अध्याय-11: हमारे चारों ओर वायु
वायु :-
वायु गैसों का मिश्रण होती है। जिसमें नाइट्रोजन 78% , ऑक्सीजन 21%, ऑर्गन 0.9% और अन्य गैसे 0.1 प्रतिशत होती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वायु गैसों के 100% मिश्रण से बनती है। जिसका कोई भी रंग नहीं होता और यह सभी दिशाओं में अपना प्रभाव डालती है। वायु के बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है। सभी जीवों ,पौधों इत्यादि को जीवित रहने के लिए कई चीजों की आवश्यकता होती है जिसमें से वायु भी मुख्य है।
वायु गंधहीन ,स्वादहीन तथा रंगहीन होती है। वायु हमारे चारों ओर हर जगह होती है। हम वायु को नहीं देख सकते लेकिन हम वायु की उपस्थिति को महसूस कर सकते हैं। जब वायु बहती है तो हम उसे अपने शरीर पर ,पेड़ों की पत्तियों पर और अन्य जगह महसूस कर सकते हैं। हमारी पूरी पृथ्वी वायु के आवरण से ढकी रहती है जिसे वायुमण्डल (Atmosphere) कहते हैं। वायु एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। यह समस्त जीवित प्राणियों की श्वसन प्रक्रिया के लिए आवश्यक है। ईंधन जैसे -लकड़ी ,कोयला आदि को जलने के लिए भी वायु की आवश्यकता होती है।
वायुमंडल:-
पृथ्वी के चारों ओर से घिरे हुए वायु के विस्तृत फैलाव को वायुमंडल कहते हैं। वायुमंडल हमारे पृथ्वी का एक अभिन्न अंग है। जो पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण कारण पृथ्वी से जुड़ा हुआ है। वायु जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण भाग है। वायु के बिना कोई भी जीव जीवित नहीं रह सकता।
यह जीवन के लिए हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकने तथा जीवन के लिए अनुकूूल तापमान बनाएं रखने में सहायक है। वायु का 99% भाग, वायुमंडल के 32 किलोमीटर की ऊंचाई में ही पाया जाता है। यूं कहे तो पृथ्वी के इर्द-गिर्द वायु का भंडार है।वायु की वह परत , जो पृथ्वी को घेरे हुए हैं , उसे वायुमंडल कहते है।
इस परत का विस्तार पृथ्वी की सतह से कई किलोमीटर ऊपर तक है।
- क्षोभ मंडल (Troposphere)
- समताप मंडल(Stratosphere)
- मध्यमंडल (Mesosphere)
- आयन मंड(Thermosphere)
- बाह्य मंडल (Exosphere)
क्षोभ मंडल (Troposphere)
क्षोभमंडल को वायु मंडल की सबसे महत्वपूर्ण परत माना जाता है। वायुमंडल की सबसे निचली परत है, जिसकी ऊंचाई विषुवत रेखा पर 16 किलोमीटर तथा ध्रुवों पर 8 किलोमीटर है।
जीव जंतु इसी मंडल के द्वारा सांस लेते हैं। मौसम संबंधित सभी घटनाएं; जैसे – बादल, आंधी एवं वर्षा इसी परत में होती है। क्षोभमंडल परत में ऊंचाई के साथ-साथ तापमान घटता है। प्रत्येक 165 मीटर पर 1 डिग्री सी तापमान में कमी होती जाती है। जिसे सामान्य ताप ह्रास दर (Normal Lapse rate of Temperature) कहते हैं।
क्षोभमंडल परत को संवहन मंडल भी कहते हैं क्योंकि संवाहन धाराएं इसी मंडल तक सीमित है। क्षोभ मंडल में निरंतर संवहनी धाराएं तथा हवाएं चला करती है, जो तापमान तथा आद्रता को काफी ऊंचाई तक गिरा देती है।
समतापमंडल (Stratosphere)
समताप परत 50 किलोमीटर की ऊंचाई तक फैला हुआ है। इस के निचले भाग में 20 किलोमीटर की ऊंचाई तक तापमान में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जिस कारण से इसे समताप मंडल कहते हैं।
