अनुमान लगा सकते हैं। ठी-ठी-ठी हँसना या ठठा मारकर हँसना बोलचाल में प्रयोग होता है। इनमें हँसने की ध्वनि के एक खास अंदाज़ को हँसी का विशेषण बना दिया गया है। साथ ही ठिठियाना और धकियाना शब्द में ‘आना’प्रत्यय का प्रयोग हुआ है। इस प्रत्यय से फ़िल्माना शब्द भी बन जाता है। ‘आना’ प्रत्यय से बननेवाले चार सार्थक शब्द लिखिए।

उत्तर- बतियाना, बचाना, बताना, चलाना, ललचाना, शर्माना, लजाना।

Class 7 हिन्दी – अध्याय-6: शाम-एक किसान

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-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सारांश

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी ने अपनी कविता ‘शाम-एक किसान’ में शाम के समय का बड़ा ही मनोहर वर्णन किया है। शाम का प्राकृतिक दृश्य बहुत ही सुंदर है। इस दौरान पहाड़ – बैठे हुए किसी किसान जैसा दिख रहा है। आकाश उसके माथे पर बंधे एक साफे (पगड़ी) की तरह दिख रहा है। पहाड़ के नीचे बह रही नदी, किसान के पैरों पर पड़ी चादर जैसी लग रही है। पलाश के पेड़ों पर खिले लाल फूल किसी अंगीठी में रखे अंगारों की तरह दिख रहे हैं। फिर पूर्व दिशा में गहराता अंधेरा भेड़ों के झुंड जैसा लगता है। अचानक मोर के बोलने से सब बदल जाता है और शाम ढल जाती है।

भावार्थ

आकाश का साफ़ा बाँधकर

सूरज की चिलम खींचता

बैठा है पहाड़,

घुटनों पर पड़ी है नही चादर-सी,

पास ही दहक रही है

पलाश के जंगल की अँगीठी

अंधकार दूर पूर्व में

सिमटा बैठा है भेड़ों के गल्‍ले-सा।

नए शब्द /कठिन शब्द

साफ़ा- सिर पर बाँधने वाली पगड़ी

चिलम- हुक्के के ऊपर रखने वाली वस्तु

चादर-सी –चादर के समान

दहक रही है – जल रही है

पलाश- एक प्रकार का वृक्ष जिस पर लाल रंग के फूल खिलते हैं

सिमटा- दुबका हुआ

गल्ले-सा- समूह के समान

भावार्थ- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी अपनी कविता शाम एक किसान की इन पंक्तियों में शाम होने के समय प्राकृतिक दृश्य का बड़ा ही मनोरम वर्णन कर रहे हैं।

उनके अनुसार, शाम के समय पहाड़ किसी बैठे हुए किसान की तरह दिख रहा है और आसमान उसके सिर पर रखी किसी पगड़ी की तरह दिख रहा है। पहाड़ के नीचे बह रही नदी, किसान के घुटनों पर रखी किसी चादर जैसी लग रही है। पलाश के पेड़ों पर खिले लाल पुष्प कवि को अंगीठी में जलते अंगारों की तरह दिख रहे हैं। पूर्व में फैलता अंधेरा सिमटकर बैठी भेड़ों की तरह प्रतीत हो रहा है।

पश्चिम दिशा में मौजूद सूरज चिलम पर रखी आग की तरह लग रहा है। चारों तरफ एक मनभावन शांति छाई है।

अचानक- बोला मोर।

जैसे किसी ने आवाज़ दी-

‘सुनते हो’।

चिलम औंधी

धुआँ उठा-

सूरज डूबा

अंधेरा छा गया।

भावार्थ- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी ने अपनी कविता शाम एक किसान के इस पद्यांश में शाम के मनोहर सन्नाटे के भंग होने का वर्णन किया है। चारों तरफ छाई शांति के बीच अचानक एक मोर बोल पड़ता है, मानो कोई पुकार रहा हो, ‘सुनते हो!’ फिर सारा दृश्य किसी घटना में बदल जाता है, जैसे सूरज की चिलम किसी ने उलट दी हो, जलती आग बुझने लगी हो और धुंआ उठने लगा हो। असल में, अब सूरज डूब रहा है और चारों तरफ अंधेरा छाने लगा है।

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कविता से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 64-65)

प्रश्न 1 इस कविता में शाम के दृश्य को किसान के रूप में दिखाया गया है- यह एक रूपक है। इसे बनाने के लिए पाँच एकरूपताओं की जोड़ी बनाई गई है। उन्हें उपमा कहते हैं। पहली एकरूपता आकाश और साफ़े में दिखाते हुए कविता में ‘आकाश का साफ़ा’ वाक्यांश आया है। इसी तरह तीसरी एकरूपता नदी और चादर में दिखाई गई है, मानो नदी चादर-सी हो। अब आप दूसरी, चौथी और पाँचवी एकरूपताओं को खोजकर लिखिए।

उत्तर- दूसरी एकरूपता – चिलम सूरज-सी

चौथी एकरूपता – अँगीठी पलाश के फूलों-सी

पाँचवी एकरूपता – अंधकार भेड़ों के गल्ले-सा

प्रश्न 2 शाम का दृश्य अपने घर की छत या खिड़की से देखकर बताइए–

  1. शाम कब से शुरू हुई?
  2. तब से लेकर सूरज डूबने में कितना समय लगा?
  3. इस बीच आसमान में क्या-क्या परिवर्तन आए?

उत्तर-

  1. शाम छः बजे से शुरू हुई।
  2. सूरज को डूबने में करीब एक घंटा लगा।
  3. इस बीच आसमान का रंग लाल और कुछ देर बाद पीले रंग में परिवर्तित हो गया और कुछ देर बाद सूरज आसमान से गायब हो गया और चारों ओर अँधेरा छा गया।

प्रश्न 3 मोर के बोलने पर कवि को लगा जैसे किसी ने कहा हो- ‘सुनते हो’। नीचे दिए गए पक्षियों की बोली सुनकर उन्हें भी एक या दो शब्दों में बाँधिए-

कबूतर, कौआ ,मैना, तोता, चील, हंस

उत्तर- कबूतर- भाई, ख़त ले लो।

कौआ- सुनते हो, घर में मेहमान आने वाले हैं।

मैना- कैसे हो?

तोता- राम! राम! भाई।

चील- अरे,वह देखो नीचे क्या पड़ा है।

हंस- मेरी तरह शांत और स्वच्छ रहो

कविता से आगे प्रश्न (पृष्ठ संख्या 65)

प्रश्न 1 इस कविता को चित्रित करने के लिए किन-किन रंगों का प्रयोग करना होगा?

उत्तर- इस कविता को चित्रित करने के लिए हमें पीला, भूरा, लाल, सफ़ेद, काला, हरा, आदि अनेक रंगों का प्रयोग करना पड़ेगा।

प्रश्न 2 शाम के समय ये क्या करते हैं? पता लगाइए और लिखिए-

पक्षी, खिलाड़ी, फलवाले,माँ, पेड़-पौधे, पिताजी, किसान, बच्चे

उत्तर- पक्षी-अपने घोंसलों की ओर लौटने लगते हैं।

पेड़-पौधो-शांत खड़े रहते हैं मानो विश्राम कर रहे हों।

खिलाड़ी-खेल खत्म कर विश्राम करने लगते हैं।

पिताजी-आफिस से घर लौटते हैं।

फलवाले बचे हुए फल जल्दी बेचकर घर जाना चाहते हैं।

किसान-खेतों से घर लौटने लगते हैं।

माँ-मंदिर में दिया जलाने जाती है।

बच्चे-खेल में मग्न रहते हैं।

प्रश्न 3 हिन्दी के एक प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत ने संध्या का वर्णन इस प्रकार किया है- 

संध्या का झुटपुट- 

बाँसों का झुरमुट- 

है चहक रहीं चिडि़याँ 

टी-वी-टी–टुट्-टुट् 

  • ऊपर दी गई कविता और सर्वेश्वरदयाल जी की कविता में आपको क्या मुख्य अंतर लगा? लिखिए।

उत्तर- सुमित्रानंदन पंत ने अपनी कविता में संध्या का दृश्य चिड़ियों के माध्यम से दिखाया है वहीं सर्वेश्वरदयाल जी ने संध्या का दृश्य किसान के माध्यम से प्रस्तुत किया है। यही इन दोनों की कविताओं में मुख्य अंतर है

अनुमान और कल्पना प्रश्न (पृष्ठ संख्या 65)

प्रश्न 1 शाम के बदले यदि आपको एक कविता सुबह के बारे में लिखनी हो तो किन-किन चीज़ों की मदद लेकर अपनी कल्पना को व्यक्त करेंगे? नीचे दी गई कविता की पंक्तियों के आधार पर सोचिए-

पेड़ों के झुनझुने

बजने लगे

लुढ़कती आ रही है

सूरज की लाल गेंद।

उठ मेरी बेटी, सुबह हो गई। -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

उत्तर- दूर पूर्व आकाश में

किरणों ने

सिंदूरी कालीन बिछाया है,

आने वाले हैं दिनकर

और सोया जग

जगने वाला है।

तो प्रकट हो गए बाल अरुण

एक नया सवेरा आया है,

नई उमंगों, आशाओं संग

नया दिवस एक आया है।

अरुणोदय ने

अंधकार, आलस को दूर भगाया है

रवि की अग्नी और तेज से

हर कण-कण जगमगाया है।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 66)

प्रश्न 1 नीचे लिखी पंक्तियों में रेखांकित शब्दों को ध्यान से देखिए-

  1. घुटनों पर पड़ी है नदी चादर-सी
  2. सिमटा बैठा है भेड़ों के गल्ले-सा
  3. पानी का परदा-सा मेरे आसपास था हिल रहा
  4. मँडराता रहता था एक मरियल-सा कुत्ता आसपास
  5. दिल है छोटा-सा छोटी-सी आशा
  6. घास पर फुदकती नन्ही-सी चिड़िया
  • इन पंक्तियों में सा/ सी का प्रयोग व्याकरण की दृष्टि से कैसे शब्दों के साथ हो रहा है?

