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लिंग-Class 6-Hindi-Grammar

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लिंग

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लिंग

शब्द के जिस रूप से उसकी जाति (नर, मादा) का बोध होता है, उसे लिंग (Gender in hindi)कहते हैं।

लिंग दो प्रकार के होते हैं –

  1. पुल्लिंग
  2. स्त्रीलिंग

शब्दों के जिस रूप में उनके ’नरत्व’ (पुरुषत्व) का बोध होता है, उसे ’पुल्लिंग ’ तथा शब्दों के जिस रूप से उसके ’स्त्रीत्व’ का बोध होता है, उसे ’स्त्रीलिंग’ कहते हैं |

जैसे –

पुल्लिंग शब्द – लङका, बैल, पेङ, नगर आदि।

स्त्रीलिंग शब्द – गाय, लङकी, लता, नदी आदि।

हिन्दी भाषा में सृष्टि के समस्त पदार्थों को दो ही लिंगों में विभक्त किया गया है।

निर्जीव शब्दों का लिंग निर्धारण कठिन होता है, सजीव शब्दों का लिंग निर्धारण सरलता से हो जाता है।

संस्कृत के पुल्लिंग तथा नपुंसकलिंग शब्द, जो हिन्दी में प्रयुक्त होते हैं, उसी रूप में स्वीकार कर लिए गए हैं, जैसे- तन, मन, धन, देश, जगत् आदि पुल्लिंग तथा सुन्दरता, आशा, लता दिशा जैसे शब्द स्त्रीलिंग है।

पुल्लिंग

हिन्दी में जो शब्द रूप या बनावट के आधार पर पुल्लिंग होते हैं, उनका परिचय इस प्रकार है

  • अकारान्त पुल्लिंग शब्द- राम, बालक, गृह, सूर्य, सागर आदि।
  • आकारान्त पुल्लिंग शब्द- घङा, चूना, बूरा आदि।
  • इकारान्त पुल्लिंग शब्द- कवि, हरि, कपि, वारि।
  • ईकारान्त पुल्लिंग शब्द- मोती, पानी, घी आदि।
  • उकारान्त पुल्लिंग शब्द- भानु, शिशु, गुरु आदि।
  • ऊकारान्त पुल्लिंग शब्द- बाबू, चाकू, आलू, भालू आदि।
  • प्रत्यान्त पुल्लिंग शब्द – आव या आवा (घुमाव, पङाव, बढ़ावा, चढ़ावा), ना (चलना, तैरना, सोना, जागना,) पन (लङकपन, भोलापन, बङप्पन, बचपन), आन (मिलान, खानपान, लगान), खाना (डाकखाना, चिङियाखाना)।
  • अर्थ की दृष्टि से पुल्लिंग शब्द प्रायः धातुओं और रत्नों के नाम – सोना, लोहा, हीरा, मोती आदि (चाँदी को छोङकर)
  • भोज्य पदार्थ पेङा, लड्डू, हलुवा, अनाजों के नाम गेहूँ, जौ, चना।
  • दिनों-महीनों के नाम सोमवार से रविवार तक सभी दिन, हिन्दी महीनों के नाम चैत्र, बैसाख, सावन, भादों आदि।
  • हिमालय, हिन्दमहासागर, भारत, चन्द्रमा आदि पर्वत, सागर, देश और ग्रहों के नाम (पृथ्वी) पुल्लिंग होते हैं।

स्त्रीलिंग –

रूप या बनावट के आधार पर

  • आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द – लता, सरिता, मामला, उदारता
  • इकारान्त स्त्रीलिंग शब्द – मति, रुचि, छवि।
  • अग्नि संस्कृत में पुल्लिंग है, परन्तु हिन्दी में स्त्रीलिंग है। (अपवाद)।
  • ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्द – नदी, सरस्वती।
  • उकारान्त एवं ऊकारान्त स्त्रीलिंग शब्द- धातु, बालू, सरयू।
  • प्रत्यान्त स्त्रीलिंग शब्द – ’इया’ (डिबिया, खटिया, बछिया, बिटिया)। ’अन’ (लगन, जलन, उलझन, तपन, सूजन), ’अ’ (चहक, महक, तङप आदि।) ’आई’ (लङाई, मिठाई, लिखाई, पढ़ाई, खटाई), ’त’ (अदालत, वकालत, कीमत, इज्जत, वसीयत आदि)।
  • वे संज्ञा, जिनके अन्त में ’ख’ स्त्रीलिंग-भूख, आँख, साख, कोख आदि।
  • अपवाद दुःख, सुख, मुख आदि पुल्लिंग हैं।

अर्थ की दृष्टि से

नक्षत्रों (रोहिणी, भरणी), नदियों व झीलों (गंगा, यमुना, सरस्वती, सरयू, सांभर, डल), तिथियों (पङवा, दोयज, तीज), भाववाचक संज्ञाएँ इच्छा, अर्चना, ऋद्धि-सिद्धि कटुता, महानता, सरलता आदि।

वाक्य रचना में लिंग के शुद्ध प्रयोग

  • संज्ञा शब्द पुल्लिंग या स्त्रीलिंग होते हैं।
  • सर्वनाम में लिंग भेद नहीं होता, क्योंकि सर्वनाम का लिंग निर्णय ’क्रिया’ के आधार पर होता है।
  • विशेषण पद प्रायः अपने निकटतम विशेष्य के अनुसार ही स्त्रीलिंग या पुल्लिंग होते हैं – अच्छा लङका, अच्छी बात, काला बछङा, काली गाय, बङा बेटा, बङी बेटी आदि।
  • क्रिया पदों का लिंग कर्ता के अनुसार होता है, नदी बहती है। झरना बहता है।
  • कर्ता में विकल्प होने पर क्रिया का लिंग बाद वाले कर्ता के समान होता है, जैसे-राम या सीता गई। वहाँ कुआँ या नदी दिखाई पङेगी।

लिंग – परिवर्तन

पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के कतिपय नियम इस प्रकार हैं –

  1. शब्दान्त ’अ’ को ’आ’ में बदलकर-

छात्र-छात्रा

वृद्ध-वृद्धा

पूज्य-पूज्या

भवदीय-भवदीया

सुत-सुता

अनुज-अनुजा

  1. शब्दान्त ’अ’ को ’ई’ में बदलकर –

देव-देवी

पुत्र -पुत्री

ब्राह्मण-ब्राह्मणी

मेंढक-मेंढकी

गोप-गोपी

दास-दासी

  1. शब्दान्त ’आ’ को ’ई’ में बदलकर-

नाना-नानी

बेटा-बेटी

लङका-लङकी

रस्सा-रस्सी

घोङा-घोङी

चाचा-चाची

  1. शब्दान्त ’आ’ को ’इया’ में बदलकर –

बूढ़ा-बुढ़िया

चूहा-चुहिया

कुत्ता-कुतिया

डिब्बा-डिबिया

बेटा-बेटिया

लोटा-लुटिया

  1. शब्दान्त प्रत्यय ’अक’ को ’इका’ में बदलकर –

बालक-बालिका

लेखक-लेखिका

पाठक-पाठिका

गायक-गायिका

नायक-नायिका

  1. ’आनी’ प्रत्यय लगाकर –

देवर-देवरानी

चौधरी -चौधरानी

भव-भवानी

जेठ-जेठानी

सेठ-सेठानी

  1. ’नी’ प्रत्यय लगाकर –

शेर-शेरनी

मोर-मोरनी

सिंह-सिंहनी

ऊँट-ऊँटनी

जाट-जाटनी

भील-भीलनी

  1. शब्दान्त में ’ई’ के स्थान पर ’इनी’ लगाकर –

हाथी-हथिनी 

तपस्वी-तपस्विनी

स्वामी-स्वामिनी

  1. ’इन’ प्रत्यय लगाकर –

माली-मालिन

चमार-चमारिन

नाई-नाइन

कुम्हार-कुम्हारिन

धोबी-धोबिन

सुनार-सुनारिन

  1. ’आइन’ प्रत्यय लगाकर –

चौधरी – चौधराइन

ठाकुर-ठकुराइन

मुंशी -मुंशियाइन

  1. शब्दान्त ’मान’ के स्थान पर ’मती’ लगाकर –

श्रीमान्-श्रीमती

बुद्धिमान-बुद्धिमती

आयुष्मान-आयुष्मती

  1. शब्दान्त ’ता’ के स्थान पर ’त्री’ लगाकर –

कर्ता -कर्त्री

नेता-नेत्री

दाता-दात्री

  1. शब्द के पूर्व में ’मादा’ शब्द लगाकर –

खरगोश-मादा खरगोश

भालू-मादा भालू

भेङिया-मादा भेङिया

  1. भिन्न रूप वाले कतिपय शब्द –

कवि-कवयित्री

वर-वधू

वीर-वीरांगना

मर्द-औरत

दूल्हा-दुलहिन

नर-नारी

राजा-रानी

पुरुष-स्त्री

बादशाह-बेगम

युवक-युवती

विद्वान-विदुषी

साधु-साध्वी

बैल-गाय

भाई-भाभी

ससुर-सास

महत्त्वपूर्ण तथ्य –

  • शब्द के जिस रूप से उसकी जाति (नर-मादा) का बोध हो, वह लिंग है।
  • हिन्दी में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग का निर्धारण ’रूप या बनावट’ तथा ’अर्थ’ की दृष्टि से किया जाता है।

भाषा -Class 6-Hindi-Grammar

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भाषा 

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भाषा की परिभाषा

भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर व पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों का आदान-प्रदान करता है।

अथवा

जिसके द्वारा हम अपने भावों को लिखित अथवा कथित रूप से दूसरों को समझा सके और दूसरों के भावो को समझ सके उसे भाषा कहते है।

अथवा

सरल शब्दों में: सामान्यतः भाषा मनुष्य की सार्थक व्यक्त वाणी को कहते है।

मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुअों के विषय अपनी इच्छा और मति का आदान प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि-संकेतो का जो व्यवहार होता है, उसे भाषा कहते है।

भाषा के प्रकार

भाषा के तीन रूप होते है:

1.मौखिक भाषा

2.लिखित भाषा

3.सांकेतिक भाषा

  1. मौखिक भाषा 

विद्यालय में वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में वक्ताओं ने बोलकर अपने विचार प्रकट किए तथा श्रोताओं ने सुनकर उनका आनंद उठाया। यह भाषा का मौखिक रूप है। इसमें वक्ता बोलकर अपनी बात कहता है व श्रोता सुनकर उसकी बात समझता है।

इस प्रकार, भाषा का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति बोलकर विचार प्रकट करता है और दूसरा व्यक्ति सुनकर उसे समझता है, मौखिक भाषा कहलाती है।

दूसरे शब्दों में- जिस ध्वनि का उच्चारण करके या बोलकर हम अपनी बात दुसरो को समझाते है, उसे मौखिक भाषा कहते है। 

उदाहरण: टेलीफ़ोन, दूरदर्शन, भाषण, वार्तालाप, नाटक, रेडियो आदि।

मौखिक या उच्चरित भाषा, भाषा का बोल-चाल का रूप है। उच्चरित भाषा का इतिहास तो मनुष्य के जन्म के साथ जुड़ा हुआ है। मनुष्य ने जब से इस धरती पर जन्म लिया होगा तभी से उसने बोलना प्रारंभ कर दिया होगा तभी से उसने बोलना प्रारंभ कर दिया होगा। इसलिए यह कहा जाता है कि भाषा मूलतः मौखिक है।

यह भाषा का प्राचीनतम रूप है। मनुष्य ने पहले बोलना सीखा। इस रूप का प्रयोग व्यापक स्तर पर होता है।

मौखिक भाषा की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  • यह भाषा का अस्थायी रूप है।
  • उच्चरित होने के साथ ही यह समाप्त हो जाती है।
  • वक्ता और श्रोता एक-दूसरे के आमने-सामने हों प्रायः तभी मौखिक भाषा का प्रयोग किया जा सकता है।
  • इस रूप की आधारभूत इकाई ‘ध्वनि’ है। विभिन्न ध्वनियों के संयोग से शब्द बनते हैं जिनका प्रयोग वाक्य में तथा विभिन्न वाक्यों का प्रयोग वार्तालाप में किया जाता हैं।
  • यह भाषा का मूल या प्रधान रूप हैं।
  1. लिखित भाषा 

मुकेश छात्रावास में रहता है। उसने पत्र लिखकर अपने माता-पिता को अपनी कुशलता व आवश्यकताओं की जानकारी दी। माता-पिता ने पत्र पढ़कर जानकारी प्राप्त की। यह भाषा का लिखित रूप है। इसमें एक व्यक्ति लिखकर विचार या भाव प्रकट करता है, दूसरा पढ़कर उसे समझता है।

इस प्रकार भाषा का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति अपने विचार या मन के भाव लिखकर प्रकट करता है और दूसरा व्यक्ति पढ़कर उसकी बात समझता है, लिखित भाषा कहलाती है।

दूसरे शब्दों में- जिन अक्षरों या चिन्हों की सहायता से हम अपने मन के विचारो को लिखकर प्रकट करते है, उसे लिखित भाषा कहते है।

उदाहरण: पत्र, लेख, पत्रिका, समाचार-पत्र, कहानी, जीवनी, संस्मरण, तार आदि।

उच्चरित भाषा की तुलना में लिखित भाषा का रूप बाद का है। मनुष्य को जब यह अनुभव हुआ होगा कि वह अपने मन की बात दूर बैठे व्यक्तियों तक या आगे आने वाली पीढ़ी तक भी पहुँचा दे तो उसे लिखित भाषा की आवश्यकता हुई होगी। अतः मौखिक भाषा को स्थायित्व प्रदान करने हेतु उच्चरितध्वनि प्रतीकों के लिए ‘लिखित-चिह्नों’ का विकास हुआ होगा।