सामान्यता समताप मंडल में बादल नहीं पाए जाते हैं परंतु कभी-कभी जलवाष्प उपलब्ध होने के कारण दुर्लभ वाद मिलते हैं जिससे मदर ऑफ पर्ल (Mother of Pearl cloud) कहते हैं।
समतापमंडल के ऊपर 50 किलोमीटर की ऊंचाई तक तापमान में वृद्धि होती है, जिसका कारण वहां उपस्थित ओजोन गैस है, जो सूर्य की पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करती है इसीलिए इसे पृथ्वी का सुरक्षा कवच कहते हैं।
ओजोन परत क्षरण CFC गैस से होता है जो एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर से निकलती है। CFC गैस मैं उपस्थित सक्रिय गैस क्लोरीन ओजोन परत का क्षरण करती है।
इस परत में बादलों, धूल के कणों, बिजली की कड़क, जलवाष्प आदि कुछ भी नहीं पाया जाता है।
इस मंडल में वायु शक्ति दिशा में चलती है। वायुयान चालकों के लिए यह एक उत्तम मंडल है। समतापमंडल की बाह्य सीमा को समताप सीमा कहते हैं।
मध्यमंडल (Mesosphere)
समताप सीमा के ऊपर मध्यमंडल है, जिसका विस्तार 80 किलोमीटर की ऊंचाई तक है। इस परत में ऊंचाई के साथ तापमान गिरने लगता है और 80 किलोमीटर की ऊंचाई पर तापमान -100°C रह जाता है।
मध्यमंडल की ऊपरी सीमा को मध्यसीमा (Mesosphere) कहते हैं।
आयनमंडल (Ionosphere)
मध्य मंडल सीमा के ऊपर 80-690 किलोमीटर की ऊंचाई तक आयन मंडल है। किस मंडल में उपस्थित कौन विद्युत आवेशित होते हैं। जिन्हें आयन कहते हैं, इसीलिए इस परत को आयन मंडल के नाम से जाना जाता है।
आयन मंडल में तीन परतें (D, E, F) स्थित है जो कि पृथ्वी से प्रेषित रेडियो तरंगों को परिवर्तित करके पृथ्वी पर वापस भेज देता है। इससे रेडियो प्रसारण में सहायता मिलती है। संचार उपग्रह आयनमंडल में ही स्थित होते हैं।
वायुमंडल का संघटन (Atmosphere Composition)
- नाइट्रोजन (N2) – 78%
- ऑक्सीजन (O2) – 21%
- आर्गन (Ar) – 0.93 %
- कार्बन डाइऑक्साइड – 0.03%
- अन्य सभी 0.04 (हीलियम और हाइट्रोजन)
नाइट्रोजन
पूरे वायुमंडल के आयतन का 78.07% भाग है। नाइट्रोजन की उपस्थिति के कारण ही वायुदाब, पवनों की शक्ति तथा प्रकाश के परिवर्तन का आभास होता है।
नाइट्रोजन का सबसे बड़ा लाभ दिया है कि वह वस्तुओं को तेजी से जलने से बचाती है।
ऑक्सीजन
ऑक्सीजन गैस की खोज सर्वप्रथम स्वीडन के शीले नामक वैज्ञानिक ने 1772 ई. में की थी।
यह एक रंगहीन, गंधहीन एवं वायु से कुछ भारी गैस है। ऑक्सीजन को प्राण वायु (Life air) कहा जाता है।
ह गैस स्वयं नहीं जलती परन्तु जलने में सहायक होती है।
ऑक्सीजन की प्रकृति अनुचुम्बकीय होती है।
प्रयोगशाला में ऑक्सीजन गैस पोटैशियम क्लोरेट को मैंगनीज डाइऑक्साइड उत्प्रेरक की उपस्थिति में 375°C तापक्रम पर गर्म करके बनायी जाती है।
कृत्रिम श्वसन में हीलियम और ऑक्सीजन के मिश्रण का प्रयोग होता है। ऑक्सीजन का उपयोग ऑक्सीजन हाइड्रोजन एवं ऑक्सी-ऐसीटिलीन ज्वाला उत्पन्न करने में होता है।
द्रवीभूत ऑक्सीजन का उपयोग रॉकेट ईंधन (Rocket fuel) के रूप में होता है।
मानव-शरीर में सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला तत्व ऑक्सीजन (O) है। वायुमंडल में समस्त ऑक्सीजन हरे पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण (Photosyntheis) प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न हुई है।
