अध्याय-3: ऊष्मा

ऊष्मा

ऊर्जा का एक रूप है जो ताप के कारण होता है।

किसी पदार्थ के गर्म या ठंडे होने के कारण उसमें जो ऊर्जा होती है उसे उसकी ऊष्मीय ऊर्जा कहते हैं। इसका मात्रक भी जूल (Joule) होता है पर इसे कैलोरी (Calorie) में भी व्यक्त करते हैं। जब कभी कार्य ऊष्मा में बदलता है या ऊष्मा, कार्य में तो किये गये कार्य व उत्पन्न ऊष्मा का अनुपात एक स्थिरांक होता है, जिसे ऊष्मा का यांत्रिक तुल्यांक (Mechanical Equivalent) कहते हैं।इसे ‘J’ से सूचित किया जाता है। ऊष्मा ऊर्जा का ही ए‍क रूप होती है। 

अर्थात् जब किसी निकाय तथा उसके चारो ओर के परिवेश के मध्‍य जब उनके तापमान मे अन्‍तर हेाता है तो ऊर्जा का आदान-प्रदान हेाने लगता है। यह आदान-प्रदान उष्‍मा के रूप में होता है।

उष्‍मा के प्रकार

विशिष्ट उष्‍मा

किसी पदार्थ की विशिष्‍ट उष्‍मा, उष्‍माधारिता की हि तरह पदार्थ का एक विशिष्‍ट गुण हेाती है। पदार्थ के एक ग्राम द्रव्‍यमान का तापमान

1° C बडाने के लिये आवश्‍यक होने वाली उष्‍मा की मात्रा केा हम उस पदार्थ की विशिष्‍ट उष्‍मा कहते है।

विशिष्‍ट उष्‍मा को S द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

विशिष्ट ऊष्मा का S.I. मात्रक = J/Kg/K होता है।

मोलर विशिष्ट ऊष्मा पदार्थ की प्रकृति तथा ताप पर निर्भर करती है। 

इसका मात्रक J/Kg/K 

गैस की विशिष्ट ऊष्मा नियत आयतन व नियत दाब पर भिन्न होती है। नियत दाब पर मौला विशिष्ट ऊष्मा में गैस को स्थिति दाब पर ऊष्मा प्रदान की जाती है। नियत ताप पर विशिष्ट ऊष्मा को Cp के द्वारा व्यक्त करते हैं। और यदि गैस को नियत आयतन पर ऊष्मा प्रदान की जाती है तब इसे नियत आयतन पर मोलर विशिष्ट ऊष्मा कहते हैं। जिसे Cv से व्यक्त करते है।

गुप्त ऊष्मा

किसी पदार्थ की अवस्था परिवर्तन के दौरान ऊष्मा की मात्रा का प्रति एकांक द्रव्यमान स्थानांतरण उस पदार्थ की गुप्त ऊष्मा कहलाती है। अवस्था परिवर्तन के दौरान पदार्थ के द्वारा ली गई ऊष्मा से पदार्थ के ताप में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जबकि यह ली गई ऊष्मा पदार्थ की अवस्था परिवर्तन के दौरान उपयोग में आती है। 

उदाहरण के लिए 15 डिग्री सेल्सियस पर उपस्थित बर्फ को गर्म किया जाए तो इसके गलनांक बिंदु जीरो डिग्री सेल्सियस तक ताप बढ़ता है। पर गलनांक बिंदु पर पहुंचने पर और ऊष्मा देने पर ठोस से द्रव अवस्था परिवर्तन तक ताप में कोई वृद्धि नहीं होती है। इस प्रकार की स्थितियों में ऊष्मा की गुप्त ऊष्मा कहलाती है।