इस तरह विभिन्न भाषा-भाषी समुदायों ने अपनी-अपनी भाषिक ध्वनियों के लिए तरह-तरह की आकृति वाले विभिन्न लिखित-चिह्नों का निर्माण किया और इन्हीं लिखित-चिह्नों को ‘वर्ण’ (letter) कहा गया। अतः जहाँ मौखिक भाषा की आधारभूत इकाई ध्वनि (Phone) है तो वहीं लिखित भाषा की आधारभूत इकाई ‘वर्ण‘ (letter) हैं।

लिखित भाषा की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  • यह भाषा का स्थायी रूप है।
  • इस रूप में हम अपने भावों और विचारों को अनंत काल के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।
  • यह रूप यह अपेक्षा नहीं करता कि वक्ता और श्रोता आमने-सामने हों।
  • इस रूप की आधारभूत इकाई ‘वर्ण’ हैं जो उच्चरित ध्वनियों को अभिव्यक्त (represent) करते हैं।
  • यह भाषा का गौण रूप है।

इस तरह यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि भाषा का मौखिक रूप ही प्रधान या मूल रूप है। किसी व्यक्ति को यदि लिखना-पढ़ना (लिखित भाषा रूप) नहीं आता तो भी हम यह नहीं कह सकते कि उसे वह भाषा नहीं आती। किसी व्यक्ति को कोई भाषा आती है, इसका अर्थ है- वह उसे सुनकर समझ लेता है तथा बोलकर अपनी बात संप्रेषित कर लेता है।

  1. सांकेतिक भाषा 

जिन संकेतो के द्वारा बच्चे या गूँगे अपनी बात दूसरों को समझाते है, वे सब सांकेतिक भाषा कहलाती है।

दूसरे शब्दों में- जब संकेतों (इशारों) द्वारा बात समझाई और समझी जाती है, तब वह सांकेतिक भाषा कहलाती है।

जैसे- चौराहे पर खड़ा यातायात नियंत्रित करता सिपाही, मूक-बधिर व्यक्तियों का वार्तालाप आदि।

इसका अध्ययन व्याकरण में नहीं किया जाता।

बोली और भाषा में अन्तर क्या है

बोली और भाषा में अन्तर है। भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है। भाषा में लिखित और मौखिक दोनों रूप होते हैं। बोली भाषा का ऐसा रूप है जो किसी छोटे क्षेत्र में बोला जाता है। जब बोली इतनी विकसित हो जाती है कि वह किसी लिपि में लिखी जाने लगे, उसमें साहित्य-रचना होने लगे और उसका क्षेत्र भी अपेक्षाकृत विस्तृत हो जाए तब उसे भाषा कहा जाता है।

हिन्दी भाषा

बहुत सारे विद्वानों का मत है कि हिन्दी भाषा संस्कृत से निष्पन्न है; परन्तु यह बात सत्य नहीं है। हिन्दी की उत्पत्ति अपभ्रंश भाषाओं से हुई है और अपभ्रंश की उत्पत्ति प्राकृत से। प्राकृत भाषा अपने पहले की पुरानी बोलचाल की संस्कृत से निकली है।

स्पष्ट है कि हमारे आदिम आर्यों की भाषा पुरानी संस्कृत थी। उनके नमूने ऋग्वेद में दिखते हैं। उसका विकास होते-होते कई प्रकार की प्राकृत भाषाएँ पैदा हुई। हमारी विशुद्ध संस्कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई है। प्राकृत भाषाओं के बाद अपभ्रशों और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है।

हिन्दी भाषा और उसका साहित्य किसी एक विभाग और उसके साहित्य के विकसित रूप नहीं हैं; वे अनेक विभाषाओं और उनके साहित्यों की समष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं।

एक बहुत बड़े क्षेत्र- जिसे चिरकाल से मध्यदेश कहा जाता रहा है- की अनेक बोलियों के ताने-बाने से बुनी यही एक ऐसी आधुनिक भाषा है, जिसने अनजाने और अनौपचारिक रीति से देश की ऐसी व्यापक भाषा बनने का प्रयास किया था, जैसी संस्कृत रहती चली आई थी; किन्तु जिसे किसी नवीन भाषा के लिए अपना स्थान तो रिक्त करना ही था।

वर्तमान हिन्दी भाषा का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक हो चला। है इसे निम्नलिखित विभागों में बाँटा गया हैं-

  • बिहारी भाषा : बिहारी भाषा बँगला भाषा से अधिक संबंध रखती है। यह पूर्वी उपशाखा के अंतर्गत है और बँगला, उड़िया और आसामी की बहन लगती है। इसके अंतर्गत निम्न बोलियाँ हैं- मैथली, मगही, भोजपुरी, पूर्वी आदि। मैथली के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ठाकुर और भोजपुरी के बहुत बड़े प्रचारक भिखारी ठाकुर हुए।
  • पूर्वी हिन्दी : अर्द्धमागधी प्राकृत के अप्रभ्रंश से पूर्वी हिन्दी निकली है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसे महाकाव्यों की रचना पूर्वी हिन्दी में ही की। दूसरी तीन बोलियाँ हैं- अवध, बघेली और छत्तीसगढ़ी। मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी प्रसिद्ध रचनाएँ इसी भाषा में लिखी हैं।
  • पश्चिमी हिन्दी : पूर्वी हिन्दी तो बाहरी और भीतरी दोनों शाखाओं की भाषाओं के मेल से बनी हैं; परन्तु पश्चिमी हिन्दी का संबंध भीतरी शाखा से है।

प्रत्यय -Class 6-Hindi-Grammar

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प्रत्यय 

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प्रत्यय

जो शब्दांश किसी शब्द के बाद लगकर उसके अर्थ को बदल देते हैं और नए अर्थ का बोध कराते हैं उसे प्रत्यय कहते हैं। भाषा में प्रत्यय का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि उसके प्रयोग से मूल शब्द के अनेक अर्थों को प्राप्त किया जा सकता है। यौगिक शब्द बनाने में प्रत्यय का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

प्रत्यय के उदाहरण –

खिल + आङीखिलाङी
मिल + आवटमिलावट
पढ़ + आकूपढ़ाकू
झूल + आझूला

प्रत्यय तीन प्रकार–

  1. संस्कृत प्रत्यय
  2. हिन्दी प्रत्यय
  3. विदेशी प्रत्यय

हिन्दी प्रत्यय के दो प्रकार होते है –

  • कृत् प्रत्यय
  • तद्धित प्रत्यय
  1. संस्कृत प्रत्यय –

जैसे –

इतहर्षित, गर्वित, लज्जित, पल्लवित
इकमानसिक, धार्मिक, मार्मिक, पारिश्रमिक
ईयभारतीय, मानवीय, राष्ट्रीय, स्थानीय
एयआग्नेय, पाथेय, राधेय, कौंतेय
तमअधिकतम, महानतम, वरिष्ठतम, श्रेष्ठतम
वान्धनवान, बलवान, गुणवान, दयावान
मान्श्रीमान्, शोभायमान, शक्तिमान, बुद्धिमान
त्वगुरुत्व, लघुत्व, बंधुत्व, नेतृत्व
शालीवैभवशाली, गौरवशाली, प्रभावशाली, शक्तिशाली
तरश्रेष्ठतर, उच्चतर, निम्नतर, लघूत्तर
  1. हिन्दी प्रत्यय –

हिंदी प्रत्यय मुख्यतया दो प्रकार के होते है –

  1. कृत् प्रत्यय
  2. तद्धित प्रत्यय
  3. कृत् प्रत्यय

वे प्रत्यय जो धातु अथवा क्रिया के अन्त में लगकर नए शब्दों की रचना करते उन्हें कृत् प्रत्यय कहते हैं। कृत् प्रत्ययों से संज्ञा तथा विशेषण शब्दों की रचना होती है।

संज्ञा की रचना करने वाले कृत प्रत्यय –

कृत प्रत्यय उदाहरण –

बेलन, बंधन, नंदन, चंदन
बोली, सोची, सुनी, हँसी
झूला, भूला, खेला, मेला
अनमोहन, रटन, पठन
आहटचिकनाहट, घबराहट, चिल्लाहट

जैसे –विशेषण की रचना करने वाले कृत प्रत्यय –

आङीखिलाङी, अगाङी, अनाङी, पिछाङी
एरालुटेरा, बसेरा
आऊबिकाऊ, टिकाऊ, दिखाऊ
डाकू, चाकू, चालू, खाऊ

कृत् प्रत्यय के भेद

  1. कृत् वाचक
  2. कर्म वाचक
  3. करण वाचक
  4. भाव वाचक
  5. क्रिया वाचक
  6. कृत् वाचक –

कर्ता का बोध कराने वाले प्रत्यय कृत् वाचक प्रत्यय कहलाते है।

कृत् वाचक प्रत्यय उदाहरण –

हारपालनहार, चाखनहार, राखनहार
वालारखवाला, लिखनेवाला, पढ़नेवाला
रक्षक, भक्षक, पोषक, शोषक
अकलेखक, गायक, पाठक, नायक
तादाता, माता, गाता, नाता
  1. कर्म वाचक कृत् प्रत्यय –

कर्म का बोध कराने वाले कृत् प्रत्यय कर्म वाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।

कर्म वाचक कृत् प्रत्यय उदाहरण :

औनाखिलौना, बिछौना
नीओढ़नी, मथनी, छलनी
नापढ़ना, लिखना, गाना
  1. करण वाचक कृत् प्रत्यय –

साधन का बोध कराने वाले कृत् प्रत्यय करण वाचक कृत प्रत्यय कहलाते हैं।

करण वाचक कृत प्रत्यय उदाहरण :

अनपालन, सोहन, झाङन
नीचटनी, कतरनी, सूँघनी

झाडू, चालू
खाँसी, धाँसी, फाँसी
  1. भाव वाचक कृत् प्रत्यय –

क्रिया के भाव का बोध कराने वाले प्रत्यय भाववाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।

भाववाचक कृत् प्रत्यय उदाहरण :

आपमिलाप, विलाप
आवटसजावट, मिलावट, लिखावट
आवबनाव, खिंचाव, तनाव
आईलिखाई, खिंचाई, चढ़ाई
  1. क्रियावाचक कृत् प्रत्यय –

क्रिया शब्दों का बोध कराने वाले कृत् प्रत्यय क्रिया वाचक कृत प्रत्यय कहलाते हैं

क्रिया वाचक कृत प्रत्यय उदाहरण :

याआया, बोया, खाया
करगाकर, देखकर, सुनकर
सूखा, भूला
ताखाता, पीता, लिखता

तद्धित प्रत्यय –

क्रिया को छोङकर संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि में जुङकर नए शब्द बनाने वाले प्रत्यय तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

तद्धित प्रत्यय उदाहरण –

मानव + तामानवता
जादू + गरजादूगर
बाल +पनबालपन
लिख + आईलिखाई

तद्धित प्रत्यय के भेद

  1. कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय
  2. भाववाचक तद्धित प्रत्यय
  3. सम्बन्ध वाचक तद्धित प्रत्यय
  4. गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
  5. स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय
  6. ऊनतावाचक तद्धित प्रत्यय
  7. स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय
  8. कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय –

कर्ता का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय कर्तृवाचक तद्धति प्रत्यय कहलाते हैं।

कर्तृवाचक तद्धति प्रत्यय उदाहरण :

आरसुनार, लुहार, कुम्हार
माली, तेली
वालागाङीवाला, टोपीवाला, इमलीवाला
  1. भाववाचक तद्धित प्रत्यय –

भाव का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

भाववाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :

आहटकङवाहट
तासुन्दरता, मानवता, दुर्बलता
आपामोटापा, बुढ़ापा, बहनापा
गर्मी, सर्दी, गरीबी
  1. सम्बन्ध वाचक तद्धित प्रत्यय –

सम्बन्ध का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय सम्बन्ध वाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

सम्बन्ध वाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :

इकशारीरिक, सामाजिक, मानसिक
आलुकृपालु, श्रद्धालु, ईर्ष्यालु
ईलारंगीला, चमकीला, भङकीला
तरकठिनतर, समानतर, उच्चतर
  1. गुणवाचक तद्धित प्रत्यय –

गुण का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय गुणवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

गुणवाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :

वानगुणवान, धनवान, बलवान
ईयभारतीय, राष्ट्रीय, नाटकीय
सूखा, रूखा, भूखा
क्रोधी, रोगी, भोगी
  1. स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय –

स्थान का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :

वालाशहरवाला, गाँववाला, कस्बेवाला
इयाउदयपुरिया, जयपुरिया, मुंबइया
रूसी, चीनी, राजस्थानी
  1. ऊनतावाचक तद्धित प्रत्यय –

लघुता का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय ऊनतावाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

जैसे –

इयालुटिया
प्याली, नाली, बाली
ङीचमङी, पकङी
ओलाखटोला, संपोला, मंझोला
  1. स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय –

स्त्रीलिंग का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।

स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :

आइनपंडिताइन, ठकुराइन
इनमालिन, कुम्हारिन, जोगिन
नीमोरनी, शेरनी, नन्दनी
आनीसेठानी, देवरानी, जेठानी

उर्दू के प्रत्यय

उर्दू भाषा का हिन्दी के साथ लम्बे समय तक प्रचलन में रहने के कारण हिन्दी भाषा में उर्दू भाषा प्रत्यय भी प्रयोग में आने लगे हैं।