तरल ऑक्सीजन (Liquid oxygen) का रंग हल्का नीला और चुंबकीय होता है।
ऑक्सीजन के उपयोग (use of Oxygen)
- जीवित प्राणियों के लिए आक्सीजन अति आवश्यक है। जीवित रहने के लिए पृथ्वी पर अधिकांश जीवों को ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।
- जानवरों और पौधों को श्वसन के लिए इसकी आवश्यकता होती है।
- ऑक्सीजन हम जिस हवा में सांस लेते हैं और जो पानी (H2O) पीते हैं उसमें ऑक्सीज़न पाया जाता है l
- मनुष्य में भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने में ऑक्सीज़न सहायक होती है, इसे वे श्वसन द्वारा इसे ग्रहण करते हैं।
- द्रव ऑक्सीजन तथा कार्बन, पेट्रोलियम इत्यादि का मिश्रण अति विस्फोटक होता है। इसलिए इनका उपयोग चट्टान आदि के तोड़ने में होता है।
- लोहे की मोटी चद्दर काटने अथवा मशीन के टूटे भागों को जोड़ने के लिए ऑक्सीजन तथा दहनशील गैस को ब्लो पाइप में जलाया जाता है।
- साधारण ऑक्सीजन के साथ हाइड्रोजन या एसिटिलीन जलाई जाती है। इसके लिए ये गैसें इस्पात के बेलनों में अति संपीडित अवस्था में बिकती हैं।
- ऑक्सीजन सिरका, वार्निश इत्यादि बनाने तथा असाध्य रोगियों के साँस लेने के लिए भी उपयोगी है। इसका उपयोग अधिकतर श्वसन व अनेक क्रियाविधियों मे होता है ।
- ऑक्सीजन के कई व्यावहारिक उपयोग हैं। इसका सबसे अधिक उपयोग स्टील के निर्माण में किया जाता है। इसका उपयोग अयस्क से धातु को गलाने, पानी को छानने, प्लास्टिक बनाने और रॉकेट ईंधन बनाने के लिए भी किया जाता है।
- ऑक्सीजन के टैंक का उपयोग सांस लेने में समस्या वाले लोगों के इलाज के लिए और विमान, पनडुब्बी, अंतरिक्ष यात्रियों और स्कूबा गोताखोरों के लिए जीवन समर्थन (life support systems) के रूप में भी किया जाता है।
आर्गन
वायुमंडल का केवल 0.93% भाग है और वायुमंडल मंडल की निचली परतो में पाई जाती है। आर्गन एक अक्रिय गैस है।
कार्बन डाइऑक्साइड
कार्बन डाइ ऑक्साइड (अंग्रेजी:carbon dioxide; रासायनिक सूत्र CO2), एक रंगहीन तथा गन्धहीन गैस है जो पृथ्वी पर जीवन के लिये अत्यावश्यक है। धरती पर यह प्राकृतिक रूप से पायी जाती है। धरती के वायुमण्डल में यह गैस आयतन के हिसाब से लगभग 0.03 प्रतिशत होती है।
ओजोन
वायुमंडल में बहुत कम मात्रा में पाई जाती है किंतु सूर्य की पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करने के कारण महत्वपूर्ण है। पृथ्वी की सतह से 20 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच ओजोन पाई जाती है।
वातसूचक :-
जब वातसूचक घूमती है तो वह उस दिशा में रुक जाता है जिस दिशा में वायु चल रही हो।
पर्वतारोही :-
पर्वतरोही ऊँचे पर्वतों पर चढ़ाई के समय सिलिंडर अपने साथ इसलिए ले जाते हैं क्योंकि अत्यधिक ऊंचाई पर वायु में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।
जैसे-जैसे हम वायुमंडल में पृथ्वी के तल से ऊपर की ओर जाते हैं , वायु में ऑक्सीजन की कमी होती जाती है।
ऑक्सीजन कैसे लेते है :-
ऑक्सीजन, रंगहीन गंधहीन तथा स्वादहीन होती है और इसका रासायनिक सूत्र O होता है तथा इसे हिंदी में प्राणवायु कहते हैं। इसी प्राणवायु इसलिए कहते हैं क्योंकि यह सभी जीवो और मनुष्यों के लिए बहुत आवश्यक होती है। जल तथा मिट्टी में वायु उवस्थित होती है।