गुप्त ऊष्मा का S.I. मात्रक – J/Kg होता है। 

गुप्त ऊष्मा का मान दाब पर निर्भर करता है।

उष्‍मा का संचरण

उष्‍मा का किसी एक वस्‍तु से दूसरी वस्तु में जाने को अथवा किसी वस्‍तु में उष्‍मा के मान मे परिवर्तन अर्थात् उष्‍मा का किसी वस्‍तु में एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर जाने को हम उष्‍मा का संचरण या उष्‍मा का स्‍थानांतरण कहते हैं। उष्‍मा के संचरण का मान माध्‍यम के प्रकार तथा उनके अणुओं के मध्‍य होने वाली गतिज ऊर्जा पर निर्भर करती हैं।

उष्‍मा का स्‍थानांतरण मुख्‍यत: तीन प्रकार से होता है।

  • चालन
  • संवहन
  • विकरण

चालन

उष्‍मा के संचरण की इस विधि में उष्‍मा का स्‍थानान्‍तरण माध्‍यम के अणुओं के परस्‍पर संपर्क के कारण होता है । इसमें उष्‍मा माध्‍यम के एक अणु से निकलकर दूसरें अणु केा मिल जाती हैं। इसमें माध्‍यम के अणु अपने स्‍थान पर से विस्‍थापित नहीं होते बल्कि वे अपने ही जगह पर स्थिर रहकर उष्‍मा का संचरण करते हैं।

उष्‍मा का संचरण चालन विधि के द्वारा केवल ठोंसो में होता है। क्योंकि ठोसों के अणु आपस में पास-पास स्थित होतें है। जिससे अणुओं के मध्‍य उष्‍मा का संचरण चालन विधि के द्वारा आसानी से होने लगता हैं।

सभी धातुओं में उष्‍मा का स्‍थानान्‍तण चालन विधि के द्वारा होता है। चुंकि धातुयें उष्‍मा की सुचालक हेाती है। धातुओं की सुचालकता उनमें उपस्थित मुक्‍त इलैक्‍र्टोनों के कारण होती है। धातुओं के अन्‍दर उपस्थित इलैर्क्‍टान किसी से बद्ध न होकर धातु के भीतर गति करने के लियें स्‍वतंत्र रहतें है। और धातुओं में उष्‍मा का संचरण चालन विधि से कराने में सहायक होतें है।

उदाहरण– जब हम किसी धातु की छड को एक सिरे से पकडकर दूसरे को उष्‍मा देतें है तो कुछ समय के बाद दूर वाला सिरा भी गर्म होने लगता है तथा धातु की छड अपनी पूरी लम्‍बाई में गर्म होने लगती है।

संवहन

उष्‍मा संचरण की इस विधि में उष्‍मा का संचरण कणों की स्‍वंय के स्‍थानान्‍तरण के फलस्‍वरूप होता है। जब हम किसी द्रव पदार्थ को उष्‍मा देते है तो उष्‍मा के कारण द्रव का तापमान परिवर्तन होने लगता है। तापमान में परिवर्तन होने से द्रवो का घनत्‍व में परिवर्तन होने लगता है। घनत्‍व में परिवर्तन होने पर द्रव के कम घनत्‍व वाले कण ऊपर उठने लगतें है तथा उनके स्‍थान पर अधिक घनत्‍व वाले कण आकर उनका स्‍थान ग्रहण कर लेते है यह प्रक्रिया तब तक निरंतर चलती रहती है

जब तक सम्‍पूर्ण द्रव का तापमान एक समान नहीं हो जाता है । इसमें कण अपना स्‍थान परिवर्तन करके उष्‍मा का संचरण करतें है। उष्‍मा संचरण की यह विधि संवहन कहलाती है।

संवहन विधि के द्वारा उष्‍मा का संचरण केवल द्रवों ओर गैसों में ही हो पाता है यह विधि ठोसों के लियें प्रभावी नहीं होती है।

उदाहरण:- वायूमंडल में बादलों का बनना संवहन क्रिया के द्वारा ही बनते है ।इसी प्रकार जब हम किसी बर्तन में पानी डालकर उसे गर्म करते है तो पानी के गर्म होने की क्रिया में सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण भूमिका संबहन की निभाता है। जिसके फलस्‍वरूप पानी गर्म होने लगता है।