जैसे –

गीताजगी, बानगी, सादगी
गरकारीगर, बाजीगर, सौदागर
चीनकलची, तोपची, अफीमची
दारहवलदार, जमींदार, किरायेदार
खोरआदमखोर, चुगलखोर, रिश्वतखोर
गारखिदमतगार, मददगार, गुनहगार
नामाबाबरनामा, जहाँगीरनामा, सुलहनामा
बाजधोखेबाज, नशेबाज, चालबाज
मन्दजरूरतमन्द, अहसानमन्द, अकलमन्द
आबादसिकन्दराबाद, औरंगाबाद, मौजमाबादइन्दा – बाशिन्दा, शर्मिन्दा, परिन्दा
इशसाजिश, ख्वाहिश, फरमाइश
गाहख्वाबगाह, ईदगाह, दरगाह
गीरआलमगीर, जहाँगीर, राहगीर
आनानजराना, दोस्ताना, सालाना
इयतइंसानियत, खैरियत, आदमियत
ईनशौकीन, रंगीन, नमकीन
कारसलाहकार, लेखाकार, जानकार
दानखानदान, पीकदान, कूङादान
बन्दकमरबंद, नजरबंद, दस्तबंद

पत्र लेखन-Class 6-Hindi Grammar

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पत्र लेखन

पत्र लेखन की परिभाषा ।

पत्र लेखन का अर्थ – कागज के माध्यम से समाचारो का आदान प्रदान करना ही पत्र लेखन कहलाता है। प्राचीन समय में पत्र लेखन का प्रचलन बहुत अधिक था, फिर चाहे पत्र औपचारिक हो या अनौपचारिक दोनों ही स्तिथी में कागज में लिखे जाने वाले पत्रों का उपयोग किया जाता था। 

परन्तु आज समय की आधुनिकता के साथ साथ सभी चीज़ो का आधुनिकरण हो रहा है। अब लोग अनौपचारिक पत्रों के लिए मोबाइल, टेलीफ़ोन, टेलीग्राम आदि का इस्तेमाल करने लगे है, लेकिन आज भी औपचारिक पत्र तो कागज के माध्यम से ही पहुंचाए जा रहे है। इसलिए आइये पत्र लेखन क्या है?, पत्र लेखन किसे कहते हैं इसे विस्तार में समझते है।

पत्र लेखन का इतिहास।

पत्र लेखन की विधा बहुत ही पुरानी है। परंतु यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि पत्र लेखन का प्रारंभ कब हुआ कहां से हुआ और कैसे हुआ? किसने पहली बार पहली बार पत्र, कब कैसे और क्यों लिखा? 

इन कठिन प्रश्नों का उत्तर आज तक इतिहास में कहीं भी देखने को नहीं मिला फिर भी इतना कह सकते हैं कि जब से हमारा मानव जीवन आरंभ हुआ है और हमने लिखना सीखा है तब से ही पत्र लेखन प्रारंभ हो गया था।

पत्र लेखन से क्या अभिप्राय है।

आज हमारे इतिहास के माध्यम से पता चलता है कि भाषा वैज्ञानिकों का कहना है कि अपने मन की बात को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए हम जिस लिपि का प्रयोग करते थे वह चित्र लिपि होती थी। आज हम भली भांति जानते हैं कि किसी भी तरह के लेखन का इतिहास चित्रलिपि से ही प्रारंभ होता है।चित्र लिपि के अंतर्गत किसी अन्य लिपियों का भी विकास हुआ है जो निम्न है- सूत्र लिपि,प्रतीकात्मक लिपि, भाग मूलक, ध्वनिमुलक लिपि। चित्र लिपि एवं भाव मूलक लिपि के प्राचीन प्रमाण आज भी हमारे इतिहास में उपलब्ध है परंतु यह अत्यधिक प्राचीन नहीं है लेकिन स्पष्ट है कि विभिन्न खोजकर्ताओं की खोज से लेखन का प्रारंभ चित्र लिपि एवं भाग लिपि से ही हुआ है।

हम सभी इस जानते हैं कि पत्र लेखन एक सबसे महत्वपूर्ण एवं उपयोगी कला में से है और हम यह भी जानते हैं कि पत्र के उपयोग के बिना हमारे कार्य भी पूर्ण नहीं होते। हम दूर बैठे हुए संबंधी, मित्र को अपने मन की बात पत्र के द्वारा ही लिखकर पहुंचाते हैं। आधुनिक पत्र लेखन अर्थात पत्राचार शिष्टाचार का एक मुलक बन गया है। साहित्य के प्रमुख क्षेत्रों में आज पत्र लेखन भी पत्र साहित्य का रूप धारण किए हुए है।अब हम सभी देखते हैं कि पत्र लेखन ना केवल संप्रेषण अपितु प्रभावशाली कला सुंदर रूप बन गया है।

पत्रों के प्रकार।

पत्र लेखन के मुख्यतः दो प्रकार होते है।

  • औपचारिक पत्र लेखन – 
  • अनौपचारिक पत्र लेखन – 

हम पत्र तो लिखना जानते है लेकिन यह समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि आखिर पत्र औपचारिक है या अनोपचारिक। बस यही समस्या का समाधान करने के लिए आज हम इन दोनों प्रकारो को विस्तार से समझेंगे।

औपचारिक पत्र लेखन।

ऐसे पत्र जिसे किसी सरकारी, अर्धसरकारी विभाग अथवा व्यवसायिक क्षेत्रों में लिखा जाता है उन पत्रों को औपचारिक पत्र कहा जाता है। औपचारीक पत्रों को लिखते समय बहुत ही सावधानी बरतनी पड़ती है क्योकि इस तरह के पत्रों की भाषा शैली भी औपचारिक ही होती है। ये निश्यित स्वरुप के सांचे में ढले हुए होते है। इन पत्रों के अंतर्गत शिकायत पत्र,निमंत्रण पत्र, सुझाव पत्र आते है।

औपचारिक पत्र लेखन कला को सरलता से सीखने के लिए आपको यह जानना बहुत आवश्यक है

अनौपचारीक पत्र लेखन

ऐसे पत्र जिन्हे लिखते समय सोच विचार करने की आवश्यकता न हो बल्कि अपनी सरल भाषा शैली का प्रयोग किया जाए उसे अनौपचारिक पत्र कहा जाता है। अनौपचारिक पत्र सबंध परक होते है ये पत्र परिवार, रिश्तेदार अथवा मित्र को लिखे जाते है। अनौपचारिक पत्रों का विषय हमेशा घरेलु एवं व्यक्तिगत होता है इसीलिए इन पत्रों को व्यक्तिगत पत्र भी कहा जाता है।  

पत्र लेखन की विशेषताएं।

पत्र लेखन की जितनी विशेषताएं लिखी जाए उतनी ही कम है क्योकि पत्र लेखन एक कला है। और किसी भी कला की विशेषताए कभी काम नहीं होती।

  • क्रमबद्धता पर ध्यान दिया जाता है।
  • भाषा की संछिप्तता होती है।
  • भाषा स्पष्ट एवं प्रचलित शब्दों से परिपूर्ण होती है।
  • प्रभावपूर्ण शैली का प्रयोग किया जाता है।
  • पत्रों का लेखन उद्देश्यपूर्ण होता है।
  • पाठक की हर जिज्ञासाओं का समाधान मिलता है। 

पत्र लेखन करते समय हमें किन बातो को ध्यान में रखना चाहिए

आइये अब हम यहाँ जानेंगे की पत्र लेखन करते समय हम ऐसी कोन – कोन सी बात को ध्यान में रखे जिससे हमारे द्वारा लिखे गए पत्र में कोई गलती न हो और पढ़ने वाले को भी पत्र का सार समाझ आ जाये।

  • सर्वप्रथम हमे जिस विषय में पत्र लिखना है उसका विषय स्पष्ट होना चाहिए।
  • पत्र की भाषा शैली आदरयुक्त सरल तथा मधुर होनी चाहिए।
  • काम शब्दों का प्रयोग कर उसे अधिक समझाने की युक्ति आनी चाहिए।
  • पत्र का प्रारंभिक भाग में पत्र लेखक का नाम,प्राप्तकर्ता का नाम,पता,दिनांक लिखने का ध्यान रखना अति आवश्यक है।
  • पत्र के अंतिम चरण में पहुंचने पर पत्र का सार स्पष्ट रूप से समाझ आना आवश्यक है।

पत्र लेखन करते समय लेखक को निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है जैसे कि आकार, भाषा, क्रम, शिष्टता, कागज, लिखावट।

आकार – बच्चों का आकार हमेशा छोटा अर्थात संछिप्त होना चाहिए। क्योंकि संक्षिप्त लिखावट वाले पत्र अच्छे पत्र के श्रेणी में आते हैं।

भाषा – पत्र लेखन करते समय भाषा एकदम सरल और भावपूर्ण होनी चाहिए ताकि पाठक को करते समय किसी तरह का मन में कोई भी संदेश ना रहे छोटे वाक्यों को लिए हुए विराम चिन्ह का ध्यान रखते हुए लिखा गया पत्र भाषा शैली में चार चांद लगा देता है।

क्रम – किसी भी लेखन को लिखते समय हम उसके क्रम का ध्यान रखते हैं उसी तरह पत्रिका लेखन करते समय क्रम का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है क्रम में बंधी हुई चीजें समझने में आसान होती हैं एवं पाठक को पत्र पढ़ने में उत्साह की अनुभूति होती है। पत्र लेखन करते समय क्रम का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।

शिष्टता – अच्छे पत्र की विशेषताएं होती है कि वहसिंबू पत्र लेखन व्यक्ति की अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करता है उसके चरित्र को दर्शाता है इसीलिए पत्र में लेखन में शिष्टता होना आवश्यक है।

काग़ज़ – पत्र लेखन के लिए सर्वप्रथम हमारे पास अच्छे गुणवत्ता वाले कागज का होना अनिवार्य है।

लिखावट – लेखन करता की लिखावट से स्पष्ट होता है कि पत्र कैसा है लिखावट के अनुरूप ही अच्छे पत्र की श्रेणी वर्गीकृत किया जाता है।

निबंध लेखन-Class 6-Hindi Grammar

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निबंध लेखन

निबंध लेखन की परिभाषा

  • अपने विचारों और भावों को जब हम नियंत्रण ढंग से लिखते हैं वह निबंध के रूप में जाना जाता है ‌
  • किसी भी विषय पर अपने भावों के अनुसार हम लिपि बंद करते हैं वह निबंध लेखन कहा जाता है।
  • नि + बंद यह दो शब्द को मिलाकर निबंध शब्द का निर्माण होता है।
  • इसका अर्थ यह होता है कि भली प्रकार से बांधी गई रचना जो विचार पूर्वक लिखा होना निबंध कहलाता है।

निबंध लेखन में अलग-अलग प्रकार के विषय

उस विषय पर लिखा जाता है जिसे हम सुनते रहते हैं,  देखते हैं और पढ़ते हैं । उदाहरण:

  • धार्मिक त्योहार
  • राष्ट्रीय त्योहार
  • मौसम
  • अलग-अलग प्रकार की समस्याएं, आदि

किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है। अभी के समय में सामाजिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक आदि विषयों पर निबंध ज्यादा लिखा जाता है।

निबंध लेखन: निबंध कैसे लिखें?

निबंध के 4 अंग होते हैं

निबंध लेखन में हमें चार अंगो को निबंध का हिस्सा बनाना आवश्यक है 

  1. शीर्षक : निबंध  में हमेशा शीर्षक आकर्षक होना ज़रूरी है। शीर्षक पढ़ने से लोगों में उत्सुकता बढ़ती है।
  2. प्रस्तावना: निबंध में सबसे श्रेष्ठ प्रस्तावना होती है, भूमिका नाम से भी इसे जाना जाता है । निबंध की शुरुआत में हमें किसी भी प्रकार की स्तुति , श्लोक या उदाहरण से करते हैं तो उसका अलग ही प्रभाव पड़ता है। 
  3. विषय विस्तार – निबंध में विषय विस्तार का सर्व प्रमुख अंश होता है, इसके अंदर तीन से चार अनुच्छेदों को अलग-अलग पहलुओं पर विचार प्रकट किया जा सकता है। निबंध लेखन में इसका संतुलन होना बहुत ही आवश्यक है। विषय विस्तार में निबंध कार अपने दृष्टिकोण को प्रकट करते हुए बता सकता है ‌ । 
  4. उप संहार – उप संहार को निबंध  में सबसे अंत में लिखा जाता है। पूरे निबंध में लिखी गई बातों को हम एक छोटे से अनुच्छेद में बता सकते हैं। इसके अंदर हम संदेश ,  उपदेश , विचारों या कविता की पंक्ति के माध्यम से भी निबंध को समाप्त कर सकते हैं ‌।

निबंध के प्रकार

निबंध तीन प्रकार के होते हैं। 

  1. वर्णनात्मक – संजीव या निर्जीव पदार्थ के बारे में जब हम निबंध लेखन करते हैं तब उसे वर्णनात्मक निबंध कहते हैं। यह निबंध लेखन स्थान , परिस्थिति , व्यक्ति आदि के आधार पर निबंध लिखा जाता है । 
  • प्राणी
  • श्रेणी
  • प्राप्ति स्थान
  • आकार प्रकार
  • स्वभाव 
  • विचित्रता
  • उपसंहार
  • मनुष्य
  • परिचय
  • प्राचीन इतिहास 
  • वंश परंपरा 
  • भाषा और धर्म 
  • सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन
  • स्थान
  • अवस्थिति
  • नामकरण
  • इतिहास
  • जलवायु
  • शिल्प
  • व्यापार
  • जाति धर्म
  • दर्शनीय स्थान
  • उपसंहार
  1. विवरणात्मक – ऐतिहासिक , पौराणिक या फिर आकस्मिक घटनाओं पर जब हम निबंध लेखन करते हैं उसे विवरणात्मक निबंध कहते हैं । यह निबंध लेखन यात्रा , मैच , ऋतु आदि पर लिख सकते हैं।
  • ऐतिहासिक
  • घटना का समय और स्थान
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
  • कारण और फलाफल
  • इष्ट अनिष्ट और मंतव्य 
  • आकस्मिक घटना
  • परिचय
  • तारीख, स्थान और कारण
  • विवरण और अंत
  • फलाफल
  • व्यक्ति और समाज
  • कैसा प्रभाव हुआ
  • विचारात्मक
  1. विचारात्मक निबंध: जब गुण , दोष या धर्म आदि पर निबंध लेखन किया जाता है उसे विचारात्मक निबंध कहते हैं या निबंध में किसी भी प्रकार की देखी गई या सुनी गई बातों का वर्णन नहीं किया जाए तो विचारात्मक निबंध कहलाता है। इसमें केवल कल्पना और चिंतन शक्ति की गई बातें लिख सकते हैं।
  • अर्थ, परिभाषा ,भूमिका
  • सार्वजनिक या सामाजिक ,स्वाभाविक ,कारण
  • तुलना 
  • हानि और लाभ
  • प्रमाण
  • उप संहार