उत्तर- इन पंक्तियों में सा/ सी का प्रयोग व्याकरण की दृष्टि से ‘संज्ञा’ और ‘विशेषण’ शब्दों के साथ हो रहा है। ‘चादर’, ‘गल्ला’ और ‘परदा’ संज्ञा शब्द हैं जबकि ‘मरियल’, ‘छोटा’ और ‘नन्ही’ विशेषण शब्द हैं।

प्रश्न 2 निम्नलिखित शब्द का प्रयोग आप किन संदर्भ में करेंगे? शब्द से दो-दो वाक्य बनाइए-

  1. औंधी
  2. दहक
  3. सिमटा

उत्तर-

  1. औंधी-मुँह के बल या ‘उल्टा’ के अर्थ में-
  • कमरे में टोकरी औंधी पड़ी है।
  • कोप भवन में कैकेयी औंधी पड़ी थी।
  1. दहक-प्रबल वेग होने के अर्थ में-
  • महेश बाबू क्रोध से दहक रहे थे।
  • अँगीठी में आग दहक रही है।
  1. सिमटा-सिकुड़ा हुआ के अर्थ में तथा समाप्त होने के अर्थ में-
  • मोहन रजाई में सिमटा बैठा है।
  • सारा सामान कमरे में सिमटा पड़ा है।
  • जमीन खरीदने तथा घर बनाने का सारा काम सिमट गया है।

Class 7 हिन्दी – अध्याय-5: पापा खो गए

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-श्री विजय तेंदुलकर

सारांश

प्रस्तुत पाठ विजय तेंदुलकर द्वारा लिखी गई एकांकी है। इस एकांकी में उन्होंने निर्जीव वस्तुओं को सजीव रूप में प्रस्तुत किया है।

इस कहानी में मुख्य पात्र हैं-

बिजली का खंभा

पेड़

लैटर बॉक्स

कौआ

नाचने वाली

लड़की

आदमी

समुद्र के किनारे एक फुटपाथ पर एक बिजली का खंभा,एक पेड़ और एक लेटर बॉक्स है। वहीँ दीवार पर एक सिनेमा का एक पोस्टर लगा है जिसमें एक नृत्य की भंगिमा में एक औरत की आकृति है। पेड़ सबसे पहले से उस स्थान पर हैं बाद में खंभा,लेटर बॉक्स और पोस्टर लगाए गए हैं।

कहानी का सार कुछ इस प्रकार है-

यह एकांकी एक रात की एक घटना का वर्णन है। रात में हवा तेज थी, जिससे पोस्टर पर बनी महिला का संलुलन बिगड़ जाता है और उसके घुंघरू बज उठते हैं। रात के अँधेरे में पेड़ और खंभा आपस में बातें कर रहे हैं। लेटर बॉक्स समय बिताने पर अपने पेट में चिठ्ठियों को पढ़ने लगता है। उसी समय किसी के आने की आहट सुनकर सभी चुप्पी साध लेते हैं। एक दुष्ट व्यक्ति एक छोटी बच्ची को अपने कंधे पर उठाकर उसे पेड़ की ओट में डाल देता है। यह दुष्ट व्यक्ति एक बच्चे उठाने वाला था। यह व्यक्ति लड़की को उठा लाया था और उसे बेहोशी की दवा दे दी थी। उस व्यक्ति को भूख लग आती है तो वह उस पर अपना कोट डालकर खाने की तलाश में निकल जाता है।

उस लड़की को देखकर सब चिंतित हो जाते हैं। वे सब उसकी रक्षा करने के संदर्भ में आपस में चर्चा करने लगते हैं। उनकी बातचीत को सुनकर लड़की जाग जाती और आश्चर्यचकित हो जाती हैं कि ये आवाजें कहाँ से आ रही है। तब लेटर बॉक्स उसे बताता है कि निर्जीव होने के बावजूद वे बात कर सकते हैं। लड़की यह जानकर खुश हो जाती है। सभी उससे उसके घर का पता जानने का प्रयास करते हैं परन्तु लड़की उन्हें कुछ ठीक से बता नहीं पाती।

थोड़ी देर में वह दुष्ट आदमी लौट आता है। सभी चुप हो जाते हैं और बच्ची छिप जाती है। वह दुष्ट आदमी बच्ची को न पाकर क्रोधित हो जाता है और बच्ची को खोजने लगता है। सभी बच्ची को छिपाने का प्रयास करते हैं। इतने में कौआ भूत-भूत चिल्लाता है जिससे डरकर वह भाग जाता है। लड़की पोस्टर वाली औरत के पीछे से बाहर निकल आती है और थककर सो जाती है।

अब सब उस लड़की को घर पर पहुँचाने के बारे में सोचने लगते हैं। अचानक कौए को एक तरकीब सूझती है कि पेड़ सुबह तक लड़की के ऊपर अपनी छाया रखें जिससे वह देर तक सोती रहे। खंभे से कहता है की वह पेड़ से टिककर खड़ा रहे ताकि लोगों को लगे यहाँ पर कोई अपघात हो गया है। लोग पुलिस को बुलाएँगे। पुलिस लड़की को देखेगी और उसका घर का पता मालूम कर उसे उसके घर तक पहुँचा देगी। लेटर बॉक्स को लगता है कि इतना सब करने पर भी कुछ नहीं हुआ तो? तब कौआ उससे कहता है कि तुम तो पढ़े लिखे हो, तुम्हें ही कुछ करना होगा।

सुबह होते ही सब देखते हैं कि पेड़ झुककर लड़की पर छाया किये हुए है। लड़की गहरी नींद में है। खंभा टेढ़ा है। कौआ काँव-काँव कर सबका ध्यान आकर्षित कर रहा है और पोस्टर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है ‘पापा खो गए’। लेटर बॉक्स सबसे कहता है कि यदि किसी ने इस प्यारी बच्ची के पापा को देखा हो, तो उसे यहाँ ले आएँ।

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नाटक से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 40)

प्रश्न 1 नाटक में आपको सबसे बुद्धिमान पात्र कौन लगा और क्यों?

उत्तर- नाटक में सबसे बुद्धिमान पात्र मुझे कौआ लगा क्योंकि उसने ही लड़की के पापा को खोजने का उपाय बताया। उसी की योजना के कारण लैटरबक्स सन्देश लिख पाता है।

प्रश्न 2 पेड़ और खंभे में दोस्ती कैसे हुई?

उत्तर- एक बार जोरों की आँधी आने के कारण खंभा पेड़ के ऊपर गिर जाता है, उस समय पेड़ उसे सँभाल लेता है और इस प्रयास में वह ज़ख्मी भी हो जाता है। इस घटना से खंभें में जो गुरुर होता है, वह खत्म हो जाता है और अंत में दोनों की दोस्ती हो जाती है।

प्रश्न 3 लैटरबक्स को सभी लाल ताऊ कहकर क्यों पुकारते थे?

उत्तर- लैटरबक्स ऊपर से नीचे पूरा लाल रंग में रँगा था साथ ही वह बड़ों की तरह बातें भी करता था इसलिए सभी उसे लाल ताऊ कहकर पुकारते थे।

प्रश्न 4 लाल ताऊ किस प्रकार बाकी पात्रों से भिन्न है?

उत्तर- लाल ताऊ को पढ़ना-लिखना आता है इसलिए वो नाटक के अन्य पात्रों से भिन्न है। उसे दोहे भजन भी गाना आता है।

प्रश्न 5 नाटक में बच्ची को बचानेवाले पात्रों में एक ही सजीव पात्र है। उसकी कौन-कौन सी बातें आपको मजेदार लगीं? लिखिए।

उत्तर- नाटक में बच्ची को बचानेवाले पात्रों में एक ही सजीव पात्र कौआ है। उसकी कुछ मजेदार बातें हैं-

  • “ताऊ एक जगह बैठकर यह कैसे जान सकोगे? उसके लिए तो मेरी तरह रोज चारों दिशाओं में गश्त लगानी पड़ेगी, तब जान पाओगे यह सब।”
  • “वह दुष्ट कौन है? पहले उसे नज़र तो आने दीजिए।”
  • “सुबह जब हो जाए तो पेड़ राजा, आप अपनी घनी छाया इस पर किये रहें। वह आराम से देर तक सोई रहेगी।”

प्रश्न 6 क्या वजह थी कि सभी पात्र मिलकर भी लड़की को उसके घर नहीं पहुँचा पा रहे थे?

उत्तर- सभी पात्र मिलकर भी लड़की को उसके घर नहीं पहुँचा पा रहे थे क्योंकि लड़की बहुत छोटी थी उसे अपने घर का पता, यहाँ तक कि अपने पापा के नाम भी मालूम नही था जिस कारण उसे घर पहुँचाना बहुत कठिन था।

नाटक से आगे प्रश्न (पृष्ठ संख्या 61)

प्रश्न 1 अपने-अपने घर का पता लिखिए तथा चित्र बनाकर वहाँ पहुँचने का रास्ता भी बताइए।

उत्तर- अपनी जानकारी के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर दें।

प्रश्न 2 मराठी से अनूदित इस नाटक का शीर्षक ‘पापा खो गए’ क्यों रखा गया होगा ? अगर आपके मन में कोई दूसरा शीर्षक हो तो सुझाइए और साथ में कारण भी बताइए।

उत्तर- लड़की को अपने पापा का नाम-पता कुछ भी मालूम नहीं था। इधर-उधर आपस में बातें करने पर भी इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती। तब सभी पात्र एक जुट होकर लड़की के पापा को ढूंढने की योजना बनाते हैं। सम्भवतः इसी कारण से इस नाटक का शीर्षक ‘पापा खो गए’ रखा गया होगा।

प्रस्तुत नाटक में लड़की अपने पापा से अलग होकर खो जाती है। नाटक के अधिकांश भाग में लड़की के नाम-पते की जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश की जाती है। अत: पाठ का नाम ‘लापता बच्ची’ रखना अधिक उपयुक्त लगता है।

प्रश्न 3 क्या आप बच्ची के पापा को खोजने का नाटक से अलग कोई और तरीका बता सकते हैं?