द्रवों में उष्‍मा का संचरण चालन विधि से भी हो सकता है

विकरण

उष्‍मा संचरण की इस विधि में उष्‍मा का संचरण बहुत तीव्र गति से होता है । तथा उष्‍मा की इस विधि में माध्‍यम की आवश्‍यकता नहीं होती है। प्रत्‍येक बस्‍तु हर समय अपने स्‍वंय के तापमान के कारण सतत् रूप से उष्‍मा का उत्‍सर्जन करती रहती है। तथा इसके साथ-साथ अपने ऊपर आपतित होने वाली उष्‍मा को अव‍शोषित करती रहती है। इस प्र‍कार उत्‍सर्जित होने वाली उष्‍मा को विकरण उष्‍मा अथवा उष्‍मीय विकरण कहलाती है।

सूर्य से प्रथ्‍वी पर प्रकाश उष्‍मीय विकरण के रूप में ही पहुंचता है। उष्‍मीय विकरण विद्युत चुंबकीय तरंगो के रूप में प्रकाश की चाल से चलती है तथा उष्मीय विकरण के संचरण के लिये माध्‍यम की आवश्‍यकता नहीं होती है। जब उष्‍मीय विकरण ऊर्जा किसी पारदर्शी माध्‍मम में से गुजरता है तो माध्‍यम का तापमान अपरिवर्तित रहता है

जबकि यह विकरण किसी अपारदर्शी माध्‍यम में से गुजरने पर यह माध्‍यम के द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है तथा माध्‍मम का तापमान में व्रद्धि कर देता है । बस्‍तुऐं केवल उष्‍मा का उत्‍सर्जन ही नहीं करती बल्कि ये अपने पास उपस्थित अन्‍य वस्‍तुओ से उत्‍सर्जित उष्‍मा का अवशोषित भी करती है।

उदाहरण:- जब हम अपनी हाथो को आग के पास में रखते है तो हमें गर्मी का अहसास होता है जबकि हमारे हाथ आग से काफी दूर होते है ऐसा उष्‍मीय विकरण के द्वारा हमारे अपारदर्शी हाथों के संपर्क में आने के कारण होता है ओर हमें विकरण विधि के द्वारा उष्‍मा प्राप्‍त हेाती है।

ताप

किसी वस्तु की उष्णता (गर्मी) के माप को ताप कहते हैं। सामान्य भाषा में ताप किसी वस्तु की गर्माहट या ठण्डेपन की माप है। ऊष्मा का प्रवाह हमेशा उच्च ताप की वस्तु से निम्न ताप की वस्तु की ओर होता है।

ताप एक भौतिक राशी होती है और इसका सीधा सम्बन्ध कणों की गतिज ऊर्जा से होता है जैसे यदि दो पानी के गिलास है एक गिलास दुसरे की तुलना में अधिक गर्म है तो इसका अभिप्राय है कि गर्म गिलास के पानी के अणुओं में अधिक गतिज उर्जा है अर्थात यदि वस्तु अन्य वस्तु की तुलना में गर्म है तो इसका तात्पर्य है कि गर्म वस्तु में गतिज ऊर्जा का मान ठंडी की तुलना में अधिक है और इसी अधिक गतिज ऊर्जा के कारण है यह वस्तु गर्म महसूस हो रही है।

थर्मामीटर :- ताप मापने के लिए उपयोग की जाने वाली युक्ति को तापमापी (थर्मामीटर) कहते है।

डॉक्टरी थर्मामीटर :- जिस तापमापी से हम अपने शरीर के ताप को मापते हैं उसे डॉक्टरी थर्मामीटर कहते हैं।

सेल्सियस स्केल :- ताप मापने के स्केल जिसे C द्वारा दर्शाते हैं। डॉक्टरी थर्मामीटर से हम 35 C से 42 C तक के ताप ही माप सकते हैं।

आपके शरीर का ताप को सदैव इसके मात्रक C के साथ व्यक्त करना चाहिए। मानव शरीर का सामान्य ताप 37° कि होता है।