निबंध लिखते समय नीचे गई बातों को ध्यान में रखें

  • निबंध  में विषय पर पूरा ज्ञान होना चाहिए।
  • अलग-अलग प्रकार के अनुच्छेद को एक दूसरे के साथ जुड़े होना चाहिए।
  • निबंध की भाषा सरल होनी अनिवार्य है।
  • निबंध लिखे गए विषय की जितनी हो सके उतनी जानकारी प्राप्त करें।
  • निबंध में स्वच्छता और विराम चिन्हों पर खास ध्यान दें।
  • निबंध में मुहावरों का प्रयोग होना जरूरी है।
  • निबंध में छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग करें।
  • निबंध के आरंभ में और अंत में कविता की पंक्तियों का भी उल्लेख कर सकते हैं।

स्वच्छ भारत अभियान पर निबंध

अपने प्रधानमंत्री बनने के बाद माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने गांधी जयंती के अवसर पर 02 अक्टूबर 2014, को इस अभियान का आगाज़ किया था। भारत को स्वच्छ करने की परिवर्तन कारी मुहिम चलाई थी। भारत को साफ-सुथरा देखना गांधी जी का सपना था। गांधी जी हमेशा लोगों को अपने आस-पास साफ-सफाई रखने को बोलते थे। स्वच्छ भारत के माध्यम से विशेषकर ग्रामीण अँचल के लोगो के अंदर जागरूकता पैदा करना है कि वो शौचालयों का प्रयोग करें, खुले में न जाये। इससे तमाम बीमारियाँ भी फैलती है। जोकि किसी के लिए अच्छा नहीं है।

“जो परिवर्तन आप दुनिया में देखना चाहते हैं वह सबसे पहले अपने आप में लागू करें।” -महात्मा गांधी।

महात्मा गांधी जी की ये बात स्वच्छता पर भी लागू होती है। अगर हम समाज में बदलाव देखना चाहते हैं तो सर्वप्रथम हमें स्वयं में बदलाव लाना होगा। हर कोई दूसरों की राह तकता रहता है। और पहले आप-पहले आप में गाड़ी छूट जाती है। साफ-सफाई से हमारा तन-मन दोनों स्वस्थ और सुरक्षित रहता है। यह हमें किसी और के लिए नहीं, वरन् खुद के लिए करना है। यह जागरूकता जन-जन तक पहुँचानी होगी। हमें इसके लिए ज़मीनी स्तर से लगकर काम करना होगा। हमें बचपन से ही बच्चों में सफाई की आदत डलवानी होगी। उन्हें सिखाना होगा कि, एक कुत्ता भी जहां बैठता है, उस जगह को झाड़-पोछ कर बैठता है। जब जानवरों में साफ-सफाई के प्रति इतनी जागरुकता है, फिर हम तो इन्सान है।

निष्कर्ष

गांधी जी की 145 वीं जयंती को शुरू हुआ यह अभियान, 2 अक्टूबर 2019 को पूरे पाँच वर्ष पूरे कर चुका है। जैसा कि 2019 तक भारत को पूर्ण रूप से ओपन डेफिकेसन फ्री (खुले में शौच मुक्त) बनाने का लक्ष्य रखा गया था। यह लक्ष्य पूर्णतः फलीभूत तो नहीं हुआ, परंतु इसके आँकड़ो में आश्चर्यजनक रूप से उछाल आया है।

दिवाली पर निबंध

दीपावली का अर्थ: दिवाली जिसे “दीपावली” के नाम से भी जाना जाता है, भारत और दुनिया भर में रहने वाले हिंदुओं के सबसे पवित्र त्योहारों में से एक है। ‘दीपावली’ संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है – दीप + आवली। ‘दीप’ का अर्थ होता है ‘दीपक’ तथा ‘आवली’ का अर्थ होता है ‘श्रृंखला’, जिसका मतलब हुआ दीपों की श्रृंखला या दीपों की पंक्ति। दीपावली का त्योहार कार्तिक मास के अमावस्या के दिन मनाया जाता है। यह त्योहार दुनिया भर के लोगों द्वारा बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। हालांकि इसे हिंदू त्योहार माना जाता है, लेकिन विभिन्न समुदायों के लोग भी पटाखे और आतिशबाजी के जरिए इस उज्ज्वल त्योहार को मनाते हैं।

दीपावली त्योहार की तैयारी: दीपावली त्योहार की तैयारियां दिवाली से कई दिनों पहले ही आरंभ हो जाती है। दीपावली के कई दिनों पहले से ही लोग अपने घरों की साफ-सफाई करने में जुट जाते हैं क्योंकि ऐसी मान्यता है कि जो घर साफ-सुथरे होते हैं, उन घरों में दिवाली के दिन माँ लक्ष्मी विराजमान होती हैं और अपना आशीर्वाद प्रदान करके वहां सुख-समृद्धि में बढ़ोत्तरी करती है। दिवाली के नजदीक आते ही लोग अपने घरों को दीपक और तरह-तरह के लाइट से सजाना शुरू कर देते हैं।

दिवाली में पटाखों का महत्व: दिवाली को “रोशनी का त्योहार” कहा जाता है। लोग मिट्टी के बने दीपक जलाते हैं और अपने घरों को विभिन्न रंगों और आकारों की रोशनी से सजाते हैं, जिसे देखकर कोई भी मंत्रमुग्ध हो सकता है। बच्चों को पटाखे जलाना और विभिन्न तरह के आतिशबाजी जैसे फुलझड़ियां, रॉकेट, फव्वारे, चक्री आदि बहुत पसंद होते हैं।

दिवाली का इतिहास: हिंदुओं के मुताबिक, दिवाली के दिन ही भगवान राम 14 वर्षों के वनवास के बाद अपनी पत्नी सीता, भाई लक्ष्मण और उनके उत्साही भक्त हनुमान के साथ अयोध्या लौटे थे, अमावस्या की रात होने के कारण दिवाली के दिन काफी अंधेरा होता है, जिस वजह से उस दिन पुरे अयोध्या को दीपों और फूलों से श्री राम चंद्र के लिए सजाया गया था ताकि भगवान राम के आगमन में कोई परेशानी न हो, तब से लेकर आज तक इसे दीपों का त्योहार और अंधेरे पर प्रकाश की जीत के रूप में मनाया जाता है।

इस शुभ अवसर पर, बाजारों में गणेश जी, लक्ष्मी जी, राम जी आदि की मूर्तियों की खरीदारी की जाती है। बाजारों में खूब चहल पहल होती है। लोग इस अवसर पर नए कपड़े, बर्तन, मिठाइयां आदि खरीदते है। हिंदुओं द्वारा देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है क्योंकि व्यापारी दिवाली पर नई खाता बही की शुरुआत करते हैं। साथ ही, लोगों का मानना है कि यह खूबसूरत त्योहार सभी के लिए धन, समृद्धि और सफलता लाता है। लोग दिवाली के त्योहार के दौरान अपने परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ उपहारों का आदान-प्रदान करने के लिए तत्पर रहते हैं।

दीपवाली से जुड़ी सामाजिक कुरीतियां

दिवाली जैसे धार्मिक महत्व वाले पर्व को भी कुछ असामाजिक तत्व अपने निरंतर प्रयास जैसे मदिरापान, जुआ खेलना, टोना-टोटका करना और पटाखों के गलत इस्तेमाल से ख़राब करने में जुटे रहते हैं। अगर समाज में दिवाली के दिन इन कुरीतियों को दूर रखा जाए तो दिवाली का पर्व वास्तव में शुभ दीपावली हो जाएगा।

उपसंहार

दीपावली अपने अंदर के अंधकार को मिटा कर समूचे वातावरण को प्रकाशमय बनाने का त्योहार है। बच्चे अपनी इच्छानुसार बम, फुलझड़ियाँ तथा अन्य पटाखे खरीदते हैं और आतिशबाजी का आनंद उठाते हैं। हमें इस बात को समझना होगा कि दीपावली के त्योहार का अर्थ दीप, प्रेम और सुख-समृद्धि से है। इसलिए पटाखों का इस्तेमाल सावधानी पूर्वक और अपने बड़ों के सामने रहकर करना चाहिए। दिवाली का त्योहार हमें हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। दीपावली का त्योहार सांस्कृतिक और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है। इस त्योहार के कारण लोगों में आज भी सामाजिक एकता बनी हुई है। हिंदी साहित्यकार गोपालदास नीरज ने भी कहा है, “जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।” इसलिए दीपोत्सव यानि दीपावली पर प्रेम और सौहार्द को बढ़ावा देने के प्रयत्न करने चाहिए।

निबंध लेखन कैसे लिखते हैं?

  • भाषा सरल और स्पष्ट होनी चाहिए।
  • शब्द सीमा का ध्यान रखना चाहिए।
  • विचारों की पुनरावृत्ति से बचना चाहिए।
  • लिखने के बाद उसे पढ़िए,उसमें आवश्यक सुधार कीजिए।
  • भाषा संबंधी त्रुटियाँ दूर कीजिए।
  • वर्तनी शुद्ध होनी चाहिए।
  • विराम-चिह्नों का उचित प्रयोग किया जाना चाहिए।

निबंध में कितने भाग होते हैं?

निबंध कैसे लिखते हैं? यह भी एक कला है, और निबंध के मुख्यतः तीन भाग होते हैं: प्रस्तावना, विषय प्रतिपादन और उपसंहार।

निबंध की रूपरेखा कैसे लिखते हैं?

रूपरेखा संक्षिप्त और सरल हो। यह आवश्यक नहीं है कि यह पूर्णतः सुसंस्कृत लेखन हो; इसे बस मुद्दा समझाने योग्य होना है। जब आप अपने विषय पर अधिक शोध करते हैं और अपने लेखन को मुद्दे पर केन्द्रित कर संकुचित करते जाते हैं तब अप्रासंगिक सूचनाओं को हटाने में संकोच न करें। रूपरेखाओं को याद दिलाने के साधन के रूप में प्रयोग करें।

निबंध लिखने की शुरुआत कैसे करें?

  • निबंध लेखन के पूर्व विषय पर विचार कर सकते हैं-
  • भाषा सरल और स्पष्ट होनी चाहिए।
  • विचारों को क्रमबद्ध रूप से स्पष्ट करना चाहिए।
  • विचारों की पुनरावृत्ति से बचना चाहिए।
  • लिखने के बाद उसे पढ़िए, उसमें आवश्यक सुधार कीजिए।
  • भाषा संबंधी त्रुटियां दूर कीजिए।

काल -Class 6-Hindi Grammar

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काल 

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काल

काल का अर्थ हम “समय “से लेते है। अर्थात क्रिया के जिस रूप से हमें काम के होने के समय का बोध हो उसे काल कहते है। सरल शब्दो मे ज़ब हम या कोई भी व्यक्ति कोई भी कार्य करता है , उस कार्य से हमें उस समय का पता चलता है जिस समय मे वह काम हो रहा है या किया जा रहा है। तो उसे हम काल कहेगे । काल से हमें कार्य के समय का ज्ञान होता है। और कार्य के सही समय का पता चलता है कि काम अभी हो रहा है या पहले हुआ था या आने वाले समय मे होगा।

उदहारण-

  1. राधा ना गाना गया था।

इससे हमें पता चल रहा है कि गाना गया जा चूका है। काम खत्म हो चूका है। ज़ब कार्य पूर्ण होता है तो था, थे, थी का प्रयोग होता है ।

  1. मीरा कपड़े धो रही थी।

यहां मीरा कपड़े धो रही थी ।मतलब काम कर रही थी काम क़ो बीते समय मे यह बताने कि कोशिश की जा रही है।

रहा था, रही थी शब्दो से कार्य हो रहा था का पता चलता है ।

  1. मैं खाना बनाता हूँ।

यहां खाना बनाना वर्तमान समय मे होना बताया जा रहा है । खाना अभी बन रहा है।

  1. श्याम पत्र लिखता होगा।

श्याम पत्र लिखता होगा यहां वर्तमान मे काम कर रहा है ।

  1. हम घूमने जायेगे।

इस वाक्य से स्पष्ट होता है कि हम घूमने जायेगे, अभी गए नहीं है।

भविष्य मे होने वाले समय का पता चल रहा है।

हम उम्मीद करतें है कि आप काल के बारे में समझें होंगे

काल की  परिभाषा – 

क्रिया के उस रूपांतर को ’काल’ कहते हैं, जिससे कार्य-व्यापार का समय और उसकी पूर्ण अथवा अपूर्ण अवस्था का बोध हो।

काल के भेद

काल के तीन भेद हैं –

  1. वर्तमानकाल
  2. भूतकाल
  3. भविष्यतकाल

वर्तमानकाल: क्रियाओं के व्यापार की निरंतरता को ’वर्तमानकाल’ कहते हैं। इसमें क्रिया का आरंभ हो चुका होता है।