उत्तर- बच्ची को पुलिस स्टेशन ले जाकर उसके खो जाने की रिपोर्ट लिखवानी चाहिए। इससे पुलिस उसके पापा को ढूँढ़कर बच्ची को उन्हें सौप देंगे।

अनुमान और कल्पना प्रश्न (पृष्ठ संख्या 61)

प्रश्न 1 अनुमान लगाइए कि जिस समय बच्ची को चोर ने उठाया होगा वह किस स्थिति में होगी? क्या वह पार्क/ मैदान में खेल रही होगी या घर से रूठकर भाग गई होगी या कोई अन्य कारण होगा?

उत्तर- नाटक को पढ़कर ऐसा लगता है कि जिस समय चोर ने बच्ची को  उठाया होगा वह गहरी नींद में सो रही थी। तभी तो चोर कहता है-

अभी थोड़ी देर पहले एक घर से यह लड़की उठाई है मैंने। गहरी नींद सो रही थी ———————- मैंनें इसे थोड़ी बेहोशी की दवा जो दी है”। यदि वह पार्क या मैदान से उठाई जाती तो लड़की चुराने पर लड़की चीखती-चिल्लाती। पर नाटक में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं है।

प्रश्न 2 नाटक में दिखाई गई घटना को ध्यान में रखते हुए यह भी बताइए कि अपनी सुरक्षा के लिए आजकल बच्चे क्या-क्या कर सकते हैं। संकेत के रूप में नीचे कुछ उपाय सुझाए जा रहे हैं। आप इससे अलग कुछ और उपाय लिखिए।

  • समूह में चलना।
  • एकजुट होकर बच्चा उठानेवालों या ऐसी घटनाओं का विरोध करना।
  • अनजान व्यक्तियों से सावधानीपूर्वक मिलना।

उत्तर- नाटक की इस घटना को ध्यान में रखते हुए बच्चों को कभी भी अकेले नहीं चलना चाहिए हमेशा अपने माता-पिता या किसी परिचित व्यक्ति के साथ ही चलना चाहिए। कोई अपरिचित व्यक्ति अगर जबरदस्ती करे या किसी तरह का प्रलोभन दे तो उसका विरोध करना चाहिए। जैसे- चीखकर या चिल्लाकर लोगों की सहायता माँगनी चाहिए।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 61-62)

प्रश्न 1 आपने देखा होगा कि नाटक के बीच-बीच में कुछ निर्देश दिए गए हैं। ऐसे निर्देशों से नाटक के दृश्य स्पष्ट होते हैं, जिन्हें नाटक खेलते हुए मंच पर दिखाया जाता है,

जैसे- ‘सड़क/ रात का समय…दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज।’ यदि आपको रात का दृश्य मंच पर दिखाना हो तो क्या-क्या करेंगे, सोचकर लिखिए।

उत्तर- रात का दृश्य दिखाने के लिए हम निम्नलिखित निर्देशों का प्रयोग कर सकते हैं-

  • चाँदनी रात का दृश्य है। आसमान में तारे दिख रहे हैं।
  • अँधेरी रात होने के कारण सड़कें सुनसान हैं। कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही है।

प्रश्न 2 पाठ को पढ़ते हुए आपका ध्यान कई तरह के विराम चिहन की ओर गया होगा। अगले पृष्ठ पर दिए गए अंश से विराम चिह्नों को हटा दिया गया है। ध्यानपूर्वक पढि़ए तथा उपयुक्त चिहन लगाइए- 

मुझ पर भी एक रात आसमान से गड़गड़ाती बिजली आकर पड़ी थी अरे बाप रे वो बिजली थी या आफ़त याद आते ही अब भी दिल धक-धक करने लगता है और बिजली जहाँ गिरी थी वहाँ खड्डा कितना गहरा पड़ गया था खंभे महाराज अब जब कभी बारिश होती है तो मुझे उस रात की याद हो आती है, अंग थरथर काँपने लगते हैं

उत्तर- मुझ पर भी एक रात आसमान से गड़गड़ाती बिजली आकर पड़ी थी। अरे, बाप रे! वो बिजली थी या आफ़त ! याद आते ही अब भी दिल धक-धक करने लगता है और बिजली जहाँ गिरी थी वहाँ खड्डा कितना गहरा पड़ गया था, खंभे महाराज! अब जब कभी बारिश होती है तो मुझे उस रात की याद हो आती है। अंग थरथर काँपने लगते हैं।

प्रश्न 3 आसपास की निर्जीव चीज़ों को ध्यान में रखकर कुछ संवाद लिखिए जैसे-

  • चॉक का ब्लैक बोर्ड से संवाद
  • कलम का कॉपी से संवाद
  • खिड़की का दरवाज़े से संवाद

उत्तर- चॉक का ब्लैक बोर्ड से संवाद

चॉक-आह! यह जीवन भी कोई जीवन है।

ब्लैक बोर्ड-क्या हुआ चॉक भाई?

चॉक: क्या पूछते हो? देखते नहीं? कितनी बेदर्दी से मुझे घिसा गया है। सुबह तक मैं ठीक-ठाक था, दोपहर तक आधा भी नहीं रहा।

क बोर्ड: ऐसा क्यों सोचते हो? तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारे माध्यम से बच्चों को शिक्षित किया जा रहा है।

चॉक: मुझे अपनी तबाही पर रोना आ रहा है और तुम खुशी की बात कर रहे हो।

ब्लैक बोर्ड: हाँ भाई। जरा सोचो यदि तुम न रहो तो शिक्षक बच्चों को अच्छी तरह कैसे समझा सकेंगे।

चॉक: रहने दो ये महानता की बातें। वैसे भी तुम्हें क्या फर्क पड़ने वाला, दर्द तो मुझे हो रहा है।

ब्लैक बोर्ड: ऐसा मत कहो। तुम्हारा दर्द तो एक-दो दिन का है, पर मैं तो बरसों ये अपने ऊपर असंख्य शब्दों के उकेरे जाने का दर्द सहता आ रहा हूँ।

चॉक: फिर भी तुम्हें कोई शिकायत नहीं?

ब्लैक बोर्ड: नहीं। क्योंकि मुझे अपना महत्व पता है। मैं जानता हूँ मुझ पर लिखे गए ये शब्द कितने बच्चों के जीवन में ज्ञान की रोशनी फैलाते हैं। जब ये बातें सोचता हूँ तो मुझे अपने ब्लैकबोर्ड होने पर गर्व होता है।

चॉक: शायद तुम ठीक कहते हो। मैंने कभी इस तरह नहीं सोचा। सचमुच हमें खुद पर नाज होना चाहिए कि हम ज्ञान के प्रसार में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तुम्हारी बात सुन कर दर्द कम हो गया। अब तो नेकी की इस राह मे खुद को न्यौछावर कर देने की इच्छा होती है।

कलम का कॉपी से संवाद

कॉपी: उफ! ये क्या किया?

कलम: माफ करना बहन!

कॉपी: देख कर नहीं चल सकती? सारे पन्ने खराब कर दिए।

कलम: मेरी गलती नहीं है बहन। मुझे ऐसे चलाया गया कि स्याही फैल गई।

कॉपी: स्याही तुम्हारी है और गलती चलाने वाले की? कितना हिफाज़त से रखा था खुद को, सब बेकार कर दिया।

कलम: मेरी स्याही से इतनी नाराजगी क्यों बहन? मत भूलो इस स्याही से ही हम दोनों की उपयोगिता है।

कॉपी: जानती हूँ, पर तुम्हें भी समझना चाहिए कि स्याही का सही ढंग से प्रयोग कैसे हो। नहीं तो तुम्हें और मुझे दोनों को कूड़े के डिब्बे में जाना पड़ेगा।

कलम: अरे बाबा! गलती हो गई। इतना उपदेश मत दो। फिर कभी ऐसा नहीं करूँगी।

कॉपी: वादा?

कलम: पक्का वादा।

खिड़की का दरवाजे से संवाद

खिड़की: क्या बात है दरवाज़े भाई? आज बड़ी आवाजें कर रहे हो?

दरवाजा: क्या कहूँ बहन, खुलते बंद होते मेरे तो कब्जे हिल गए हैं। दर्द से चीख निकल ही जाती है।

खिड़की: कल तक तो ठीक थे।

दरवाज़ा: अरे, यह सब उस नटखट बच्चे की कारस्तानी है। इतनी जोर से धकेला मुझे कि मैं सर से पाँव तक हिल गया और चोट लगी सो अलग।

खिड़की: बच्चा है भाई। क्या करोगे?

दरवाज़ा: यही सोच कर तो छोड़ दिया। नहीं तो जी में आया था, उसकी उँगली ही दबा लूँ।

खिड़की: हा… हा…। बच्चे की उंगली दबा लेने से क्या तुम्हारा दर्द कम हो जाता भैया।

दरवाज़ा: अरे, मेरा क्या दर्द कम होगा और किसे परवाह है मेरे दर्द की? इतने दिनों से घर की हिफाजत कर रहा हूँ। किसी को ये ख्याल न आया कि बच्चे की गलती पर जरा उसे डाँट ही लगा दें।

खिड़की: भैया, तुम तो लगता है ज्यादा ही बुरा मान गए।

दरवाज़ा: बुरा मानने की बात ही है। किसी के लिए इतना करो और किसी को तुम्हारी परवाह ही नहीं।

खिड़की: अरे भैया, चिंता मत करो। खूब परवाह है उन्हें तुम्हारी। क्या वो नहीं जानते कि तुम्हारे नहीं रहने पर उन्हें क्या खतरा है? देखना शाम तक वो तुम्हें ठीक करने की कोई-न-कोई व्यवस्था जरूर करेंगे।

दरवाज़ा: भगवान करे बहन ऐसा ही हो। मेरी तो जान निकली जा रही है दर्द से।

खिड़की: हिम्मत रखो। सब ठीक हो जाएगा।

प्रश्न 4  उपर्युक्त में से दस-पंद्रह संवादों को चुनें, उनके साथ दृश्यों की कल्पना करें और एक छोटा सा नाटक लिखने का प्रयास करें। इस काम में अपने शिक्षक से सहयोग लें।