मानव शरीर का ताप सामान्यतः 35 C से कम तथा 42 C से अधिक नही होता। इसलिए थर्मामीटर का परिसर 35 C से 42 C है।

प्रयोगशाला तापमापी :- अन्य वस्तुओं के ताप मापने के लिए तापमापी प्रयोशाला तापमापी है। प्रयोशाला तापमापी का परिसर प्रायः 10 C से 110 सी होता है। मौसम की रिपोर्ट देने के लिए अधिकतम – न्यूनतम तापमापी का उपयोग किया जाता है।

ऊष्मा का स्थानांतरण :- जब किसी बर्तन को ज्वाला पर रखते हैं तो वह तप्त हो जाता है। ऊष्मा बर्तन से परिवेश की ओर स्थानांतरित हो जाती है। ऊष्मा सदैव गर्म वस्तु की अपेक्षाकृत ठंडी वस्तु की ओर प्रवाहित होती है।

चालन :- वह प्रक्रम जिसमें ऊष्मा किसी वस्तु के गर्म सिरे से ठंडे सिरे की ओर स्थानांतरित होती है, चालन कहलाता है।

सुचालक :- जो पदार्थ ऊष्मा को आसानी से जाने देते हैं उन्हें उष्मा का सुचालक कहते हैं।

उदाहरण :- ऐलुमिनियम, लोहा, ताँबा।

कुचालक :- जो पदार्थ अपने उष्मा को आसानी से नही जाने देते, उन्हें उष्मा का कुचालक कहते हैं। यही कारण है कि खाना बनाने के बर्तनों में लकड़ी या प्लास्टिक के हैंडल लगे होते हैं। तथा बिजली के तारों के ऊपर रबर या प्लास्टिक के कवर चढ़े होते हैं ताकि उस होकर बिजली का करंट या उष्मा प्रवाहित नहीं हो सके।

जैसे :- प्लास्टिक तथा लकड़ी।

उष्मा के स्थानांतरण की प्रक्रियाएँ
उष्मा का स्थानांतरण तीन प्रक्रियाओं द्वारा होता है। ये प्रक्रियाएँ हैं चालन, संवहन, तथा विकिरण।

चालन

ठोस पदार्थों में एक सिरे से दूसरे सिरे तक उष्मा का स्थानांतरण चालन प्रक्रिया के द्वारा होता है। दूसरे शब्दों में चालन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी ठोस में उष्मा का स्थानांतरण एक सिरे से दूसरे सिरे तक होता है।

किसी ठोस में उष्मा का स्थानांतरण एक सिरे से दूसरे सिरे तक अचानक से एकाएक नहीं हो जाता है। बल्कि उष्मा पहले उस सिरे को गर्म करती है जो उष्मा के श्रोत से सटा हुआ हो या जहाँ से उष्मा प्रवाहित हो रही है। उसके बाद उष्मा धीरे धीरे दूसरे छोर तक पहुँचती है।

ठोस का वह सिरा या भाग जो उष्मा के श्रोत के सबसे निकट है सबसे पहले गर्म होती है, फिर उष्मा उस सिरे या भाग से ठीक बाद वाले भाग में पहुँचती है। इस प्रकार यह प्रक्रम चलते हुए उष्मा एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँच जाती है।

उदाहरण:

(1) गैस स्टोव के लौ के ऊपर रखे हुए खाना पकाने के बर्तन का नीचे वाला भाग, अर्थात पेंदी सबसे पहले उष्मा ग्रहण करता है। उसके बाद यह उष्मा धीरे धीरे बर्तन के निचले भाग से अंदर वाले भाग में पहुँचता है। वहाँ से खाना पकाने के लिए रखे हुए पदार्थ, जैसे कि चावल, दाल आदि तक पहुँचता है। उष्मा का यह स्थानांतरण चालन की प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न होती है।