जैसे-

  • वह खाता है।
  • यहाँ ’खाने’ का कार्य-व्यापार चल रहा है, समाप्त नहीं हुआ है।
  • वह पढ़ रहा है।
  • पक्षी आकाश में उङते है।
  • वह अभी गया है।
  • उसने खाना खा लिया है।

वर्तमान काल के पाँच भेद हैं –

  1. सामान्य वर्तमान
  2. तात्कालिक वर्तमान
  3. पूर्ण वर्तमान
  4. संदिग्ध वर्तमान
  5. संभाव्य वर्तमान।
  6. सामान्य वर्तमान –

क्रिया का वह रूप जिससे क्रिया का वर्तमानकाल में होना पाया जाए, ’सामान्य वर्तमान’ कहलाता है।

जैसे –

  • वह आता है ।
  • वह देखता है।
  • पक्षी आकाश में उङते है।
  • वह अभी गया है।
  • उसने खाना खा लिया है।
  1. तात्कालिक वर्तमान – इससे यह पता चलता है कि क्रिया वर्तमानकाल में हो रही है।

जैसे –

  • मैं पढ़ रहा हूँ ।
  • वह जा रहा है।
  • हम घूमने जा रहे हैं।
  • विद्या कपङे धो रही है।
  • टंकी से पानी बह रहा है।
  • बच्चे खिलौनों से खेल रहे हैं।
  • बाघ हरिण का पीछा कर रहा है।
  • कुछ लोग पंडाल में आ रहे है, कुछ बाहर जा रहे है।
  1. पूर्ण वर्तमान – इससे वर्तमानकाल में कार्य की पूर्ण सिद्धि का बोध होता है।

जैसे –

  • वह आया है ।
  • लङके ने पुस्तक पढ़ी है।
  • वह चला गया है।
  • उसने भोजन कर लिया है।
  • मैं तो सुबह ही नहा चुका हूँ।
  • घङा पानी से भर गया है।
  1. संदिग्ध वर्तमान – जिससे क्रिया के होने में संदेह प्रकट हो, पर उसकी वर्तमानता में संदेह न हो।

जैसे –

  • राम खाता होगा ।
  • वह पढ़ता होगा।
  • वह सो रहा होगा।
  • उल्लास खेलता होगा।
  • छात्र कहानियाँ सुन रहे होंगे।
  • पहरेदार जाग रहा होगा।
  1. संभाव्य वर्तमान – इससे वर्तमानकाल में काम के पूरा होने की संभावना रहती है।

जैसे –

  • वह आया हो।
  • वह लौटा हो।
  • सुधाकर आता है तो काम हो जाना चाहिए।
  • वह स्वस्थ होता लगता है।
  • वह पढ़े तो पढ़ने देना।
  • अब तो देश आगे बढ़ना ही चाहिए।

भूतकाल 

परिभाषा – जिस क्रिया से कार्य की समाप्ति का बोध हो, उसे भूतकाल की क्रिया कहते हैं।

जैसे –

  • लङका आया था ।
  • वह खा चुका था ।
  • मैंने गाया।
  • दो दिन पहले जोर की वर्षा हुई थी।
  • नेता जी का प्रचार-रथ बङी भीङ के साथ जा रहा था।

भूतकाल के छ: भेद है –

  1. सामान्य भूत
  2. आसन्न भूत
  3. पूर्ण भूत
  4. अपूर्ण भूत
  5. संदिग्ध भूत
  6. हेतुहेतुमद्भुत।
  7. सामान्य भूत –

जिससे भूतकाल की क्रिया के विशेष समय का ज्ञान न हो।

जैसे –

  • मोहन आया ।
  • सीता गई।
  • मोहन आया, सीता गई।
  • विनय घर गया।
  • मैंने खाना खाया।
  • वे कल यहाँ आए थे।
  • उसने पिछले वर्ष परीक्षा दी।
  1. आसन्न भूत –

इससे क्रिया की समाप्ति निकट भूत में या तत्काल ही सूचित होती है।

जैसे-

  • मैंने आम खाया है।
  • मैं चला हूँ।
  • वे अभी आए हैं।
  • बच्चा सो गया है।
  • प्रभा बस अभी गयी है।
  • वृक्ष गिर गया है।
  • वह पिछले सप्ताह गाँव आया है।
  • विद्यालय घण्टे भर पहले बन्द हुआ है।
  • वे घर आ गए है।
  • अनुराधा अभी घर गई है।
  • बहुत गर्मी हो गई है।
  • मैंने विचार किया है।
  1. पूर्ण भूत –

क्रिया के उस रूप को पूर्ण भूत कहते हैं, जिससे क्रिया की समाप्ति के समय का स्पष्ट बोध होता है कि क्रिया को समाप्त हुए काफी समय बीता है।

जैसे –

  • उसने मुरारी को मारा था ।
  • वह आया था।
  • व्यास जी ने महाभाारत रचा था।
  • वर्षा न होने से खेती सूख गई थी।
  • पुलिस के आने से पहले ही लुटेरे भाग चुके थे।
  • अब पछताए होत का, चिङियाँ चुग गई खेत।
  • मैंने दो वर्ष पहले बी. ए. किया था।
  • शिवशंकर ने 2009 में यह बच्चा गोद लिया।
  • इस मकान में आप कब आए थे।
  • अपराधी तो दुर्घटना में मर चुका था।
  • ओलों से फसल नष्ट हो चुकी थी।
  • सभी सहेलियाँ घरों को जा चुकी थी।
  1. अपूर्ण भूत –

इससे यह ज्ञात होता है कि क्रिया भूतकाल में हो रहा थी, किंतु उसकी समाप्ति का पता नहीं चलता।

जैसे-

  • सुरेश गीत गा रहा था ।
  • गीता सो रही थी।
  • वह सोता था।
  • चुनावी रंग निरन्तर बढ़ रहा था।
  • रोम जलता था नीरो बंशी बजाता था।
  • वे अँधेरे में ही आगे बढ़ रहे थे।
  • अँग्रेज झाँसी को हङपने का षड्यंत्र रच रहे थे।
  • सीमा पर हमारे जवान दिन-रात पहरा देते थे।
  • हम बचपन में इस पार्क में खेला करते थे।
  • बहुत पहले पृथ्वी पर डायनासोर रहा करते थे।
  • वह प्रायः शुक्रवार को आता था।
  • चिङियाँ इन्हीं झाङियों में चहकती थी।
  • वह हर महीने उधार चुकाती थी।
  • झरना मंदगति से बह रहा था।
  • शत्रु घात लगाकर आगे बढ़ रहा था।
  • बेचारी गाय सङक पर दम तोङ रही थी।
  • डाकू धीरे-धीरे आगे बढ़ते आ रहे थे।
  • पुजारी रोज शाम को आरती किया करता था।
  • याद है, हम दोनों नदी किनारे घण्टों घूमा करते थे।
  1. संदिग्ध भूत –

इसमें यह संदेश बना रहता है कि भूतकाल में कार्य पूरा हुआ था या नहीं।

जैसे-

  • तुमने गाया होगा ।
  • तू गाया होगा।
  • वह चला गया होगा।
  • किसान काम बंद करके घर जा चुके होंगे।
  • लगता है वह ठीक समय पर पहुँच गया होगा।
  • अवश्य ही मरने से पहले, उसने मुझे याद किया होगा।
  • शायद सभी छात्र, तब तक जा चुके होंगे।
  1. हेतुहेतुमद्भूत –

इससे यह पता चलता है कि क्रिया भूतकाल में होनेवाली थी, पर किसी कारण(reason) न हो सकी।

जैसे –

  • मैं आता ।
  • तू जाता ।
  • वह खाता।
  • मैं घर पर होता, तो वह अवश्य रुकती।
  • दिव्या प्रथम आई होती, तो उसे पुरस्कार मिलता।
  • बाढ़ आ गई होती, तो सारा गाँव डूब जाता।
  • यदि समय पर चिकित्सा मिल जाती है, तो अनेक घायलों की जानें बच जातीं।
  • आतंकवादी सफल हो गए होते, तो सैकङों निर्दोष लोगों मारे जाते।
  • सही निर्णय लिया गया होता, तो कश्मीर की समस्या उसी समय सुलझ गई होती।

भविष्यत काल 

भविष्य में होने वाली क्रिया को भविष्यत काल की क्रिया कहते हैं।

जैसे –

वह कल घर जाएगा।

भविष्यत काल के तीन भेद है –

  1. सामान्य भविष्य
  2. संभाव्य भविष्य
  3. हेतुहेतुमद् भविष्य।
  4. सामान्य भविष्य –

इससे यह प्रकट होता है कि क्रिया सामान्यतः भविष्य में होगी।

जैसे-

  • मैं पढूँगा ।
  • वह जाएगा।
  • वह आएगा।
  • हम पढे़ंगे।
  • दालें और सस्ती होंगी।
  • उसका विवाह होगा।
  • भवेश पढ़ेगा।
  • बच्चे खेलेंगे।
  • मनीषा पढ़ेगी।
  • लङकियाँ नाचेंगी।
  • मैं लिखूँगा।
  • मैं लिखूँगी।
  1. संभाव्य भविष्य –

जिससे भविष्य में किसी कार्य के होने की संभावना हो ।

जैसे –

  • संभव है ।
  • रमेश कल आया।
  • लगता है वे आएँगे।
  • सम्भव है पीयूष वहाँ मिले।
  • हो सकता है भारत फिर विश्व गुरु हो जाए।
  • सम्भावना है कि फसल अच्छी होगी।
  • सम्भव है, वर्षा आए।
  • लगता है, मजदूर न मिले।
  • हो सकता है, हम तुम्हें स्टेशन पर मिलें।
  • लगता है, सभी कार्यकर्ता चैराहे पर एकत्र हों।
  • सम्भावना है, मैं उससे मिलने जाऊँ।
  • लगता है कि तुम सच बोलो।
  1. हेतुहेतुमद् भविष्य –

इसमें एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया के होने पर निर्भर करता है।

जैसे –

  • वह आए तो मैं जाऊँ ।
  • वह कमाए तो खाए।

कारक-Class 6-Hindi Grammar

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कारक

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कारक

अगर हम आसानी से इसे समझें तो ऐसे कि क्रिया से सम्बन्ध रखने वाले वे सभी शब्द जो संज्ञा या सर्वनाम के रूप में होते हैं, उन्हें कारक कहते हैं।

अर्थात कारक संज्ञा या सर्वनाम शब्दों का वह रूप होता है जिसका सीधा सम्बन्ध क्रिया से ही होता है।

किसी कार्य को करने वाला कारक यानि जो भी क्रिया को करने में मुख्य भूमिका निभाता है, वह कारक कहलाता है।

परिभाषा –

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उसका सम्बन्ध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ जाना जाए, उसे कारक कहते हैं। वाक्य में प्रयुक्त शब्द आपस में सम्बद्ध होते हैं। क्रिया के साथ संज्ञा का सीधा सम्बन्ध ही कारक है। कारक को प्रकट करने के लिये संज्ञा और सर्वनाम के साथ जो चिन्ह लगाये जाते हैं, उन्हें विभक्तियाँ कहते हैं।

जैसे – पेङ पर फल लगते हैं। इस वाक्य में पेङ कारकीय पद हैं और ’पर’ कारक सूचक चिन्ह अथवा विभक्ति है।

कारक के भेद

कारकविभक्तियाँ
 1. कर्ता  ने
 2. कर्म  को
 3. करण  से, द्वारा
 4. सम्प्रदान  को, के लिये, हेतु
 5. अपादान  से (अलग होने के अर्थ में)
 6. सम्बन्ध   का, की, के, रा, री, रे
 7. अधिकरण  में, पर
 8. सम्बोधन  हे! अरे! ऐ! ओ! हाय!
  1. कर्ता कारक 
  2. कर्मकारक 
  3. करण कारक 
  4. सम्प्रदान कारक 
  5. अपादान कारक 
  6. सम्बन्ध कारक 
  7. अधिकरण कारक
  8. सम्बोधन कारक 

कर्ता कारक

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के करने वाले का बोध हो, उसे कर्ता कारक(Karta Karak) कहते हैं। इसका चिन्ह ’ने’ कभी कर्ता के साथ लगता है, और कभी वाक्य में नहीं होता है,अर्थात लुप्त होता है ।

उदाहरण –

  • रमेश ने पुस्तक पढ़ी।
  • सुनील खेलता है।
  • पक्षी उङता है।
  • मोहन ने पत्र पढ़ा।

इन वाक्यों में ’रमेश’, ’सुनील’ और ’पक्षी’ कर्ता कारक हैं, क्योंकि इनके द्वारा क्रिया के करने वाले का बोध होता है।

कर्मकारक

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप पर क्रिया का प्रभाव या फल पङे, उसे कर्म कारक कहते हैं। कर्म के साथ ’को’ विभक्ति आती है। इसकी यही सबसे बड़ी पहचान होती है। कभी-कभी वाक्यों में  ’को’ विभक्ति का लोप भी हो जाया करता है।

उदाहरण –

  • उसने सुनील को पढ़ाया।
  • मोहन ने चोर को पकङा।
  • लङकी ने लङके को देखा।
  • कविता पुस्तक पढ़ रही है।

’कहना’ और ’पूछना’ के साथ ’से’ प्रयोग होता हैं। इनके साथ ’को’ का प्रयोग नहीं होता है , जैसे –

  • कबीर ने रहीम से कहा।
  • मोहन ने कविता से पूछा।

यहाँ ’से’ के स्थान पर ’को’ का प्रयोग उचित नही है।

करण कारक

जिस साधन से अथवा जिसके द्वारा क्रिया पूरी की जाती है, उस संज्ञा को करण कारक कहते हैं।