उत्तर- छात्र स्वयं करे

Class 7 हिन्दी – अध्याय-4: मीठाईवाला

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-भगवतीप्रसाद वाजपेयी

सारांश

मिठाई वाला कहानी एक बहुत ही मार्मिक कहानी है। यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो अपने बच्चे किसी कारणवश खो देता है और अब उन्हीं बच्चों का प्यार वह अन्य बच्चों की खुशी में तलाशता है।

कहानी का सार कुछ इस प्रकार है।

नगर में एक मादक-मधुर स्वर में गाने वाला खिलौने वाला आता है। उसका स्वर इतना मादक होता है कि बच्चे तो बच्चे जवान भी उसे देखने के लिए उत्सुक हो उठते थे। खिलौने वाला बच्चों को उनके मनपसंद खिलौने कम दाम में बेचकर निकल जाता था। राय विजयबहादुर के बच्चे भी खिलौने लेकर घर पहुँचते है खिलौने का दाम सुनकर उनकी पत्नी रोहिणी सोच में पड़ जाती है कि इतने सस्ते में खिलौने वाला खिलौने क्यों बेचता होगा।

छह महीने बाद नगर में एक मुरलीवाले के आने का समाचार फैल जाता है। वह भी उसी तरह गाना गाकर मुरली सुनाकर केवल दो पैसों में मुरली बेचता है। रोहिणी भी अपने पति से अपने बच्चों के लिए मुरली खरीदने का आग्रह करती है। मुरली वाले के जाने के बाद फिर रोहिणी विचार करती है कि आज तक बच्चों से इस तरह प्यार से पेश आने वाला उसने कोई फेरीवाला न देखा। और अपना सौदा भी कितना सस्ता बेचता है।

कई महीने इसी तरह बीत गए करीब आठ महीने बाद पुन: गलियों में मिठाई वाले का वही मीठा स्वर गूँज उठता है। ‘बच्चों को बहलाने वाला मिठाईवाला।’

रोहिणी अपने बच्चों के लिए मिठाई खरीदने के लिए उसे बुलाती है। बातचीत के दौरान रोहिणी को पता चलता है खिलौनेवाला, मुरलीवाला और मिठाईवाला ये तीनों एक ही व्यक्ति हैं जो आज उसके सामने बैठा है। रोहिणी को उसके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है और तब उसे मुरलीवाले से पता चलता है कि मुरली वाला संपन्न परिवार से हैं परन्तु किसी कारणवश उसकी पत्नी और बच्चों की मृत्यु हो जाती है। अत: अपने खोये हुए बच्चों का प्यार पाने के लिए ही वह इस प्रकार नगर में घूमकर बच्चों से जुड़े सस्ते दामों में सामान बेचता है।

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कहानी से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 30)

प्रश्न 1 मिठाईवाला अलग-अलग चीजें क्यों बेचता था और वह महीनों बाद क्यों आता था?

उत्तर- बच्चे एक चीज़ से ऊब न जाएँ इसलिए मिठाईवाला अलग-अलग चीजें बेचता था। बच्चों में उत्सुकता बनाए रखने के लिए वह महीनों, बाद आता था। साथ ही चीजें न मिलने से बच्चे रोएँ, ऐसा मिठाई वाला नहीं चाहता था।

प्रश्न 2 मिठाईवाले में वे कौन से गुण थे जिनकी वजह से बच्चे तो बच्चे, बड़े भी उसकी ओर खिंचे चले आते थे?

उत्तर- निम्नलिखित कारणों से बच्चे तथा बड़े मिठाईवाले की ओर खिंचे चले आते थे-

  • मिठाई वाला मादक-मधुर ढंग से गाकर अपनी चीज़ों को बेचता था।
  • वह कम लाभ में बच्चों को खिलौने तथा मिठाइयाँ देता था।
  • उसके हृदय में बच्चों के लिए स्नेह था, वह कभी गुस्सा नहीं करता था।
  • हर बार नई चीजें लाता था।

प्रश्न 3 विजय बाबू एक ग्राहक थे और मुरलीवाला एक विक्रेता। दोनों अपने-अपने पक्ष के समर्थन में क्या-तर्क पेश करते हैं?

उत्तर- जब विजय बाबू ने मुरलीवाले से मुरली का दाम पूछा तो मुरली वाले ने आदतवश कहा कि दूसरों को तीन-तीन पैसे में देता है, पर उन्हें दो पैसे में ही दे देगा। इस पर वे अपने-अपने तर्क देने लगे विजय बाबू का तर्क- “तुम लोगों की झूठ बोलने की आदत होती है। देते होगे सभी को दो-दो पैसे में, पर एहसान का बोझा मेरे ऊपर ही लाद रहे हो।” मुरलीवाले का तर्क- “यह तो ग्राहकों का दस्तूर होता है कि दुकानदार चाहे हानि उठाकर चीज़ क्यों न बेचे, पर ग्राहक यही समझते हैं कि दुकानदार उन्हें लूट रहा है।”

प्रश्न 4 खिलौनेवाले के आने पर बच्चों की क्या प्रतिक्रिया होती थी?

उत्तर- खिलौनेवाले के आने पर बच्चों की प्रतिक्रिया निम्नलिखित रूपों में होती थी-

  • बच्चे उत्साहित एवं उल्लसित हो जाते थे।
  • वे अपने खेल-कूद भूलकर उसकी और दौड़ जाते।
  • जल्दवाजी में उन्हें अपने सामान, जूते-चप्पल आदि का ध्यान न रहता।
  • बच्चे गलियाँ, पार्क तथा घरों से निकल पड़ते थे।
  • बच्चे खुशी से पागल हो जाते थे।

प्रश्न 5 रोहिणी को मुरलीवाले के स्वर से खिलौनेवाले का स्मरण क्यों हो गया?

उत्तर- मुरलीवाले का स्वर रोहिणी को जानी पहचानी से लगी। उसे याद आया कि खिलौनेवाला भी इसी प्रकार मधुर कंठ से गाकर खिलौने बेचा करता था इसलिए उसे खिलौनेवाले का स्मरण हो गया।

प्रश्न 6 किसकी बात सुनकर मिठाईवाला भावुक हो गया था? उसने इन व्यवसायों को अपनाने का क्या कारण बताया?

उत्तर- रोहिणी की बात सुनकर मिठाईवाला भावुक हो गया था। उसने बताया कि उसके भी दो बच्चे थे जो की अब इस दुनिया में नही रहे इसलिए उसने इस व्यवसाय को अपना लिया क्योंकि उसे अपने बच्चों झलक दूसरों के बच्चों में मिल जाती है।

प्रश्न 7 ‘अब इस बार ये पैसे न लूँगा’ -कहानी के अंत में मिठाईवाले ने ऐसा क्यों कहा?

उत्तर- कहानी के अंत में मिठाईवाले ने पैसे लेने से इसलिए मन कर दिया क्योंकि पहली बार किसी ने उसके दुःख को समझने का प्रयास किया साथ ही उसे चुन्नू-मुन्नु में अपने ही बच्चे नज़र आए। उसे लगा की वह अपने बच्चों को मिठाई दे रहा है।

प्रश्न 8 इस कहानी में रोहिणी चिक के पीछे से बात करती है। क्या आज भी औरतें चिक के पीछे से बात करती हैं? यदि करती हैं तो क्यों? आपकी राय में क्या यह सही है?

उत्तर- शहरों में स्त्रियाँ चिक के पीछे से बात नही करतीं परन्तु आज भी गाँवों में तथा रूढ़िवादी परिवारों में इनका पालन होता है क्योंकि ऐसा करना संस्कार के साथ-साथ सम्मान के तौर पर भी लिया जाता है।

मेरी राय में यह बिलकुल भी उचित नही है चूँकि स्त्रियों के स्वतंत्रता के हनन करने जैसा है। ये उनके प्रगति को तो रोकता ही साथ देश की प्रगति में भी संकट पैदा करता है।

कहानी से आगे प्रश्न (पृष्ठ संख्या 30)

प्रश्न 1 मिठाईवाले के परिवार के साथ क्या हुआ होगा? सोचिए और इस आधार पर एक और कहानी बनाइए।

उत्तर- मिठाईवाले का परिवार किसी प्राकृतिक आपदा या दुर्घटना का शिकार हुआ होगा। जैसा कि मिठाईवाले ने बताया था, उसका एक हंसता-खेलता परिवार था। शहर में उसका मान था। आलीशान घर था। व्यवसाय फल-फूल रहा था। नौकर-चाकर, गाड़ी घोड़ा किसी चीज़ की कमी नहीं थी, परंतु अचानक जैसे उसकी हरी-भरी दुनिया को किसी की नज़र लग गई। गाँव में महामारी फैली और उसकी पत्नी और बच्चे चल बसे। उसकी दुनिया ही उजड़ गई और आँखों में आँसू सूखते ही न थे। धीरे-धीरे समय बीता तो मन का दुख कुछ कम हुआ पर अब वही घर अकेले में काटने को दौड़ता था। रह-रह कर बच्चों की याद आती थी। मन को तसल्ली देने का उसने एक तरीका निकाला कि वह घूम-घूमकर बच्चों के पसंद की चीजें बेचा करेगा और अपने मन को बहलाया करेगा। इस प्रकार उसका फेरी लगाने का व्यवसाय आरंभ हुआ और इस काम में उसने संतोष, धीरज और असीम सुख भी पाया।

प्रश्न 2 हाट-मेले, शादी आदि आयोजनों में कौन-कौन सी चीजें आपको सबसे ज़्यादा आकर्षित करती हैं? उनको सजाने-बनाने में किसका हाथ होगा? उन चेहरों के बारे में लिखिए।

उत्तर- हाट-मेले, शादी आदि आयोजनों मे हमें घर तथा दुकानों की साज-सज्जा बहुत आकर्षित करती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के व्यंजन और खाद्य पदार्थ भी बहुत लुभावने लगते हैं। घरों की साज-सज्जा के लिए विशेषज्ञ बुलाए जाते होंगे और खाद्य पदार्थों के लिए हलवाई। इनके पहनावे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकते हैं।

प्रश्न 3 इस कहानी में मिठाईवाला दूसरों को प्यार और खुशी देकर अपना दुख कम करता है? इस मिज़ाज की और कहानियाँ, कविताएँ ढूँढ़िए और पढ़िए।