(2) जब एक लोहे की छड़ के एक सिरे को गैस फ्लेम या किसी अंगीठी या मोमबत्ती की लौ के ऊपर रखा जाता है, तो सबसे पहले छड़ का वह सिरा जो लौ के ऊपर रखा है गर्म होता है। उसके बाद उसके उष्मा का स्थानांतरण उसके ठीक बाद वाले भाग में होता है। यह प्रक्रम चलते हुए उष्मा लोहे की छड़ के दूसरे सिरे तक पहुँचती है। उष्मा का यह स्थानांतरण लोहे की छड़ में चालन की प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न होता है।

पदार्थ

कोई भी वस्तु जो स्थान घेरती हो, को पदार्थ कहा जाता है।

उदाहरण: हवा, पानी, मग, मोबाइल फोन, टेबल लैम्प, कम्यूटर, मिट्टी, बालू, ईंट,आदि सभी वस्तुएँ। अर्थात ब्रह्मांड में व्याप्त सभी वस्तुएँ पदार्थ कहलाती है। सभी पदार्थ छोटे छोटे कणों से मिलकर बना होता है। ऐ कण इतने छोटे होते हैं कि उन्हें नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता है।

आँधी- हवा के अचानक से काफी तेज चलने की घटना या प्रक्रिया आँधी कहलाती है।

जब किसी स्थान पर अधिक गर्मी पड़ती है, या कोई स्थान अधिक गर्म हो जाता है, तो उस स्थान की हवा गर्म होकर ऊपर उठने लगने लगती है जिससे खाली स्थान बन जाता है, उस खाली स्थान को भरने के लिए पास की ठंढ़ी हवा या कम गर्म हवा उस ओर तेजी से चलने लगती है। यह प्रक्रिया के लगातार होने के कारण हवा काफी तेज चलने लगती है। यह स्थिति आँधी कहलाती है। इस तरह आँधी का आना उष्मा के स्थानांतरण के कारण होती है, जो संवहन की प्रक्रिया द्वारा होती है। हवा का एक जगह से दूसरी जगह चलना अर्थात हवा का प्रवाह असमान गर्मी के कारण होता है। अर्थात किसी स्थान पर कम गर्मी पड़ती है, तो किसी स्थान पर अधिक गर्मी पड़ती है, जिसके कारण हवा लगातार चलती रहती है।

गर्मियों और सरियों में पहनने वाले वस्त्रों के प्रकार

काले रंग के वस्त्र हल्के रंगों के वस्त्रों की अपेक्षा अधिक उष्मा का अवशोषण करते हैं।

गर्मी के दिनों लोग प्राय: हल्के रंग के वस्त्रों को पहनना उपयुक्त होता है। क्योंकि हल्के रंग के वस्त्र उष्मा के अधिकांश भाग को परावर्तित कर देते हैं, जिससे व्यक्ति को गर्मियों कम गर्मी लगती है। गर्मियों में हल्के रंग का वस्त्र पहनना आरामदायक होता है।

जबकि जाड़े के मौसम में गहरे रंग के वस्त्र अधिक आरामदायक होते हैं। क्योंकि गहरे रंग के वस्त्र अधिक उष्मा का अवशोषण करते हैं, जो शरीर को गर्म रखने में मदद करता है। इसलिए गर्मियों में हल्के रंग के तथा सर्दियों में गहरे रंग के वस्त्र पहनना अधिक उपयुक्त होता है।

ऊनी कपड़े सर्दियों में हमें गर्म रखते हैं

ऊनी कपड़े मोटे तथा काफी रेशेदार होते हैं। अधिक रेशेदार तथा मोटे होने के कारण रेशों के बीच जगह बच जाती है जिसमें हवा के बुलबुले फंस जाते हैं। ऊनी कपड़ों के रेशों के बीच फंसे हुए हवा के बुलबुले कुचालक की तरह कार्य करते हैं। ये बाहर की ठंढ़क को अंदर आने से तथा शरीर की गर्मी को बाहर जाने से रोकते हैं। इस कारण ऊनी कपड़े हमें सर्दियों के मौसम में गर्म रखते हैं। इसी कारण से सर्दियों में लोग ऊनी कपड़े पहनते हैं ताकि उनका शरीर गर्म रह सके।