मिट्टी के जीव :-
मिट्टी के जीव गहरी मिट्टी में बहुत-से माँड़ तथा छिद्र बना लेते हैं। इन छिद्रों के द्वारा वायु को अंदर व बाहर जाने के लिए जगह उपलब्ध हो जाती है।
वायु में जलवाष्प विघमान होती है। जब वायु ठंडे पृष्ठ के संपर्क में आती है तो इसमें उस्थित जलवाष्प ठंडी होकर संघनित हो जाती है तथा जल की बूँदे ठंडे पृष्ठ पर दिखाई देती हैं। वायु प्रत्येक स्थान पर मिलती है। हम वायु को देख नही सकते इसे अनुभव कर सकते है।
पवन :–
धरातल पर तापक्रम और वायुदाब की विभिन्नता के कारण वायु में गति या वायु संचरण होता है क्षैतिज रूप में गतिमान वायु को पवन कहते हैं। गतिशील वायु को पवन कहते है।
वायु का द्रव्यमान होता है और वायु जगह घेरती है।
पवनों को दो भागों में बांटा जा सकता है_
- स्थाई पवनें
- अस्थाई पवनें
स्थाई पवनें-
इन पवनों की विशाल वेग आदि निश्चित होती है अतः इन्हें स्थाई प्रचलित पवनें कहते हैं यह पवनें निम्नलिखित हैं-
डोलड्रम या शांत पेटी में चलने वाली भूमध्य रेखीय पछुआ पवनें- भूमध्य रेखा के 5 डिग्री उत्तरी व 5 डिग्री दक्षिणी में न्यून वायु दाब पेटी विद्यमान है यहां हवाएं गर्म होकर ऊपर उठती है अतः इनका संचालन ऊर्ध्वाधर होता है। अतः इसे शांत पेटि या डोलड्रम कहते हैं।
व्यापारिक पवनें-
यह पवनें आयान वृत्तीय उच्च दाब की पेटियों से भूमध्य रेखीय कम दाब की पेटियों की ओर चलती हैं यह पवन उपोषण उच्च वायुदाब पेटियों से भूमध्य रेखीय की और निश्चित रूप से तथा वर्ष भर चला करती है उत्तरी गोलार्ध इनकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण पूर्व से उत्तर पश्चिम होती है अतः इन्हें उत्तरी गोलार्ध में उत्तरी पूर्वी पवन एवं दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिणी पूर्वी व्यापारिक पवनें कहा जाता है। इन पवनों की दिशा के कारण प्राचीन काल में व्यापारी अपनी नावों को चलाने के लिए इन पवनों की सहायता लेते थे अतः इनका नामकरण व्यापारिक पवन किया गया इनका विस्तार 30-35° डिग्री उत्तरी व दक्षिणी अक्षांश के बीच है।
पछुआ पवनें-
पछुआ पवन उपोषण उच्च वायुदाब पेटी से उपद्रवी न्यून वायुदाब पेटी से उपद्रुवीय न्यून वायुदाब पेटी की ओर दोनों गोलार्धों में चला करती हैं इसका विस्तार 30-35° डिग्री से 60-65° डिग्री के मध्य है, इनकी दिशा उत्तरी गोलार्ध में दक्षिणी पश्चिमी से उत्तर पूर्व और पश्चिमी गोलार्ध में उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व रहती है यह हवाओं के साथ साथ चक्रवात तथा प्रतिचक्रवात पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर चला करती है दक्षिणी गोलार्ध में स्थल की कमी के कारण इन दोनों का वेग अति तीव्र हो जाता है अतः 40-45° डिग्री दक्षिणी अक्षांशो के मध्य इनको गरजने वाली चालीसा कहते हैं।
ध्रुवीय पवनें-
ध्रुव पर अत्यधिक शीत के कारण वर्ष भर उच्च वायुदाब बना रहता है अतः उच्च वायुदाब से उप ध्रुवीय न्यून वायुदाब की ओर दोनों गोलार्ध में पवनें चला करती हैं। उत्तरी गोलार्ध में इनकी दिशा उत्तर पूर्व और दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण पूर्व होती है इनका विस्तार 65° डिग्री अक्षांश तक है।