इसकी मुख्य पहचान ’से’ अथवा ’द्वारा’ है

उदाहरण –

  • रहीम गेंद से खेलता है।
  • आदमी चोर को लाठी द्वारा मारता है।

यहाँ ’गेंद से’ और ’लाठी द्वारा’ करण कारक है।

सम्प्रदान कारक

जिसके लिए क्रिया की जाती है, उसे सम्प्रदान कारक कहते हैं। इसमें कर्म कारक ’को’ भी प्रयुक्त होता है, किन्तु उसका अर्थ ’के लिये’ होता है।

उदाहरण –

  • सुनील रवि के लिए गेंद लाता है।
  • हम पढ़ने के लिए स्कूल जाते हैं।
  • माँ बच्चे को खिलौना देती है।

उपरोक्त वाक्यों में ’मोहन के लिये’ ’पढ़ने के लिए’ और बच्चे को सम्प्रदान  है।

अपादान कारक

अपादान का अर्थ है- अलग होना। जिस संज्ञा अथवा सर्वनाम से किसी वस्तु का अलग होना ज्ञात हो, उसे अपादान कारक कहते हैं।

करण कारक की भाँति अपादान कारक का चिन्ह भी ’से’ है, परन्तु करण कारक में इसका अर्थ सहायता होता है और अपादान में अलग होना होता है।

उदाहरण –

  • हिमालय से गंगा निकलती है।
  • वृक्ष से पत्ता गिरता है।
  • राहुल छत से गिरता है।

इन वाक्यों में ’हिमालय से’, ’वृक्ष से’, ’छत से ’ अपादान कारक है।

सम्बन्ध कारक 

संज्ञा अथवा सर्वनाम के जिस रूप से एक वस्तु का सम्बन्ध दूसरी वस्तु से जाना जाये, उसे सम्बन्ध कारक कहते हैं।

इसकी मुख्य पहचान है – ’का’, ’की’, के

उदाहरण –

  • राहुल की किताब मेज पर है।
  • सुनीता का घर दूर है।

सम्बन्ध कारक क्रिया से भिन्न शब्द के साथ ही सम्बन्ध सूचित करता है।

अधिकरण कारक 

संज्ञा के जिस रूप से क्रिया के आधार का बोध होता है, उसे अधिकरण कारक कहते हैं। इसकी मुख्य पहचान है ’में’, ’पर’ होती है ।

उदाहरण –

  • घर पर माँ है।
  • घोंसले में चिङिया है।
  • सङक पर गाङी खङी है।

यहाँ ’घर पर’, ’घोंसले में’, और ’सङक पर’, अधिकरण  है।

सम्बोधन कारक 

संज्ञा या जिस रूप से किसी को पुकारने तथा सावधान करने का बोध हो, उसे सम्बोधन कारक कहते हैं।

इसका सम्बन्ध न क्रिया से और न किसी दूसरे शब्द से होता है। यह वाक्य से अलग रहता है। इसका कोई कारक चिन्ह भी नहीं है।

उदाहरण –

  • खबरदार !
  • रीना को मत मारो।
  • रमा ! देखो कैसा सुन्दर दृश्य है।
  • लङके ! जरा इधर आ।

उपसर्ग-Class 6-Hindi Grammar

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उपसर्ग

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उपसर्ग

यह दो शब्दों (उप+सर्ग) के योग से बनता है। ’उप’ का अर्थ ’समीप’, ’निकट’ या ’पास में’ है। ’सर्ग’ का अर्थ है सृष्टि करना।

’उपसर्ग’ का अर्थ है पास में बैठकर दूसरा नया अर्थ वाला शब्द बनाना। ’हार’ के पहले ’प्र’ उपसर्ग लगा दिया गया, तो एक नया शब्द ’प्रहार’ बन गया, जिसका नया अर्थ हुआ ’मारना’।

आसान अर्थ : उपसर्ग उप +सर्ग के योग से बना है यह एक संयोग का पद है। उप का मतलब है सहायक या समीप का और सर्ग का मतलब है:- भाग या अंग

अतः उपसर्ग का मतलब हुआ “सहायक या समीप का अंग या भाग”

उपसर्ग शब्दांश होते है अर्थात यह शब्दो का अंग होते है। वह शब्दांश जो शब्दो के आगे जुड़ कर उसके अर्थ मे परिवर्तन कर देते है या अर्थ मे विशेषता ला देते है अथवा अन्य शब्द बना देते है वह उपसर्ग कहलाते है।

उपसर्गों का स्वतंत्र अस्तित्व न होते हुए भी वे अन्य शब्दों के साथ मिलकर उनके एक विशेष अर्थ का बोध कराते हैं। उपसर्ग शब्द के पहले आते हैं।

जैसे – ’अन’ उपसर्ग ’बन’ शब्द के पहले रख देने से एक शब्द ’अनबन’ बनता है, जिसका विशेष अर्थ ’मनमुटाव’ है। कुछ उपसर्गों के योग से शब्दों के मूल अर्थ में परिवर्तन नहीं होता, बल्कि तेजी आती है।

जैसे – ’भ्रमण’ शब्द के पहले ’परि’ उपसर्ग लगाने से अर्थ में अंतर न होकर तेजी आई। कभी-कभी उपसर्गों के प्रयोग से शब्द का बिल्कुल उलटा अर्थ निकलता है।

उपसर्ग किसी शब्द के आरम्भ मे जुड़ कर अर्थवान हो जाते है जैसे अ उपसर्ग नहीं का अर्थ देता है

जैसे : 

  • अ+ भाव = अभाव
  • अ+थाह   = अथाह

इसी प्रकार नि उपसर्ग

नि + डर = निडर

जैसे :-

  • अ + सुंदर = असुंदर (यहां अर्थ बदल गया है )
  • अति +सुंदर =अतिसुन्दर (यहां शब्द मे विशेषता आई है )

इसी तरह हम अन्य उदाहरण देखेंगे

  • आ+हार  = आहार (नया शब्द बना है )
  • प्रति+हार  = प्रतिहार (नया शब्द बना है
  • प्र+हार  = प्रहार (नया शब्द बना है )
  • अति+अल्प  = अत्यल्प
  • अधि + अक्ष = अध्यक्ष

उपसर्गों के प्रयोग से शब्दों की तीन स्थितियाँ होती हैं –

  • शब्द के अर्थ में एक नई विशेषता आती है,
  • शब्द के अर्थ में प्रतिकूलता उत्पन्न होती है,
  • शब्द के अर्थ में कोई विशेष अंतर नहीं आता।

यहाँ ’उपसर्ग’ और ’शब्द’ का अंतर समझ लेना चाहिए। शब्द अक्षरों का एक समूह है, जो अपने में स्वतंत्र है, अपना अर्थ रखता है और वाक्यों में स्वतंत्रतापूर्वक प्रयुक्त होता है।

लेकिन, उपसर्ग अक्षरों का समूह होते हुए भी स्वतंत्र नहीं है और न स्वतंत्ररूप से उसका प्रयोग ही होता है। जब तक किसी शब्द के साथ उपसर्ग की संगति नहीं बैठती, तब तक उपसर्ग अर्थवान् नहीं होता।

संस्कृत में शब्दों के पहले लगने वाले कुछ निश्चित शब्दांशों को ही उपसर्ग कहते हैं और शेष को अव्यय। हिंदी में इस तरह का कोई अंतर नहीं है। हिंदी भाषा में ’उपसर्ग’ की योजना व्यापक अर्थ में हुई है।

उपसर्गों की संख्या

हिंदी में जो उपसर्ग मिलते हैं, वे संस्कृत, हिंदी और उर्दू भाषा के हैं। इन भाषाओं से प्राप्त उपसर्गों की संख्या इस तरह निश्चित की गई है:

  • संस्कृत उपसर्ग – 19
  • हिंदी उपसर्ग – 10
  • उर्दू उपसर्ग – 12

इनमें से प्रत्येक इस प्रकार है –

संस्कृत-हिंदी उपसर्ग

उपसर्गअर्थशब्दरूप
अतिअधिक, ऊपर, उस पारअतिकाल, अतिरिक्त, अतिशय, अत्यंत, अत्याचार, अत्युक्ति, अतिव्याप्ति,
अतिक्रमण इत्यादि।
अधिश्रेष्ठ, ऊपर, सामीप्यअधिकरण, अधिकार, अधिराज, अध्यात्म, अध्यक्ष, अधिपति इत्यादि।
अनुक्रम, पश्चात्, समानताअनुशासन, अनुकरण, अनुवाद, अनुचर, अनुज, अनुक्रम, अनुपात, अनुरूप, अनुस्वार, अनुकूल, अनुशीलन इत्यादि।
अपलघुता, हीनता, अभाव, विरुद्धअपमान, अपशब्द, अपहरण, अपराध, अपकार, अपभ्रंश , अपकीर्ति , अपयश, अपप्रयोग, अपव्यय, अपवाद, अपकर्ष
अभिसामीप्य, आधिक्य, ओर, इच्छा प्रकट करनाअभिभावक, अभियान, अभिशाप, अभिप्राय, अभियोग, अभिसार, अभिमान, अभिनव, अभ्युदय, अभ्यागत, अभिमुख, अभ्यास, अभिलाषा इत्यादि।
अवहीनता, अनादर, पतनअवगत, अवलोकन, अवनत, अवस्था, अवसान, अवज्ञा, अवरोहण, अवतार, अवनति, अवशेष इत्यादि।
सीमा, और, समेत, कमी, विपरीतआरक्त, आगमन, आकाश, आकर्षण, आजन्म, आरंभ, आक्रमण, आदान, आचरण, आजीवन, आरोहण, आमुख, आमरण, आक्रोश इत्यादि।
उत्+उद्ऊपर, उत्कर्षउत्तम, उत्कण्ठा, उत्कर्ष, उत्पन्न, उन्नति, उद्देश्य, उद्गम, उत्थान, उद्भव, उत्साह, उद्गार, उद्यम, उद्धत इत्यादि।
उपनिकटता, सदृश, गौण, सहायक, हीनताउपकार, उपकूल, उपनिवेश, उपदेश, उपस्थिति, उपमंत्री, उपवन, उपनाम, उपासना, उपभेद इत्यादि।
दुर-दुस्बुरा, कठिन, दुष्ट, हीनदुरवस्था, दुर्दशा, दुर्लभ, दुर्जन, दुर्लंध्य, दुर्दमनीय, दुराचार, दुस्साहस,
दुष्कर्म, दुःसाध्य, दुष्प्राप्य, दुःसह, दुर्गुण, दुर्गम इत्यादि।
निभीतर, नीचे, अतिरिक्तनिदर्शन, निकृष्ट, निपात, नियुक्त, निवास, निरूपण, निमग्न, निवारण,  निम्न, निषेध, निरोध, निदान, निबंध इत्यादि।
निर्-निस्बाहर, निषेध, रहितनिर्वास , निराकरण, निर्भय, निरपराध, निर्वाह, निर्दोष, निर्जीव, नीरोग, निर्मल इत्यादि।
पराउलटा, अनादर, नाशपराजय, पराक्रम, पराभव, परामर्श, पराभूत इत्यादि।
परिआसपास, चारों ओर, पूर्ण, अतिशय, त्यागपरिक्रमा, परिजन, परिणाम, परिधि, परिपूर्ण, परिवर्तन, परिणय, पर्याप्त, परिशीलन, परिदोष, परिदर्शन, परिचय इत्यादि।
प्रअधिक, आगे, ऊपर, यशप्रकाश, प्रख्यात, प्रचार, प्रबल, प्रभु, प्रयोग, प्रगति, प्रसार, प्रस्थान, प्रलय, प्रमाण, प्रसन्न, प्रसिद्धि प्रताप, प्रपंच इत्यादि।
प्रतिविरोध, बराबरी, प्रत्येक, परिवर्तनप्रतिक्षण, प्रतिध्वनि, प्रतिनिधि, प्रतिकार, प्रत्येक, प्रतिदान, प्रतिकूल, प्रतिवादी, प्रत्यक्ष, प्रत्युपकार इत्यादि।
विभिन्नता, हीनता, असमानता, विशेषताविकास, विज्ञान, विदेश, विधवा, विवाद, विशेष, विस्मरण, विराम, विभाग,
विकार, विमुख, विनय, विभिन्न, विनाश, इत्यादि।
सम्पूर्णता, संयोगसंकल्प, संग्रह, संतोष, संन्यास, संयोग, संस्कार, संरक्षण, संहार, सम्मेलन, संस्कृत, सम्मुख, संग्राम, संसर्ग इत्यादि।
सुसुखी, अच्छा भाव, सहज, सुंदरसुकर्म, सुकृत, सुगम, सुलभ, सुदूर, स्वागत, सुयश, सुभाषित, सुवास,
सुकिव, सुजन इत्यादि।
अ-अननिषेध के अर्थ मेंअमोल, अपढ़, अजान, अगाध, अथाह, अलग, अनमोल, अनजान इत्यादि
अधआधे के अर्थ मेंअधजला, अधपका, अधखिला, अधमरा, अधपई, अधसेरा इत्यादि
उनएक कमउन्नीस, उनतीस, उनचास, उनसठ, उनहत्तर इत्यादि।
औ (अव)हीनता, निषेधऔगुन, औघट, औसर, औढर इत्यादि
दुबुरा, हीनदुकाल, दुबला इत्यादि
निनिषेध, अभाव, विशेषनिकम्मा, निखरा, निडर, निहत्था, निधङक, निगोङा इत्यादि
विननिषेधबिनजाना, बिनब्याहा, बिनबोया, बिनदेखा, बिनखाया, बिनचखा, बिनकाम इत्यादि।
भरपूरा, ठीकभरपेट, भरसक, भरपूर, भरदिन इत्यादि
कु-कबुराई, हीनताकुखेत, कुपात्र, कुघङी, कुकाठ, कपूत, कुढंग इत्यादि।
सु-सश्रेष्ठता और साथ के अर्थ मेंसुडौल, सुघङ, सुजान, सुपात्र, सपूत, सजग, सगोत्र, सरस, सहित इत्यादि।