उत्तर- मीठी बोली

बस में जिससे हो जाते हैं प्राणी सारे

जन जिससे बन जाते हैं आँखों के तारे।

पत्थर को पिघलाकर मोम बनाने वाली

मुख खोलो तो मीठी बोली बोलो प्यारे।

रगड़ो-झगड़ों का कड़वापन खोने वाली,

जी में लगी हुई काई को धोने वाली।

सदा जोड़ देने वाली जो टूटा नाता

मीठी बोली बीज-प्यार है बोने वाली।

काँटों में भी सुन्दर फूल खिलाने वाली,

रखने वाली कितने ही मुखड़ों की लाली।

निपट बना देने वाली है बिगड़ी बातें

होती मीठी बोली की करतूत निराली।

जी उमगाने वाली, चाह बढ़ाने वाली,

दिल के पेचीदे ताले की सच्ची ताली।

फैलाने वाली सुगन्ध सब ओर अनूठी

मीठी बोली है विकसित फूलों की डाली। -अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

अनुमान और कल्पना प्रश्न (पृष्ठ संख्या 30-31)

प्रश्न 1 आपकी गलियों में कई अजनबी फेरीवाले आते होंगे। आप उनके बारे में क्या-क्या जानते हैं? अगली बार जब आपकी गली में कोई फेरीवाला आए तो उससे बातचीत कर जानने की कोशिश कीजिए।

उत्तर- हमारी गली में कई फेरीवाले आते हैं। जैसे फलवाला, सब्जीवाला, बरतनवाला, खिलौनेवाला, कपड़ेवाला आदि। वे सब बड़ी ही लयात्मक आवाज में पुकार-पुकार कर अपनी चीजें बेचते हैं। ये लोग गरीबी के कारण इस तरह घूम-घूमकर चीजें बेचते हैं। अगर इनके पास अधिक पैसे होते, तो ये भी घूमने की बजाए दुकान खोलकर बैठते। इनके पास सामान कम होते हैं। इन्हें बेचने के बाद वे और सामान खरीदते हैं। छात्र अपनी गली में आने वाले फेरीवालों से बात करें और उनके विषय में जानने का प्रयास करें।

प्रश्न 2 आपके माता पिता के जमाने से लेकर अब तक फेरी की आवाज़ों में कैसा बदलाव आया है? बड़ों से पूछकर लिखिए।

उत्तर- माता-पिता के जमाने मे फेरीवाले बड़ी संख्या में आया करते थे और मधुर आवाज में गा-गाकर अपना सामान बेचा करते थे। फेरीवाले लगभग हर तरह की चीजें लाया करते थे, परंतु आजकल फेरीवालों की संख्या बहुत कम हो गई है। कारण यह है कि लोग अब दुकानों में जाकर पैकेट और मुहर लगी चीज़ों को खरीदने को ही प्राथमिकता देते हैं। फेरीवाले अब पहले की तरह गाते हुए पुकार भी नहीं लगाते। उनकी आवाज की वह मधुरता अब कहीं खो गई-सी लगती है।

प्रश्न 3 क्या आपको लगता है कि वक्त के साथ फेरी के स्वर कम हुए हैं? कारण लिखिए।

उत्तर- वक्त के साथ फेरीवालों के स्वर कमै हुए हैं। यह सच है क्योंकि अब बाजारों और दुकानों का विस्तार हुआ है। पर्दाप्रथा की समाप्ति के बाद औरतें भी घर के सामान लेने बेहिचक बाज़ार जाने लगी हैं। दूसरी बात यह भी है कि लोग पैक और मुहर बंद चीजों को खरीदना ही उचित समझने लगे हैं, इसलिए फेरीवालों की संख्या कम हुई है।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 31)

प्रश्न 1 मिठाईवाला, बोलनेवाली गुड़िया

ऊपर ‘वाला’ का प्रयोग है। अब बताइए कि-

  1. ‘वाला’ से पहले आनेवाले शब्द संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि में से क्या है?
  2. ऊपर लिखे वाक्यांशों में उनका क्या प्रयोग है?

उत्तर- 

  1. मिठाई शब्द संज्ञा है और बोलना क्रिया।
  2. ‘मिठाईवाला’ शब्द में वाला लग जाने से यह शब्द विशेषण बन जाता है जो उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है, जो मिठाई बेचता हो। ‘बोलने वाली गुड़िया’ में बोलने वाली शब्द विशेषण है जो गुड़िया की विशेषता बता रहा है।

प्रश्न 2 “अच्छा मुझे ज़्यादा वक्त नहीं, जल्दी से दो ठो निकाल दो।”

  • उपर्युक्त वाक्य में ‘ठो’ के प्रयोग की ओर ध्यान दीजिए। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की भाषाओं में इस शब्द का प्रयोग संख्यावाची शब्द के साथ होता है, जैसे, भोजपुरी में-एक ठो लइका, चार ठे आलू, तीन ठे बटुली।
  • ऐसे शब्दों का प्रयोग भारत की कई अन्य भाषाओं बोलियों में भी होता है। कक्षा में पता कीजिए कि किस-किस की भाषा-बोली में ऐसा है। इस पर सामूहिक बातचीत कीजिए।

उत्तर- विद्यार्थी स्वयं करें

प्रश्न 3 “ये भी, जान पड़ता है, पार्क में खेलने निकल गए हैं।”

“क्यों भई, किस तरह देते हो मुरली?”

“दादी, चुन्नू-मुन्नू के लिए मिठाई लेनी है। ज़रा कमरे में चलकर ठहराओ।”

  • भाषा के ये प्रयोग आजकल पढ़ने-सुनने में नहीं आते। आप ये बातें कैसे कहेंगे?

उत्तर- “लगता है वे भी पार्क में खेलने निकल गए हैं।”भैया, इस मुरली का मूल्य क्या है?” “दादी, चुन्नू-मुन्नू के लिए मिठाई लेनी है। जरा जाकर उसे कमरे में बुलाओ।”

कुछ करने को प्रश्न (पृष्ठ संख्या 31)

प्रश्न 1 फेरीवालों की दिनचर्या कैसी होती होगी? उनका घर-परिवार कहाँ होगा? उनकी जिंदगी में किस प्रकार की समस्याएँ और उतार-चढ़ाव आते होंगे। यह जानने के लिए तीन-तीन के समूह में छात्र-छात्राएँ कुछ प्रश्न तैयार करें और फेरीवालों से बातचीत करें। प्रत्येक समूह अलग-अलग व्यवसाय से जुड़े फेरीवालों से बात करे।

उत्तर- फेरीवाले का जीवन काफ़ी कठिन होता है। वह सुबह से शाम तक गलियों में चक्कर लगाते रहते हैं। उनका घर-परिवार उनसे अलग गाँव या दूसरे शहर में होता है या किसी छोटी कॉलोनियों में। उनके जीवन में अनेक समस्याएँ आती होंगी। जैसे पूरा सामान न बिकना, सामान का खराब हो जाना या सड़ जाना, तबियत खराब होने, अधिक बारिश होने पर, या अधिक गरमी पड़ने से घर से बाहर न निकल पाना। कभी-कभी इन्हें खरीद से कम में भी माल बेचना पड़ता है जिससे कि इनका मूल धन डूब जाए, इस प्रकार की और भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

प्रश्नानुसार आज अलग-अलग व्यवसाय से जुड़े फेरीवालों से उनकी समस्याएँ व जीवन के बारे में बात करें।

प्रश्न 2 इस कहानी को पढ़कर क्या आपको यह अनुभूति हुई कि दूसरों को प्यार और खुशी देने से अपने मन का दुख कम हो जाता है? समूह में बातचीत कीजिए।

उत्तर- हाँ, फेरीवाले की कथा से यही लगता है कि दूसरों को प्यार और खुशी देने से अपने मन का दुख कम हो जाता है। हम अपने अनुमान से भी यह जान सकते हैं कि दुख-तकलीफ के समय दूसरों से मिला-जुला जाए तो मन को बहुत सुकून मिलता है और अपना दर्द कुछ कम होता महसूस होने लगता है। कहा भी गया है दुख बाँटने से कम होता है। छात्र आपस में बातचीत करके इस बात की सच्चाई को समझने का प्रयास करें।

प्रश्न 3 अपनी कल्पना की मदद से मिठाईवाले का चित्र शब्दों के माध्यम से बनाइए।

उत्तर-  मिठाईवाला लम्बा, दुबले-पतले शरीर वाला होगा। उसकी घनी मूंछे होंगी। वह कुर्ता-पाजामा पहनता होगा और सिर पर पगड़ी बाँधता होगा। उसके कंधों पर फेरी का सामान होता होगा जिसमें खट्टी, स्वादिष्ट, सुगंधित, सुपाच्य मीठी गोलियाँ होंगी। जब वह मीठी आवाज में गाते हुए गली में आता होगा तो बच्चे दौड़कर उसे घेर लेते होंगे।

Class 7 हिन्दी – अध्याय-3: कठपुतली

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-भवानी प्रसाद

सारांश

प्रस्तुत कविता कवि भवानी प्रसाद द्वारा लिखित है। कवि ने कठपुतलियों के मन की व्यथा को दर्शाया है। ये सभी धागों में बंधे-बंधे परेशान हो चुकी हैं और इन्हें दूसरों के इशारों पर नाचने में दुख होता है। इस दुख से बाहर निकलने के लिए एक कठपुतली विद्रोह के शुरुआत करती है, वह सब धागे तोड़कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है। अत: वह आजाद होना चाहती है और इच्छानुसार जीना चाहती है। उसकी बात सुनकर अन्य सभी कठपुतलियाँ भी उसकी बातों से सहमत हो जाती हैं और स्वतंत्र होने की चाह व्यक्त करती हैं। मगर, जब पहली कठपुतली पर सभी की स्वतंत्रता की ज़िम्मेदारी आती है, तो वो सोच में पड़ जाती है। फलस्वरूप पहली कठपुतली सोच समझकर कदम उठाना चाहती है।

भावार्थ

कठपुतली

गुस्‍से से उबली

बोली- यह धागे

क्‍यों हैं मेरे पीछे-आगे?