समुद्र समीर

पृथ्वी जल की अपेक्षा सुचालक है। जल का आपेक्षिक ताप उच्चतम है। गर्मियों के दिनों में सूर्य की गर्मी से पृथ्वी समुद्र के जल की अपेक्षा शीघ्र गर्म हो जाती है जिससे स्थल की वायु गर्म होकर ऊपर उठती है और समुद्र की ओर जाती है और इसका स्थान घेरने के लिए समुद्र की ओर से ठंडी वायु चलने लगती है। इस प्रकार की संवहन धाराओं को समुद्री समीर कहते हैं। समुद्र की ओर से आने वाली वायु को समुद्र समीर कहते हैं। तटीय क्षेत्रों में दिन के समय स्थल शीघ्र गर्म हो जाता है।

थल समीर

स्थल से ठंडी वायु समुद्र की ओर बहती है जिसे थल समीर कहते है। रात्रि में समुद्र का जल धीमी गति से ठंडा होता है। थल समीर, एक स्थानीय पवन प्रणाली है जो देर रात जमीन से पानी की ओर प्रवाहित होती है। भूमि की हवाएं पानी के बड़े निकायों से सटे समुद्र तटों के साथ समुद्री हवाओं के साथ वैकल्पिक होती हैं।

दोनों पानी की सतह और आसन्न भूमि की सतह के गर्म होने या ठंडा होने के बीच होने वाले अंतर से प्रेरित होते हैं। थल समीर देर रात को चलती है। यह शुष्क भूमि भी पानी की तुलना में अधिक तेज़ी से ठंडी होती है और सूर्यास्त के बाद, एक समुद्री हवा समाप्त हो जाती है और हवा इसके बजाय भूमि से समुद्र की ओर बहती है। तटीय क्षेत्रों की प्रचलित हवाओं में समुद्री हवाएं और भूमि की हवाएं दोनों महत्वपूर्ण कारक हैं।

समुद्र तथा स्थलीय समीर अन्तर

सागरीय– ये पवनें तटीय प्रदेशों पर चलती हैं। दिन के समय सागर के पानी की अपेक्षा पृथ्वी जल्दी गर्म हो जाती है। स्थल की वायु गर्म होकर ऊपर उठ जाती है इसलिए स्थल पर वायुदाब कम और सागर स्थल पर वायुदाब अधिक होता है। परिणाम यह होता है कि सागर से पवनें स्थल की ओर चलने लगती हैं। इन पवनों को जल समीर या सागर समीर कहते हैं।

स्थलीय समीर– ये रात के समय धरती से समुद्र की ओर चलती हैं। रात को समुद्र की अपेक्षा पृथ्वी अधिक ठण्डी हो जाती है। इस कारण समुद्र पर वायुदाब कम और पृथ्वी पर अधिक होता है। अतः धरती की ओर से समुद्र की ओर मन्द-मन्द पवनें चलने लगती हैं। इन्हीं पवनों को स्थल समीर कहते हैं।

विकिरण

सूर्य से पृथ्वी तक उष्मा एक अन्य प्रक्रम द्वारा आती है जिसे विकिरण कहते है।

  • सभी गर्म पिंड विकिरणों के रूप में ऊष्मा विकिरित करते हैं।
  • कुछ भाग में परिवर्तित हो जाता है।
  • कुछ भाग अवशोषित हो जाता है।
  • कुछ भाग परागत हो सकता है।
  • गर्मियों में हम हल्के रंग के वस्त्रों को पहनते हैं।
  • सर्दियों में हम गहरे रंग के कपड़ पहनना पसंद करते हैं।

NCERT SOLUTIONS

प्रश्न (पृष्ठ संख्या 47-49)