उर्दू-उपसर्ग (अरबी-फारसी)

उपसर्गअर्थशब्दरूप
अलनिश्चितअलबत्ता, अलगरज इत्यादि
कमहीन, थोङाकमउम्र, कमखयाल, कमसिन इत्यादि
खुशश्रेष्ठता के अर्थ मेंखुशबू, खुशदिल, खुशकिस्मत, खुशहाल, खुशखबरी इत्यादि।
गैरनिषेधगैरहाजिर, गैरवाजिब, गैरकानूनी,गैरसरकारी इत्यादि।
दरमेंदरकार, दरमियान इत्यादि।
नाअभावनापसंद, नामुमकिन, नाराज, नालायक, नादान इत्यादि।
बदबुराबदमाश, बदनाम, बदकार, बदकिस्मत, बदबू, बदहजमी इत्यादि।
बरऊपर, पर, बाहरबरखास्त, बरदाशत, बरवक्त इत्यादि
बिलसाथबिलकुल
बेबिनाबेईमान, बेवकूफ, बेरहम, बेतरह, बेइज्जत, इत्यादि।
लाबिनालाचार, लाजवाब, लावारिस, लापरवाह, लापता इत्यादि।
हमबराबर, समानहमउम्र, हमदर्दी, हमपेशा इत्यादि

अव्यय-Class 6-Hindi Grammar

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अव्यय

अव्यय

अव्यय ऐसे शब्द क्यों कहते हैं जिन शब्दों में लिंग, कारक, वचन आदि के कारण कोई भी परिवर्तन नहीं आता हो, उन्हें अव्यय अविकारी शब्द के नाम से जाना जाता है। यह शब्द हमेशा परिवर्तित होते हैं।

परिभाषा-

जो शब्द लिंग, वचन, कारक, पुरूष और काल के कारण नहीं बदलते, वे अव्यय कहलाते हैं|

ऐसे शब्द जिसमें लिंग, वचन, पुरुष, कारक आदि के कारण कोई विकार नहीं आता अव्यय  कहलाते हैं।

यह सदैव अपरिवर्तित, अविकारी एवं अव्यय रहते हैं। इनका मूल रूप स्थिर रहता है, वह कभी बदलता नहीं है

जैसे – इधर, किंतु, क्यों, जब, तक, इसलिए, आदि।

अव्यय के प्रकार –

  1. क्रिया विशेषण
  2. सम्बन्ध बोधक
  3. समुच्चय बोधक
  4. विस्मयादि बोधक
  5. क्रिया विशेषण –

वे शब्द जो क्रिया की विशेषता प्रकट करें, उन्हें क्रिया-विशेषण कहते हैं|

इसके चार भेद हैं

  1. कालवाचक :-

जिससे क्रिया के करने या होने के समय (काल) का ज्ञान हो, वह कालवाचक क्रिया विशेषण कहलाता है|

जैसे – परसों मंगलवार हैं, आपको अभी जाना चाहिए, आजकल, कभी, प्रतिदिन, रोज, सुबह, अक्सर, रात को, चार बजे, हर साल आदि।

  1. स्थान वाचक :– जिससे क्रिया के होने या करने के स्थान का बोध हो, वह स्थानवाचक क्रिया विशेषण कहलाता है।

जैसे– यहाँ, वहाँ, इधर, उधर, नीचे, ऊपर, बाहर, भीतर, आसपास आदि।

  1. परिमाणवाचक :– जिन शब्दों से क्रिया के परिमाण या मात्रा से सम्बन्धित विशेषता का पता चलता है। परिमाणवाचक क्रिया विशेषण कहलाते है।

जैसे –

  • वह दूध बहुत पीता है।
  • वह थोड़ा ही चल सकी।
  • उतना खाओ जितना पचा सको।
  1. रीतिवाचक :– जिससे क्रिया के होने या करने के ढ़ग का पता चले, वे रीतिवाचक क्रिया विशेषण कहलाते है।

जैसे –

  • शनैः शनैः जाता है।
  • सहसा बम फट गया।
  • निश्चिय पूर्वक करूँगा।
  1. सम्बन्ध बोधक –

जिस अव्यय शब्द से संज्ञा अथवा सर्वनाम का सम्बन्ध वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ प्रकट होता है, उसे सम्बन्ध बोधक अव्यय कहते है।

जैसे-

  • उसके सामने मत ठहरो।
  • पेड़ के नीचे बैठो

से पहले, के भीतर, की ओर, की तरफ, के बिना, के अलावा, के बगैर, के बदले, की जगह, के साथ, के संग, के विपरीत आदि।

  1. समुच्चय बोधक या योजक –

जो अव्यय दो शब्दों अथवा दो वाक्यों को जोड़ने का कार्य करते हैं उन्हें समुच्चय बोधक अव्यय कहते है।

जैसे– और, तथा, एवं, मगर, लेकिन, किन्तु, परन्तु, इसलिए, इस कारण, अतः, क्योंकि, ताकि, या, अथवा, चाहे आदि।

  1. विस्मयादि बोधक –

जिन अविकारी शब्दों से हर्ष, शोक, आश्चर्य घृणा, दुख, पीड़ा आदि का भाव प्रकट हो उन्हे विस्मयादि बोधक अव्यय कहते हैं|

जैसे – ओह!, हे!, वाह!, अरे!, अति सुंदर!, उफ!, हाय!, धिक्कार!, सावधान!, बहत अच्छा!, तौबा-तौबा!, अति सुन्दर आदि।