इन्‍हें तोड़ दो;

मुझे मेरे पाँवों पर छोड़ दो।

भावार्थ- इन पंक्तियों में कवि ने एक कठपुतली के मन के भावों को दर्शाया है। कठपुतली दूसरों के हाथों में बंधकर नाचने से परेशान हो गयी है और अब वो सारे धागे तोड़कर स्वतंत्र होना चाहती है। वो गुस्से में कह उठती है कि मेरे आगे-पीछे बंधे ये सभी धागे तोड़ दो और अब मुझे मेरे पैरों पर छोड़ दो। मुझे अब बंधकर नहीं रहना, मुझे स्वतंत्र होना है।

सुनकर बोलीं और-और

कठपुतलियाँ कि हाँ,

बहुत दिन हुए

हमें अपने मन के छंद छुए।

भावार्थ- इन पंक्तियों में अन्य सभी कठपुतलियों के मन के भाव दर्शाए हैं। पहली कठपुतली की बात सुनकर दूसरी कठपुतलियों के मन में भी आजाद होने की इच्छा सिर उठाने लगती है। वे सभी उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगती हैं कि सचमुच बहुत दिन हो गए, उन्होंने अपने मन की कोई इच्छा पूरी नहीं की। उन्हें अपनी मर्जी से काम करने का अवसर नहीं मिला। अत: सभी कठपुतलियाँ विद्रोह करने के लिए तैयार हो जाती है।

मगर…

पहली कठपुतली सोचने लगी-

यह कैसी इच्‍छा

मेरे मन में जगी?

भावार्थ- कविता की इन अंतिम पंक्तियों में कवि ने पहली कठपुतली के मन के असमंजस के भावों को दिखाया है। जब बाकी सभी कठपुतलियाँ पहली कठपुतली की स्वतंत्र होने की बात का समर्थन करती हैं, तो पहली कठपुतली सोच में पड़ जाती है कि क्या वो सही कर रही है? क्या वो इन सबकी स्वतंत्रता की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले पाएगी? क्या उसकी इच्छा जायज़ है? अंतिम पंक्तियाँ उसके इन्हीं मनभावों को समर्पित हैं।

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कविता से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 20)

प्रश्न 1 कठपुतली को गुस्सा क्यों आया?

उत्तर- कठपुतली को धागे से बाँधकर रखा जाता था। वह इस बंधन से तंग आ गई थी। वह स्वतंत्र रहना चाहती थी, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। धागे से बँधे रहना उसे पराधीनता लगती है इसीलिए उसे गुस्सा आता है।

प्रश्न 2 कठपुतली को अपने पाँवों पर खड़ी होने की इच्छा है, लेकिन वह क्यों नहीं खड़ी होती?

उत्तर- कठपुतली को अपने पाँवों पर खड़ी होने की इच्छा है किन्तु वह खड़ी इसलिए नही होती क्योंकि उसके पास स्वतंत्र रूप से खड़े हो सकने की क्षमता नहीं है। जब सारे कठपुतलियों की स्वतंत्रता की जिम्मेदारी उस पर आती है तो उसे लगता है कि कहीं उसका यह कदम सबको मुसीबत में ना डाल दे।

प्रश्न 3 पहली कठपुतली की बात दूसरी कठपुतलियों को क्यों अच्छी लगी?

उत्तर- पहली कठपुतली की बात दूसरी कठपुतलियों को इसलिए अच्छी लगी क्योंकि स्वतंत्रता सभी को प्रिय होती है।वे भी बंधन में दुखी हो चुकी थीं और अपना जीवन इच्छानुसार जीना चाहती थीं।

प्रश्न 4 पहली कठपुतली ने स्वयं कहा कि -‘ये धागे/ क्यों हैं मेरे पीछे-आगे?/ इन्हें तोड़ दो;/ मुझे मेरे पाँवों पर छोड़ दो।’-तो फिर वह चिंतित क्यों हुई कि- ‘ये कैसी इच्छा/ मेरे मन में जगी?’ नीचे दिए वाक्यों की सहायता से अपने विचार व्यक्त कीजिए-

  • उसे दूसरी कठपुतलियों की जिम्मेदारी महसूस होने लगी।
  • उसे शीघ्र स्वतंत्र होने की चिंता होने लगी।
  • वह स्वतंत्रता की इच्छा को साकार करने और स्वतंत्रता को हमेशा बनाए रखने के उपाय सोचने लगी।
  • वह डर गई, क्योंकि उसकी उम्र कम थी।

उत्तर- पहली कठपुतली स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है परन्तु जब उसपर सभी कठपुतलियों की स्वतंत्रता की जिम्मेदारी आती है, तो वह डर जाती है। उसे लगने लगता है कहीं उसका उठाया गया कदम सबको मुसीबत में ना डाल दे। वह स्वतंत्रता प्राप्त करने के उपाय तथा उसे हमेशा बनाए रखने के उपाय सोचने लगती है। उसे लगता है कि अभी उसकी उम्र कम है, वह सबकी जिम्मेदारी नही उठा सकती।

कविता से आगे प्रश्न (पृष्ठ संख्या 20-21)

प्रश्न 1 ‘बहुत दिन हुए/ हमें अपने मन के छंद छुए।’ – इस पंक्ति का अर्थ और क्या हो सकता है? अगले पृष्ठ पर दिए हुए वाक्यों की सहायता से सोचिए और अर्थ लिखिए-

  1. बहुत दिन हो गए, मन में कोई उमंग नही आई।
  2. बहुत दिन हो गए, मन के भीतर कविता-सी कोई बात नहीं उठी, जिसमें छंद हो, लय हो।
  3. बहुत दिन हो गए, गाने-गुनगुनाने का मन नहीं हुआ।
  4. बहुत दिन हो गए, मन का दुख दूर नहीं हुआ और न मन में खुशी आई।

उत्तर- बहुत दिन हो गए, मन का दुख दूर नहीं हुआ और न मन में खुशी आई।

प्रश्न 2 नीचे दो स्वतंत्रता आंदोलनों के वर्ष दिए गए हैं। इन दोनों आंदोलनों के दो-दो स्वतंत्रता सेनानियों के नाम लिखिए-

  1. सन् 1857 …………….
  2. सन् 1942 …………….

उत्तर-

  1. सन् 1857
  • वीर कुंवर सिंह
  • रानी लक्ष्मीबाई
  1. सन् 1942
  • सुभाषचंद्र बोस
  • सरदार वल्लभ भाई पटेल

अनुमान और कल्पना प्रश्न (पृष्ठ संख्या 21)

प्रश्न 1 स्वतंत्र होने की लड़ाई कठपुतलियाँ कैसे लड़ी होंगी और स्वतंत्र होने के बाद स्वावलंबी होने के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए होंगे? यदि उन्हें फिर से धागे में बाँधकर नचाने के प्रयास हुए होंगे तब उन्होंने अपनी रक्षा किस तरह के उपायों से की होगी?

उत्तर- स्वतंत्र होने की लड़ाई कठपुतलियों ने मिलकर लड़ी होगी क्योंकि उन सबका दुख एक था और सबको एक जैसे ही धागों से आजादी चाहिए थी। सबने मिलकर संघर्ष की योजना बनाई होगी और पूरी ताकत लगाकर एक साथ अपने धागे तोड़ डाले होंगे। आजाद होने के बाद कठपुतलियों ने अपने पाँव पर खड़े होने के लिए बहुत संघर्ष किया होगा। सदियों की गुलामी के बाद एकाएक मिली आजादी सँभालने के लिए उन्हें बहुत मुश्किलें उठानी पड़ी होंगी। आपस में मिल-जुल कर एक दूसरे की सहायता से उन्होंने स्वयं को स्वावलंबी बनाया होगा। यदि उन्हें फिर से धागे में बाँधकर नचाने का प्रयास किया गया होगा तो उन्होंने एकजुट होकर इसका विरोध किया होगा क्योंकि गुलामी में सारे सुख होने के बावजूद आजाद रहना ही सबको प्रिय होता है। उन्होंने अपने सम्मिलित प्रयास से अपने दुश्मनों की हर चाल को नाकाम किया होगा। इस तरह उन्होंने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 21)

प्रश्न 1 कई बार जब दो शब्द आपस में जुड़ते हैं तो उनके मूल रूप में परिवर्तन हो जाता है। कठपुतली शब्द में भी इस प्रकार का सामान्य परिवर्तन हुआ है। जब काठ और पुतली दो शब्द एक साथ हुए कठपुतली शब्द बन गया और इससे बोलने में सरलता आ गई। इस प्रकार के कुछ शब्द बनाइए-

जैसे- काठ (कठ) से बना – कठगुलाब, कठफोड़ा

हाथ-हथ, सोना-सोन, मिट्टी-मट

उत्तर- हाथ-हथ- हथकरघा, हथकड़ी, हथगोला

सोना-सोन- सोनभद्रा, सोनजूही, सोनपापड़ी

मिट्टी-मट- मटमैला, मटका, मटर

प्रश्न 2 कविता की भाषा में लय या तालमेल बनाने के लिए प्रचलित शब्दों और वाक्यों में बदलाव होता है। जैसे- आगे-पीछे अधिक प्रचलित शब्दों की जोड़ी है, लेकिन कविता में ‘पीछे-आगे’ का प्रयोग हुआ है। यहाँ ‘आगे’ का ‘…बोली ये धागे’ से ध्वनि का तालमेल है। इस प्रकार के शब्दों की जोड़ियों में आप भी परिवर्तन कीजिए- दुबला-पतला, इधर-उधर, ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ, गोरा-काला, लाल-पीला आदि ।

उत्तर- पतला – दुबला

उधर – इधर

नीचे – ऊपर

बाएँ – दाएँ

काला – गोरा

पीला – लाल

Class 7 हिन्दी – अध्याय-2: हिमालय की बेटियाँ

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-नागार्जुन

सारांश

हिमालय की बेटियाँ नागार्जुन द्वारा लिखा एक प्रसिद्ध निबंध है। इस निबंध में लेखक ने नदियों के प्रति अपनी अपार श्रद्धा को प्रकट किया है।