अस्थाई पवनें-
मानसूनी हवाएं-
मानसूनी हवाएं हवाएं हैं जो ग्रीष्म ऋतु में सागर से स्थल की ओर और शीत ऋतु में स्थल से सागर की ओर चलती हैं यह वर्ष में दो बार अपनी दिशा ऋतु परिवर्तन के साथ साथ बदलती हैं कि स्थलीय और जलीय समीर हैं यह दो प्रकार की होती है।
ग्रीष्मकालीन मानसून-
सूर्य 21 जून को कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है जिससे एशिया का विस्तृत स्थल भाग अत्यधिक गर्म हो जाता है अधिक तापक्रम के कारण वायुदाब कम हो जाता है इसी समय हिंद महासागर तथा प्रशांत महासागर थल भाग की अपेक्षा शीतल रहते हैं क्योंकि जल धीरे-धीरे गर्म होता है अतः महासागरों पर अपेक्षाकृत अधिक वायुदाब रहता है फल स्वरुप उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर तीव्रता से वायु चलने लगती है यह हवाएं सागर से चलने के कारण नम होती है इन्हीं पवनों को ग्रीष्मकालीन मानसून अथवा दक्षिणी पश्चिमी मानसून कहते हैं।
शीतकालीन मानसून-
शीतकाल में सूर्य दक्षिणायन होता है और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर लंबवत चमकता है। संपूर्ण एशिया पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने के कारण तापक्रम कम हो जाता है और उच्च वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है जबकि हिंद महासागर तथा प्रशांत महासागर अपेक्षाकृत अधिक तापक्रम के कारण न्यून वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है अतः हवाएं एशिया की ओर से इन सागरों की ओर चलने लगती है इसलिए इन दोनों को उत्तरी पूर्वी मानसून या शीतकालीन मानसून कहते हैं तथा इनकी दिशा उत्तर पूर्व होती है।
पादप एवं जंतु :-
श्वसन प्रक्रिया में ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं और कार्बनडाइऑक्साइड बनाते हैं।
जलीय-प्राणी :-
वे जन्तु जो जल में पाये जाते हैं या जल में रहते हैं। श्वसन के लिए जल में घुली वायु का उपयोग करते हैं।
पवन चक्की :– पवन से चलने वाली युक्ति है जो डायनेमों की सहायता से विधुत उतपन्न करता है। प्रकृति में जलचक्र के लिए वायु में जलवाष्प का उपस्थित होना अनिवार्य है। जलने की क्रिया में केवल ऑक्सीजन की उवस्थिति में ही संभव है। कार्बनडाइऑक्साइड गैस की उवस्थिति में घुटन महसूस होता है। धुँए में कुछ गैसें एवं सूक्ष्म धूल के कण होते हैं जो प्रायः हानिकारक होते हैं। हमारी नाक में छोटे-छोटे बाल तथा श्लेष्मा उवस्थित होते है जो धूल के कणों को श्वसन-तंत्र में जाने से रोकते हैं।
प्रकृति में जलचक्र के लिए वायु में जलवाष्प का उपस्थित होना अनिवार्य है।
जलने की क्रिया में केवल ऑक्सीजन की उवस्थिति में ही संभव है।
कार्बनडाइऑक्साइड गैस की उपस्थिति में घुटन महसूस होता है।
धुँए में कुछ गैसें एवं सूक्ष्म धूल के कण होते हैं जो प्रायः हानिकारक होते हैं।
हमारी नाक में छोटे-छोटे बाल तथा श्लेष्मा उवस्थित होते है जो धूल के कणों को श्वसन-तंत्र में जाने से रोकते हैं।
जल में वायु विद्यमान होती है
वायु में आक्सीजन है
मिटटी में वायु होती है
NCERT SOLUTIONS
प्रश्न (पृष्ठ संख्या 153-154)
प्रश्न 1 वायु के संघटक क्या हैं?