अलंकार-Class 6-Hindi Grammar

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अलंकार

अलंकार
काव्य की शोभा बढ़ाने वाले उपकरणों को अलंकार करते हैं। जैसे अलंकरण धारण करने से शरीर की शोभा बढ़ जाती है, वैसे ही अलंकरण के प्रयोग से काव्य में चमक उत्पन्न हो जाती है। संस्कृत आचार्य दंडी के अनुसार ‘अलंकार काव्य का शोभाकारक धर्म है’ और आचार्य वामन के अनुसार ‘अलंकार ही सौंदर्य है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, “कथन की रोचक, सुंदर और प्रभावपूर्ण प्रणाली अलंकार है। गुण और अलंकार में यह अंतर है की गुण सीधे रस का उत्कर्ष करते हैं, अलंकार सीधे रस का उत्कर्ष नहीं करते हैं।
अलंकार की परिभाषा –
अलंकार दो सब्दो से मिलकर बना है- ‘अलम’ और ‘कार’ | जहा ‘अलम’ का शाब्दिक अर्थ है, आभूषण और ‘कार’ का अर्थ है धारण करना |
जिस प्रकार स्त्रिया अपने शरीर की शोभा बढ़ाने के लिए आभूषण को पहनती है उसी प्रकार किसी भाषा या कविता को सुन्दर बनाने के लिए अलंकार का प्रयोग किया जाता है |
दूसरे सब्दो में कहे तो जो ” शब्द काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं उसे अलंकार कहते हैं।”
उदाहरण: “चारु चंद्र की चंचल किरणें ”
अलंकार के भेद –
शब्दालंकार
अर्थालंकार
उभयालंकार
शब्दालंकार
शब्दालंकार दो शब्दों से मिलकर बना होता है – शब्द + अलंकार। शब्द के दो रूप होते हैं – ध्वनी और अर्थ। ध्वनि के आधार पर शब्दालंकार की सृष्टी होती है। जब अलंकार किसी विशेष शब्द की स्थिति में ही रहे और उस शब्द की जगह पर कोई और पर्यायवाची शब्द के रख देने से उस शब्द का अस्तित्व न रहे उसे शब्दालंकार कहते हैं।
शब्दालंकार के भेद –
अनुप्रास अलंकार
यमक अलंकार
पुनरुक्ति अलंकार
विप्सा अलंकार
वक्रोक्ति अलंकार
शलेष अलंकार
अनुप्रास अलंकार –
अनुप्रास शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – अनु + प्रास | यहाँ पर अनु का अर्थ है- बार-बार और प्रास का अर्थ होता है, – वर्ण। जब किसी वर्ण की बार – बार आवर्ती हो तब जो चमत्कार होता है उसे अनुप्रास अलंकार कहते है।
अनुप्रास अलंकार के उदाहरण –
“मैया मोरी मैं नही माखन खायो”
[यहाँ पर ‘म’ वर्ण की आवृत्ति बार बार हो रही है।]
“चारु चंद्र की चंचल किरणें”
[यहाँ पर ‘च’ वर्ण की आवृत्ति बार बार हो रही है।]
“कन्हैया किसको कहेगा तू मैया”
[यहाँ पर ‘क’ वर्ण की आवृत्ति बार बार हो रही है।]
अनुप्रास के भेद –
छेकानुप्रास अलंकार
वृत्यानुप्रास अलंकार
लाटानुप्रास अलंकार
अन्त्यानुप्रास अलंकार
श्रुत्यानुप्रास अलंकार
छेकानुप्रास अलंकार :- जहाँ पर स्वरुप और क्रम से अनेक व्यंजनों की आवृति एक बार हो वहाँ छेकानुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण :-
रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै।
साँसैं भरि आँसू भरि कहत दई दई।।
वृत्यानुप्रास अलंकार:- जब एक व्यंजन की आवर्ती अनेक बार हो वहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार कहते हैं।
उदाहरण :-
“चामर-सी, चन्दन – सी, चंद – सी,
चाँदनी चमेली चारु चंद-सुघर है।”
लाटानुप्रास अलंकार :-
जहाँ शब्द और वाक्यों की आवर्ती हो तथा प्रत्येक जगह पर अर्थ भी वही पर अन्वय करने पर भिन्नता आ जाये वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है। अथार्त जब एक शब्द या वाक्य खंड की आवर्ती उसी अर्थ में हो वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण :–
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी के पात्र समर्थ,
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी थी जिनके अर्थ।
अन्त्यानुप्रास अलंकार :– जहाँ अंत में तुक मिलती हो वहाँ पर अन्त्यानुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण :-
“लगा दी किसने आकर आग।
कहाँ था तू संशय के नाग?”
श्रुत्यानुप्रास अलंकार:- जहाँ पर कानों को मधुर लगने वाले वर्णों की आवर्ती हो उसे श्रुत्यानुप्रास अलंकार कहते है।
उदाहरण:–
“दिनान्त था, थे दीननाथ डुबते,
सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे।”
यमक अलंकार –
यमक शब्द का अर्थ होता है – दो। जब एक ही शब्द ज्यादा बार प्रयोग हो पर हर बार अर्थ अलग-अलग आये वहाँ पर यमक अलंकार होता है।
यमक अलंकार के उदाहरण –
उदाहरण :-
कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाये बौराए नर, वा पाये बौराये।
पुनरुक्ति अलंकार
पुनरुक्ति अलंकार दो शब्दों से मिलकर बना है – पुन: +उक्ति। जब कोई शब्द दो बार दोहराया जाता है वहाँ पर पुनरुक्ति अलंकार होता है।
विप्सा अलंकार
जब आदर, हर्ष, शोक, विस्मयादिबोधक आदि भावों को प्रभावशाली रूप से व्यक्त करने के लिए शब्दों की पुनरावृत्ति को ही विप्सा अलंकार कहते है।
उदाहरण :–
मोहि-मोहि मोहन को मन भयो राधामय।
राधा मन मोहि-मोहि मोहन मयी-मयी।।
वक्रोक्ति अलंकार
जहाँ पर वक्ता के द्वारा बोले गए शब्दों का श्रोता अलग अर्थ निकाले उसे वक्रोक्ति अलंकार कहते है।
वक्रोक्ति अलंकार के भेद :-
काकु वक्रोक्ति अलंकार
श्लेष वक्रोक्ति अलंकार
काकु वक्रोक्ति अलंकार:– जब वक्ता के द्वारा बोले गये शब्दों का उसकी कंठ ध्वनी के कारण श्रोता कुछ और अर्थ निकाले वहाँ पर काकु वक्रोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण :- मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू।
श्लेष वक्रोक्ति अलंकार :- जहाँ पर श्लेष की वजह से वक्ता के द्वारा बोले गए शब्दों का अलग अर्थ निकाला जाये वहाँ श्लेष वक्रोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण :–
को तुम हौ इत आये कहाँ घनस्याम हौ तौ कितहूँ बरसो।
चितचोर कहावत है हम तौ तहां जाहुं जहाँ धन सरसों।।
श्लेष अलंकार –
जहाँ पर कोई एक शब्द एक ही बार आये पर उसके अर्थ अलग अलग निकलें वहाँ पर श्लेष अलंकार होता है।
श्लेष अलंकार के उदाहरण –
उदाहरण :–
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गए न उबरै मोती मानस चून।।
श्लेष अलंकार के भेद –
अभंग श्लेष अलंकार
सभंग श्लेष अलंकार
अभंग श्लेष अलंकार :- जिस अलंकार में शब्दों को बिना तोड़े ही एक से अधिक या अनेक अर्थ निकलते हों वहां पर अभंग श्लेष अलंकार होता है।
उदाहरण :-
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुस, चून।।
सभंग श्लेष अलंकार :– जिस अलंकार में शब्दों को तोडना बहुत अधिक आवश्यक होता है क्योंकि शब्दों को तोड़े बिना उनका अर्थ न निकलता हो वहां पर सभंग श्लेष अलंकार होता है।
उदाहरण :– सखर सुकोमल मंजु, दोषरहित दूषण सहित।
अर्थालंकार
जहाँ पर अर्थ के माध्यम से काव्य में चमत्कार होता हो वहाँ अर्थालंकार होता है।
अर्थालंकार के भेद –
उपमा अलंकार
रूपक अलंकार
उत्प्रेक्षा अलंकार
द्रष्टान्त अलंकार
संदेह अलंकार
अतिश्योक्ति अलंकार
उपमेयोपमा अलंकार
प्रतीप अलंकार
अनन्वय अलंकार
भ्रांतिमान अलंकार
दीपक अलंकार
अपहृति अलंकार
व्यतिरेक अलंकार
विभावना अलंकार
विशेषोक्ति अलंकार
अर्थान्तरन्यास अलंकार
उल्लेख अलंकार
विरोधाभाष अलंकार
असंगति अलंकार
मानवीकरण अलंकार
अन्योक्ति अलंकार
काव्यलिंग अलंकार
स्वभावोती अलंकार
उपमा अलंकार –
उपमा शब्द का अर्थ होता है – तुलना। जब किसी व्यक्ति या वस्तु की तुलना किसी दूसरे यक्ति या वस्तु से की जाए वहाँ पर उपमा अलंकार होता है।
उपमा अलंकार के उदाहरण –
उदाहरण :-
सागर-सा गंभीर ह्रदय हो,
गिरी-सा ऊँचा हो जिसका मन।
उपमा अलंकार के अंग –
उपमेय
उपमान
वाचक शब्द
साधारण धर्म
उपमेय :– उपमेय का अर्थ होता है – उपमा देने के योग्य। अगर जिस वस्तु की समानता किसी दूसरी वस्तु से की जाये वहाँ पर उपमेय होता है।
उपमान :– उपमेय की उपमा जिससे दी जाती है उसे उपमान कहते हैं। अथार्त उपमेय की जिस के साथ समानता बताई जाती है उसे उपमान कहते हैं।
वाचक शब्द :- जब उपमेय और उपमान में समानता दिखाई जाती है तब जिस शब्द का प्रयोग किया जाता है उसे वाचक शब्द कहते हैं।
साधारण धर्म:– दो वस्तुओं के बीच समानता दिखाने के लिए जब किसी ऐसे गुण या धर्म की मदद ली जाती है जो दोनों में वर्तमान स्थिति में हो उसी गुण या धर्म को साधारण धर्म कहते हैं।
रूपक अलंकार –
जहाँ पर उपमेय और उपमान में कोई अंतर न दिखाई दे वहाँ रूपक अलंकार होता है अथार्त जहाँ पर उपमेय और उपमान के बीच के भेद को समाप्त करके उसे एक कर दिया जाता है वहाँ पर रूपक अलंकार होता है।
रूपक अलंकार के उदाहरण –
उदाहरण :-
“उदित उदय गिरी मंच पर, रघुवर बाल पतंग।
विगसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन भ्रंग।।”
रूपक अलंकार की निम्न बातें :-
उपमेय को उपमान का रूप देना।
वाचक शब्द का लोप होना।
उपमेय का भी साथ में वर्णन होना।
उत्प्रेक्षा अलंकार –
जहाँ पर उपमान के न होने पर उपमेय को ही उपमान मान लिया जाए। अथार्त जहाँ पर अप्रस्तुत को प्रस्तुत मान लिया जाए वहाँ पर उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। अगर किसी पंक्ति में मनु, जनु, मेरे जानते, मनहु, मानो, निश्चय, ईव आदि आते हैं वहां पर उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
उत्प्रेक्षा अलंकार के उदाहरण –
उदाहरण :-
सखि सोहत गोपाल के, उर गुंजन की माल
बाहर सोहत मनु पिये, दावानल की ज्वाल।।
उत्प्रेक्षा अलंकार के भेद –
वस्तुप्रेक्षा अलंकार
हेतुप्रेक्षा अलंकार
फलोत्प्रेक्षा अलंकार
वस्तुप्रेक्षा अलंकार :– जहाँ पर प्रस्तुत में अप्रस्तुत की संभावना दिखाई जाए वहाँ पर वस्तुप्रेक्षा अलंकार होता है।
उदाहरण:-
“सखि सोहत गोपाल के, उर गुंजन की माल।
बाहर लसत मनो पिये, दावानल की ज्वाल।।”
हेतुप्रेक्षा अलंकार :- जहाँ अहेतु में हेतु की सम्भावना देखी जाती है। अथार्त वास्तविक कारण को छोडकर अन्य हेतु को मान लिया जाए वहाँ हेतुप्रेक्षा अलंकार होता है।
फलोत्प्रेक्षा अलंकार :- इसमें वास्तविक फल के न होने पर भी उसी को फल मान लिया जाता है वहाँ पर फलोत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
उदाहरण:-
खंजरीर नहीं लखि परत कुछ दिन साँची बात।
बाल द्रगन सम हीन को करन मनो तप जात।।
दृष्टान्त अलंकार
जहाँ दो सामान्य या दोनों विशेष वाक्यों में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव होता हो वहाँ पर दृष्टान्त अलंकार होता है। इस अलंकार में उपमेय रूप में कहीं गई बात से मिलती-जुलती बात उपमान रूप में दुसरे वाक्य में होती है। यह अलंकार उभयालंकार का भी एक अंग है।
उदाहरण :-
‘एक म्यान में दो तलवारें, कभी नहीं रह सकती हैं।
किसी और पर प्रेम नारियाँ, पति का क्या सह सकती है।।
संदेह अलंकार
जब उपमेय और उपमान में समता देखकर यह निश्चय नहीं हो पाता कि उपमान वास्तव में उपमेय है या नहीं। जब यह दुविधा बनती है , तब संदेह अलंकार होता है अथार्त जहाँ पर किसी व्यक्ति या वस्तु को देखकर संशय बना रहे वहाँ संदेह अलंकार होता है। यह अलंकार उभयालंकार का भी एक अंग है।
उदाहरण :-
यह काया है या शेष उसी की छाया,
क्षण भर उनकी कुछ नहीं समझ में आया।
संदेह अलंकार की मुख्य बातें :-
विषय का अनिश्चित ज्ञान।
यह अनिश्चित समानता पर निर्भर हो।
अनिश्चय का चमत्कारपूर्ण वर्णन हो।
अतिश्योक्ति अलंकार –
जब किसी व्यक्ति या वस्तु का वर्णन करने में लोक समाज की सीमा या मर्यादा टूट जाये उसे अतिश्योक्ति अलंकार कहते हैं अथार्त जब किसी वस्तु का बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाये वहां पर अतिश्योक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:-
हनुमान की पूंछ में लगन न पायी आगि।
सगरी लंका जल गई, गये निसाचर भागि।
उपमेयोपमा अलंकार
इस अलंकार में उपमेय और उपमान को परस्पर उपमान और उपमेय बनाने की कोशिश की जाती है इसमें उपमेय और उपमान की एक दूसरे से उपमा दी जाती है।
उदाहरण :- तौ मुख सोहत है ससि सो अरु सोहत है ससि तो मुख जैसो।
प्रतीप अलंकार
इसका अर्थ होता है उल्टा। उपमा के अंगों में उल्ट – फेर करने से अथार्त उपमेय को उपमान के समान न कहकर उलट कर उपमान को ही उपमेय कहा जाता है वहाँ प्रतीप अलंकार होता है। इस अलंकार में दो वाक्य होते हैं एक उपमेय वाक्य और एक उपमान वाक्य। लेकिन इन दोनों वाक्यों में सदृश्य का साफ कथन नहीं होता, वह व्यंजित रहता है। इन दोनों में साधारण धर्म एक ही होता है परन्तु उसे अलग-अलग ढंग से कहा जाता है।
उदाहरण :- “नेत्र के समान कमल है।”
अनन्वय अलंकार
जब उपमेय की समता में कोई उपमान नहीं आता और कहा जाता है कि उसके समान वही है, तब अनन्वय अलंकार होता है।
उदाहरण :- “यद्यपि अति आरत – मारत है. भारत के सम भारत है।
भ्रांतिमान अलंकार
जब उपमेय में उपमान के होने का भ्रम हो जाये वहाँ पर भ्रांतिमान अलंकार होता है अथार्त जहाँ उपमान और उपमेय दोनों को एक साथ देखने पर उपमान का निश्चयात्मक भ्रम हो जाये मतलब जहाँ एक वस्तु को देखने पर दूसरी वस्तु का भ्रम हो जाए वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है। यह अलंकार उभयालंकार का भी अंग माना जाता है।
उदाहरण :-
पायें महावर देन को नाईन बैठी आय ।
फिरि-फिरि जानि महावरी, एडी भीड़त जाये।।
दीपक अलंकार
जहाँ पर प्रस्तुत और अप्रस्तुत का एक ही धर्म स्थापित किया जाता है वहाँ पर दीपक अलंकार होता है।
उदाहरण:-
चंचल निशि उदवस रहें, करत प्रात वसिराज।
अरविंदन में इंदिरा, सुन्दरि नैनन लाज।।
अपहृति अलंकार
अपहृति का अर्थ होता है छिपाव। जब किसी सत्य बात या वस्तु को छिपाकर उसके स्थान पर किसी झूठी वस्तु की स्थापना की जाती है वहाँ अपहृति अलंकार होता है। यह अलंकार उभयालंकार का भी एक अंग है।
उदाहरण :-
“सुनहु नाथ रघुवीर कृपाला,
बन्धु न होय मोर यह काला।”
व्यतिरेक अलंकार
व्यतिरेक का शाब्दिक अर्थ होता है आधिक्य। व्यतिरेक में कारण का होना जरुरी है। अत: जहाँ उपमान की अपेक्षा अधिक गुण होने के कारण उपमेय का उत्कर्ष हो वहाँ पर व्यतिरेक अलंकार होता है।
उदाहरण :- का सरवरि तेहिं देउं मयंकू। चांद कलंकी वह निकलंकू।।
मुख की समानता चन्द्रमा से कैसे दूँ?
विभावना अलंकार
जहाँ पर कारण के न होते हुए भी कार्य का हुआ जाना पाया जाए वहाँ पर विभावना अलंकार होता है।
उदाहरण :-
बिनु पग चलै सुनै बिनु काना।
कर बिनु कर्म करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।
विशेषोक्ति अलंकार
काव्य में जहाँ कार्य सिद्धि के समस्त कारणों के विद्यमान रहते हुए भी कार्य न हो वहाँ पर विशेषोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण :-
नेह न नैनन को कछु, उपजी बड़ी बलाय।
नीर भरे नित-प्रति रहें, तऊ न प्यास बुझाई।।
अर्थान्तरन्यास अलंकार
जब किसी सामान्य कथन से विशेष कथन का अथवा विशेष कथन से सामान्य कथन का समर्थन किया जाये वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है।
उदाहरण :-
बड़े न हूजे गुनन बिनु, बिरद बडाई पाए।
कहत धतूरे सों कनक, गहनो गढ़ो न जाए।।
उल्लेख अलंकार
जहाँ पर किसी एक वस्तु को अनेक रूपों में ग्रहण किया जाए, तो उसके अलग-अलग भागों में बटने को उल्लेख अलंकार कहते हैं। अथार्त जब किसी एक वस्तु को अनेक प्रकार से बताया जाये वहाँ पर उल्लेख अलंकार होता है।
उदाहरण :- विन्दु में थीं तुम सिन्धु अनन्त एक सुर में समस्त संगीत।
विरोधाभाष अलंकार
जब किसी वस्तु का वर्णन करने पर विरोध न होते हुए भी विरोध का आभाष हो वहाँ पर विरोधाभास अलंकार होता है।
उदाहरण :-
‘आग हूँ जिससे ढुलकते बिंदु हिमजल के।
शून्य हूँ जिसमें बिछे हैं पांवड़े पलकें।’
असंगति अलंकार

जहाँ आपतात: विरोध दृष्टिगत होते हुए, कार्य और कारण का वैयाधिकरन्य रणित हो वहाँ पर असंगति अलंकार होता है।
उदाहरण :- “ह्रदय घाव मेरे पीर रघुवीरै।”
मानवीकरण अलंकार
जहाँ पर काव्य में जड़ में चेतन का आरोप होता है वहाँ पर मानवीकरण अलंकार होता है अथार्त जहाँ जड़ प्रकृति पर मानवीय भावनाओं और क्रियांओं का आरोप हो वहाँ पर मानवीकरण अलंकार होता है। जब प्रकृति के द्वारा निर्मित चीजों में मानवीय भावनाओं के होने का वर्णन किया जाए वहां पर मानवीकरण अलंकार होता है।
उदाहरण :- बीती विभावरी जागरी, अम्बर पनघट में डुबो रही तास घट उषा नगरी।
अन्योक्ति अलंकार
जहाँ पर किसी उक्ति के माध्यम से किसी अन्य को कोई बात कही जाए वहाँ पर अन्योक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण :- फूलों के आस-पास रहते हैं, फिर भी काँटे उदास रहते हैं।
काव्यलिंग अलंकार
जहाँ पर किसी युक्ति से समर्थित की गयी बात को काव्यलिंग अलंकार कहते हैं अथार्त जहाँ पर किसी बात के समर्थन में कोई-न-कोई युक्ति या कारण जरुर दिया जाता है।
उदाहरण :-
कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
उहि खाय बौरात नर, इहि पाए बौराए।।
स्वभावोक्ति अलंकार
किसी वस्तु के स्वाभाविक वर्णन को स्वभावोक्ति अलंकार कहते हैं।
उदाहरण :-
सीस मुकुट कटी काछनी, कर मुरली उर माल।
इहि बानिक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल।।
उभयालंकार
जो अलंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आधारित रहकर दोनों को चमत्कारी करते हैं वहाँ उभयालंकार होता है।
उदाहरण :- ‘कजरारी अंखियन में कजरारी न लखाय।’