इस पाठ में उन्होंने हिमालय और उससे निकलने वाली नदियों के बारे में बताया है। लेखक कहते हैं कि हिमालय से बहने वाली गंगा, यमुना, सतलुज आदि नदियाँ दूर से शांत, गंभीर अपने आप में खोई हुई और संभ्रांत महिला की भाँति दिखाई देती थीं। लेखक के मन में इनके प्रति माँ, दादी, मौसी और माँ रूपी श्रद्धा के भाव थे। परन्तु जब लेखक ने जब इन नदियों को हिमालय के कंधे पर चढ़कर देखा तो उन्हें आश्चर्य होने लगता है कि ये नदियाँ मैदानों में उतरकर इतनी विशाल कैसे हो जाती हैं।

लेखक को हिमालय की इन बेटियों की बाल-लीलाओं को देखकर आश्चर्य होता है। हिमालय की इन बेटियों का न जाने कौन-सा लक्ष्य है, जो इस प्रकार से बेचैन होकर बह रही हैं। नदियाँ बर्फ की पहाड़ियों में, घाटियों में और चोटियों पर लीलाएँ करती हैं। लेखक को लगता है देवदार, चीड़, सरसों, चिनार आदि के जंगलों में पहुँचकर शायद इन नदियों को अपनी बीती बातें याद आ जाती होंगी।

सिंधु और ब्रह्मपुत्र दो महानदियाँ हिमालय से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं। हिमालय को ससुर और समुद्र को उसका दामाद कहने में भी लेखक को कोई झिझक नहीं होती। कालिदास के यक्ष ने अपने मेघदूत से कहा था कि बेतवा नदी को प्रेम का विनिमय देते जाना जिससे पता चलता है कि कालिदास जैसे महान कवि को भी नदियों का सजीव रूप पसंद था।

काका कालेलकर ने भी नदियों को लोकमाता कहा है। लेकिन लेखक इन्हें माता से पहले बेटियों के रूप में देखते हैं। कई कवियों ने इन्हें बहनों के रूप में भी देखा है।

एक दिन लेखक की तबीयत कुछ ढीली थी मन भी उचाट था वे पानी में पैर लटकाकर बैठ गए और सच में थोड़ी ही देर उनका मन तरोताजा हो गया और वे गुनगुनाने लग गए।

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लेख से प्रश्न (पृष्ठ संख्या 15)

प्रश्न 1 नदियों को माँ मानने की परम्परा हमारे यहाँ काफ़ी पुरानी है। लेकिन लेखक नागार्जुन उन्हें और किन रूपों में देखते हैं?

उत्तर- नदियों को माँ मानने की परम्परा हमारे यहाँ काफ़ी पुरानी है लेकिन लेखक नागार्जुन उन्हें बेटियों, प्रेयसी व बहन के रूपों में भी देखते हैं।

प्रश्न 2 सिंधु और ब्रह्मपुत्र की क्या विशेषताएँ बताई गयी हैं?

उत्तर- सिंधु और ब्रह्मपुत्र दोनों महानदियाँ हैं जिनमें सारी नदियों का संगम होता है। ये दो ऐसी नदियाँ हैं जो दयालु हिमालय के पिघले हुए दिल की एक-एक बूँद से निर्मित हुई हैं। इनका रूप इतना लुभावना है कि सौभाग्यशाली समुद्र भी पर्वतराज हिमालय की इन दो बेटियों का हाथ थामने पर गर्व महसूस करता है। इनका रूप विशाल और विराट है।

प्रश्न 3 काका कालेलकर ने नदियों को लोकमाता क्यों कहा है?

उत्तर- काका कालेलकर ने नदियों को लोकमाता इसलिए कहा है क्योंकि ये युगों से एक माँ की तरह हमारा भरण-पोषण करती रही है। ये हमें पीने को जल तथा मिट्टी को उपजाऊ बनाने में सहायक होती हैं। जिस तरह माता तमाम कष्ट सहने के बावजूद अपने पुत्रों का भला चाहती हैं उसी तरह नदियाँ भी मनाव द्वारा दूषित किये जाने के बावजूद जगत का कल्याण करती हैं।

प्रश्न 4 हिमालय की यात्रा में लेखक ने किन-किन की प्रशंसा की है?

उत्तर- हिमालय की यात्रा में लेखक ने इसके अनुपम छटा की, इनसे निकलने वाली नदियों की अठखेलियों की, बर्फ से ढँकी पहाड़ियों सुंदरता की, पेड़-पौधों से भरी घाटियों की, देवदार, चीड, सरो, चिनार, सफैदा, कैल से भरे जंगलों की प्रशंसा की है।

लेख से आगे प्रश्न (पृष्ठ संख्या 15)

प्रश्न 1 नदियों और हिमालय पर अनेक कवियों ने कविताएँ लिखी है। उन कविताओं का चयन कर उनकी तुलना पाठ में निहित नदियों के वर्णन से कीजिए।

उत्तर- निर्झरिणी

मधु-यामिनी अंचल-ओट में सोयी थी

बालिका-जुही उमंग-भरी,

विधु-रंजित ओस कणों से भरी

थी बिछी वन-स्वान-सी दूब हरी।

मृदु चाँदनी बीच थी खेल रही

वन-फूलों के शून्य में इन्द्र-परी,

कविता बन शैल-महाकवि के

उर से मैं तभी अनजान झरी।

हिरणी-शिशु ने निज उल्लास दिया

मधु राका ने रूप दिया अपना,

कुमुदी ने हँसी, परियों ने उमंग

चकोरी ने प्रेम में यों तपना।

जननी-धरणी मुझे गोद लिए

थी सचेत कि मैं भाग जाऊँ नहीं

वन जन्तुओं के शिशु आन जुटे

कि सखा बिन मैं दुख पाऊँ नहीं।

थी डरी मैं, पड़ी ममता में कहीं

इस देश में ही रह जाऊँ नहीं,

प्रिय देश देखे बिना झर जाऊँ न व्यर्थ

कहीं छवि यों हीं गवाऊँ नहीं। -रामधारी सिंह ‘दिनकर’

दिनकर की कविता में नदी के धरती पर उतरने का वर्णन है और नागार्जुन के निबंध में हिमालय पर नदियों के बालपन का वर्णन है। देखा जाए तो दिनकर के विचार नागार्जुन की सोच को आगे बढ़ाते नजर आते हैं। हिमालय की बेटियाँ पहाड़ों से उतर कर धरती की गोद में गिरती हैं तो माँ धरती उसे थामने की चेष्टा करती हैं, परंतु नदियाँ उनसे भी दामन छुड़ा कर अपने प्रिय से मिलने के लिए आगे बढ़ जाती हैं।

हिमालय पर कविता

खड़ा हिमालय बता रहा है

डरो न आँधी-पानी में,

खड़े रहो तुम अविचल होकर

सब संकट तूफानी में।

डिगो न अपने प्रण से तो तुम

सब कुछ पा सकते हो प्यारे,

तुम भी ऊँचे उठ सकते हो

छू सकते हो नभ के तारे।

अचल रहा जो अपने पथ पर,

लाख मुसीबत आने में,

मिली सफलता जग में उसको

जीने में मर जाने में।

उपर्युक्त कविता में हिमालय द्वारा मुसीबतों से न घबराते हुए जीवन में दृढ़ता बनाए रखने को कहा गया है, जबकि पाठ में अपनी बेटियों (नदियों) के घर छोड़कर जाने से हिमालय पछताता रह जाता है।

प्रश्न 2 गोपाल सिंह नेपाली की कविता ‘हिमालय और हम’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘हिमालय’ तथा जयशंकर प्रसाद की कविता — हिमालय के आँगन में पढ़िए और तुलना कीजिए।

उत्तर- मेरे नगपति! मेरे विशाल।

साकार, दिव्य, गौरव विराट।

पौरुष के पूंजीभूत ज्वाल।

मेरी जननी के हिम-किरीट।

मेरे भारत के दिव्य भाल।

मेरे नगपति! मेरे विशाल।

युग-युग अजेय, निर्बन्ध मुक्त

युग-युग गर्वोन्नत, नित महान

निस्सीम व्योम में तान रहा

युग से किस महिमा का वितान।

कैसी अखण्ड यह चिर-समाधि?

यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान?

तू महा शून्य में खोज रहा

किस जटिल समस्या का निदान?

उलसन का कैसा विषम जाल

मेरे नगपति मेरे विशाल!

ओ, मौन तपस्या-लीन यही।

पल-भर को तो कर दृगोन्मेष।

रे ज्वालाओं से दग्ध-विकल

है तड़प रहा पद पर स्वदेश।

सुखसिन्धु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र,

गंगा-यमुना की अमियधार

जिस पुण्य भूमि की ओर बही

तेरी विगलित करुणा उदार।

मेरे नगपति! मेरे विशाल। – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

उपर्युक्त कविता की तुलना यदि नागार्जुन द्वारा लिखित निबंध से करें तो पाएँगे कि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपनी कविता में हिमालय की विशालता का वर्णन किया है। उसे भारत के मस्तक तथा मुकुट के रूप में दर्शाया है। उसकी महिमा का बखान किया है क्योंकि वह युगों से अपने स्थान पर अडिग और अचल खड़ा है। दिनकर ने हिमालय को चिर समाधि में लीन होकर किसी समस्या का निदान ढूँढते हुए बताया है। वही नागार्जुन ने अपने निबंध में हिमालय का चित्रण नदियों के पिता के रूप में किया है, जो अपनी नटखट बेटियों के कारण सिर धुनता रहता है।

प्रश्न 3 यह लेख 1947 में लिखा गया था। तब से हिमालय से निकलने वाली नदियों में क्या-क्या बदलाव आए हैं?

उत्तर- 1947 के बाद से आज तक नदियाँ उसी प्रकार हिमालय से बहती हुई आ रही हैं लेकिन जनसंख्या वृद्धि और बड़ी संख्या में प्रदूषण के कारण नदियों का जल पहले की तरह स्वच्छ और निर्मल नहीं रहा। गंगा जैसी पवित्र मानी जाने वाली नदी के जल की गुणवत्ता में भी भारी कमी आई है। यही नहीं नदियों में जल का प्रवाह भी कम हुआ है। यह स्थिति मानव जाति के लिए हानिकारक है।

प्रश्न 4 अपने संस्कृत शिक्षक से पूछिए कि कालिदास ने हिमालय को देवात्मा क्यों कहा है?