उत्तर- नाइट्रोजन 76% और ऑक्सीजन 23% गैसें है जो मिलकर वायु का 99% भाग बनाती हैं। शेष 1% में कार्बन डाइऑक्साइड, कुछ अन्य गैसें, जलवाष्प तथा धूल के कण होते हैं |
प्रश्न 2 वायुमंडल की कौन-सी गैस श्वसन के लिए आवश्यक है?
उत्तर- ऑक्सीजन गैस श्वसन के लिए आवश्यक है |
प्रश्न 3 आप यह कैसे सिद्ध करेंगे कि वायु ज्वलन में सहायक होती है।
उत्तर- जब हम जलती हुई मोमबत्ती को किसी बड़े काँच के गिलास से ढक देते हैं तो मोमबत्ती तुरंत बंद बुझ जाती है ऐसा जलती हुई मोमबत्ती के वायु से संपर्क टूट जाने के कारण होता है | वायु का एक घटक ऑक्सीजन किसी भी पदार्थ के जलने में सहायक है | अत: हम कह सकते हैं कि वायु ज्वलन में सहायक है |
प्रश्न 4 आप यह कैसे दिखाएँगे कि वायु जल में घुली होती है?
उत्तर- जब किसी पात्र में जल उबाला जाता हैं इसके भीतर छोटे – छोटे बुलबुले दिखाई देते हैं | ये बुलबुले पानी उबलने से पहले दिखाई देते हैं | ये निश्चित ही वायु के बुलबुले होते हैं इससे प्रकट होता हैं कि जल में वायु घुली होती हैं |
प्रश्न 5 रुई का ढेर जल में क्यों सिकुड़ जाता है?
उत्तर- रूई का ढेर जल में सिकुड़ जाता हैं क्योंकि जल में इसकी साड़ी हवा निकल जाती हैं | इसकी परतें आपस में चिपक जाती हैं, इसलिए ढेर सिकुड़ जाता हैं |
प्रश्न 6 पृथ्वी के चारों ओर की वायु की परत ————– कहलाती है।
उत्तर- वायुमंडल |
प्रश्न 7 हरे पौधें को भोजन बनाने के लिए वायु के अवयव ————– की आवश्यकता होती है |
उत्तर- कार्बन – डाईऑक्साइड |
प्रश्न 8 पाँच क्रियाकलापों की सूची बनाइए, जो वायु की उपस्थिति के कारण संभव है।
उत्तर-
(i) निष्पावन
(ii) बादल की सरंचना
(iii) श्वसन
(iv) प्रकाश सश्लेष्ण
(v) वाष्पोत्सर्जन
(vi) पक्षियों का तोड़ना
प्रश्न 9 वायुमंडल में गैसों के आदान-प्रदान में पौधे तथा जंतु एक-दूसरे की किस प्रकार सहायता करते हैं?
उत्तर- प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में पौधें कार्बन डाईऑक्साइड ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं | जन्तु ऑक्सीजन को श्वसन के रूप में ग्रहण करते हैं और कार्बन डाईऑक्साइड को छोड़ने हैं जो पुन: भोजन के निर्माण के लिए पैधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण के लिए इस्तेमाल की जाती हैं |
इस प्रकार वायुमंडल में पौधें और जंतु, गैसों के आदान – प्रदान एक – दुसरे की सहायता करते हैं|