उत्तर- स्वर्ग से संबद्ध स्थानों में हिमालय का प्रमुख स्थान है। इसे देवताओं का निवास स्थल भी माना गया है, इसलिए कालिदास ने हिमालय को देवात्मा कहा है।

अनुमान और कल्पना प्रश्न (पृष्ठ संख्या 15)

प्रश्न 1 लेखक ने हिमालय से निकलने वाली नदियों को ममता भरी आँखों से देखते हुए उन्हें हिमालय की बेटियाँ कहा है। आप उन्हें क्या कहना चाहेंगे? नदियों की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से कार्य हो रहे हैं? जानकारी प्राप्त करें और अपना सुझाव दें।

उत्तर- नदियाँ हिमालय की बेटियाँ है, परंतु मानव जाति के लिए तो वह माँ समान ही हैं। फिर भी यदि कोई और रिश्ता हम उनके साथ जोड़ना चाहें तो उन्हें अपना मित्र मान सकते हैं। एक सच्चे मित्र की भाँति नदियाँ सदा हमारी हितैषी रही हैं और उन्होंने भलाई ही की है। हम नदियों की मित्रता का सही मूल्य नहीं चुका सके हैं और उसे बार-बार दूषित किया है। यदि समय रहते हमने अपनी गलतियाँ नहीं सुधारी तो परिणाम भयानक होंगे और मानव जाति को इसका मूल्य चुकाना होगा। नदियों की सुरक्षा के लिए हमारे देश में कई योजनाएं बनाई जाती रही हैं परंतु आज आवश्यकता इस बात की है कि हम शीघ्र ही गंभीरतापूर्वक इन योजनाओं पर अमल करना शुरू कर दें। नदियों के सफाई की उचित व्यवस्था की जाए। उनमें कचड़े फेंकने पर रोक लगाई जाए, कल-कारखानों से निकलने वाले दूषित जल व रसायन तथा शव प्रवाहित करने पर रोक लगाई जाए। तभी हम नदियों को बचा पाएंगे।

प्रश्न 2 नदियों से होनेवाले लाभों के विषय में चर्चा कीजिए और इस विषय पर बीस पंक्तियों का एक निबंध लिखिए।

उत्तर- नदियाँ आदिकाल से ही लाभप्रद रही हैं। मानव जाति के विकास में नदियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नदियों के किनारे ही प्राचीन सभ्यताओं का विकास हुआ। मानव ने नदी किनारे ही पहली बार बसना शुरू किया। नदी किनारे उसने खेती करना शुरू किया क्योंकि सिंचाई के लिए सरलता से जल वही मिल सकता था। इतिहास की किताबें पलट कर देखें तो पाएँगे कि बड़े-बड़े शहर तथा साम्राज्य किसी न किसी बड़ी नदी के किनारे ही स्थापित किए गए। नदियाँ आवागमन तथा व्यापार का माध्यम हुआ करती थीं। साथ ही नदी की सीमा होने से शत्रुओं से रक्षा भी हो जाती थी क्योंकि सेना लेकर नदी पार करना सरल नहीं था। आधुनिक युग में भी नदियों का महत्व कम नहीं हुआ अपितु बढ़ा ही है। नदियाँ आज भी जल तथा सिंचाई का सबसे बड़ा श्रोत हैं। नदियों से नहरें निकाल कर गाँव-गाँव में यह साधन उपलब्ध कराया गया है। नदियों पर बाँध बनाए गए हैं, उनसे बिजली तैयार की जा रही है। इस प्रकार नदियों ने रोजगार भी दिए हैं तथा आधुनिकीकरण में अपना योगदान भी दिया है।

भाषा की बात प्रश्न (पृष्ठ संख्या 15-17)

प्रश्न 1 अपनी बात कहते हुए लेखक ने अनेक समानताएँ प्रस्तुत की हैं। ऐसी तुलना से अर्थ अधिक स्पष्ट एवं सुंदर बन जाता है। उदहारण-

  1. संभ्रांत महिला की भाँति वे प्रतीत होती थीं।
  2. माँ और दादी, मौसी और मामी की गोद की तरह उनकी धारा में डुबकियाँ लगाया करता।

अन्य पाठों से ऐसे पाँच तुलनात्मक प्रयोग निकालकर कक्षा में सुनाइए और उन सुंदर प्रयोगों को कॉपी में भी लिखिए।

उत्तर- सचमुच मुझे दादी माँ शापभ्रष्ट देवी-सी लगी।

बच्चे ऐसे सुंदर जैसे सोने के सजीव खिलौने।

हरी लकीर वाले सफ़ेद गोल कंचे। बड़े आँवले जैसे।

काली चीटियों-सी कतारें धूमिल हो रही हैं।

संध्या को स्वप्न की भाँति गुजार देते थे।

प्रश्न 2 निर्जीव वस्तुओं को मानव-संबंधी नाम देने से निर्जीव वस्तुएँ भी मानो जीवित हो उठती हैं। लेखक ने इस पाठ में कई स्थानों पर ऐसे प्रयोग किए हैं, जैसे-

  1. परंतु इस बार जब मैं हिमालय के कंधे पर पर चढ़ा तो वे कुछ और रूप में सामने थीं।
  2. काका कालेलकर ने नदियों को लोकमाता कहा है।

पाठ से इसी तरह के और उदाहरण ढूँढि़ए।

उत्तर-

  1. संभ्रांत महिला की भाँति वे प्रतीत होती थीं।
  2. कितना सौभाग्यशाली है वह समुद्र जिसे पर्वतराज हिमालय की इन दो बेटियों का हाथ पकड़ने का श्रेय मिला।
  3. बूढ़े हिमालय की गोद में बच्चियाँ बनकर ये कैसे खेला करती हैं।
  4. हिमालय को ससुर और समुद्र को दामाद कहने में कुछ झिझक नहीं होती थी।

प्रश्न 3 पिछली कक्षा में आप विशेषण और उसके भेदों से परिचय प्राप्त कर चुके हैं।

नीचे दिए गए विशेषण और विशेष्य (संज्ञा) का मिलान कीजिए-

विशेषणविशेष्य
संभ्रांतवर्षा
चंचलजंगल
समतलमहिला
घनानदियाँ
मूसलधारआँगन

उत्तर-

विशेषणविशेष्य
संभ्रांतमहिला
चंचलनदियाँ
समतलआँगन
घनाजंगल
मूसलधारवर्षा

प्रश्न 4 द्वंद्व समास के दोनों पद प्रधान होते हैं। इस समास में ‘और’ शब्द का लोप हो जाता है जैसे- राजा-रानी द्वंद्व समास है जिसका अर्थ है राजा और रानी। पाठ में कई स्थानों पर द्वंद्व समासों का प्रयोग किया गया है। इन्हें खोजकर वर्णमाला क्रम (शब्दकोश-शैली) में लिखिए।

उत्तर- छोटी – बड़ी

दुबली – पतली

भाव – भंगी

माँ – बाप

प्रश्न 5 नदी को उलटा लिखने से दीन होता है जिसका अर्थ होता है गरीब। आप भी पाँच ऐसे शब्द लिखिए जिसे उलटा लिखने पर सार्थक शब्द बन जाए। प्रत्येक शब्द के आगे संज्ञा का नाम भी लिखिए, जैसे- नदी-दीन (भाववाचक संज्ञा)

उत्तर- धारा – राधा (व्यक्तिवाचक संज्ञा)

नव – वन (जातिवाचक संज्ञा)

राम – मरा (भाववाचक संज्ञा)

राही – हीरा (द्रव्यवाचक संज्ञा)

गल – लग (भाववाचक संज्ञा)

प्रश्न 6 समय के साथ भाषा बदलती है, शब्द बदलते हैं और उनके रूप बदलते हैं, जैसे- बेतवा नदी के नाम का दूसरा रूप ‘वेत्रवती’ है। नीचे दिए गए शब्दों में से ढूँढ़कर इन नामों के अन्य रूप लिखिए-

सतलुज, रोपड़, झेलम, चिनाब, अजमेर, बनारस

विपाशावितस्ता
रूपपुर शतद्रुम
अजयमेरुवाराणसी

उत्तर-

सतलुजसतद्रुम
रोपड़रूपपुर
झेलमवितस्ता
चिनाबविपाशा
अजमेरअजयमेरु
बनारसवाराणसी

प्रश्न 7 ‘उनके खयाल में शायद ही यह बात आ सके कि बूढ़े हिमालय की गोद में बच्चियाँ बनकर ये कैसे खेला करती हैं।’

उपर्युक्त पंक्ति में ‘ही’ के प्रयोग की ओर ध्यान दीजिए। ‘ही’ वाला वाक्य नकारात्मक अर्थ दे रहा है। इसीलिए ‘ही’ वाले वाक्य में कही गई बात को हम ऐसे भी कह सकते हैं- उनके खयाल में शायद यह बात न आ सके।

इसी प्रकार नकारात्मक प्रश्नवाचक वाक्य कई बार ‘नहीं’ के अर्थ में इस्तेमाल नहीं होते हैं, जैसे-महात्मा गांधी को कौन नहीं जानता? दोनों प्रकार के वाक्यों के समान तीन-तीन उदाहरण सोचिए और इस दृष्टि से उनका विश्लेषण कीजिए।

उत्तर-  ‘ही’ वाले वाक्य जिनका प्रयोग नकारात्मक अर्थ देता है-

  1. वे शायद ही इस कलम का इस्तेमाल करें।
  2. बच्चे शायद ही स्कुल जाएँ।
  3. वे शायद ही मेरी बात टालें।

‘नहीं’ वाले वाक्य जिनका प्रयोग नहीं के अर्थ में इस्तेमाल नहीं होते हैं–

  1. ऐसा कौन क्रिकेट फैन है जो सचिन तेंदुलकर को नहीँ जानता हो।
  2. वृक्ष से होने वाले लाभ को कौन नही जानता।
  3. सच्चे दोस्तों का महत्व कौन नही जानता।