प्रश्न 1 प्रयोगशाला तापमापी तथा डॉक्टरी थर्मामीटर के बीच समानताएँ तथा अंतर लिखिए।

उत्तर- प्रयोगशाला तापमापी तथा डॉक्टरी थर्मामीटर के बीच समानताएँ- 

  • दोनों तापमापियों का कार्य करने का सिद्धांत एक जैसा है |
  • दोनों का उपयोग तापमान मापने के लिए किया जाता है |
  • दोनों में एक मोटी दीवार वाली कांच की ट्यूब होती है, जो एक महीन एकसमान मोटाई पतली (केशिका) ट्यूब को जोड़ती है।
  • तापमान मापने के लिए दोनों थर्मामीटर में पारा का उपयोग किया जाता है।
  • दोनों में सेल्सियस और फ़ारेनहाइट में अंकन होता हैं।

प्रयोगशाला तापमापी तथा डॉक्टरी थर्मामीटर के बीच अंतर-

  • प्रयोगशाला थर्मामीटर का उपयोग विभिन्न वस्तुओं के तापमान को मापने के लिए किया जाता है, जबकि डॉक्टरी थर्मामीटर का उपयोग केवल मनुष्य का तापमान मापने के लिए किया जाता है।
  • आम तौर पर, प्रयोगशाला थर्मामीटर में तापमान का परिसर 10℃ से 110 ℃ तक होता है, जबकि डॉक्टरी थर्मामीटर में तापमान का परिसर 35 ℃ से 42 ℃ तक होता है।
  • आमतौर पर प्रयोगशाला थर्मामीटर में पारा को रोकने के लिए कोई अवरोध नहीं होता है, जबकि डॉक्टरी थर्मामीटर में पारा बल्ब के पास एक छोटा-सा अवरोध होता है।
  • प्रयोगशाला थर्मामीटर को पढ़ने के दौरान सीधा रखना पड़ता है, जबकि पर पढ़ते समय डॉक्टरी थर्मामीटर को झुकाया जा सकता है।

प्रश्न 2 ऊष्मा चालक तथा ऊष्मा-रोधी, प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए।

उतर- ऊष्मा चालक के दो उदाहरण-

  • तांबा और 
  • एलुमिनियम 

ऊष्मा-रोधी पदार्थ का दो उदाहरण- 

  • लकड़ी और 
  • हवा 

प्रश्न 3 रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिएः

  1. कोई वस्तु कितनी गरम है इसकी जानकारी ————— द्वारा प्राप्त होती है।
  2. उबलते हुए पानी का ताप ————— तापमापी से नहीं मापा जा सकता।
  3. ताप को डिग्री ————— में मापते हैं।
  4. बिना किसी माध्यम द्वारा ऊष्मा स्थानांतरण के प्रक्रम को ————— कहते हैं।
  5. स्टील की एक ठंडी चम्मच गर्म दूध् के प्याले में रखी गई है। यह अपने दूसरे सिरे तक ऊष्मा का स्थानांतरण ————— प्रक्रम द्वारा करेगी।
  6. हल्के रंग के वस्त्रों की अपेक्षा ————— रंग के वस्त्र ऊष्मा का अधिक अवशोषण करते हैं।

उत्तर-

  1. तापमान 
  2. डॉक्टरी 
  3. सेल्सियस 
  4. विकिरण 
  5. चालन 
  6. काले

प्रश्न 4 कॉलम A में दिए कथनों का कॉलम B के शब्दों से मिलान कीजिए-

कॉलम Aकॉलम B
(क) थल समीर के बहने का समय(i) गर्मियाँ
(ख) समुद्र समीर के बहने का समय(ii) सर्दियाँ
(ग) गहरे रंग के कपड़े पसन्द करने का समय(iii) दिन
(घ) हल्के रंग के कपड़े पसन्द करने का समय(iv) रात

उत्तर-

कॉलम Aकॉलम B
(क) थल समीर के बहने का समय(iv) रात
(ख) समुद्र समीर के बहने का समय(iii) दिन
(ग) गहरे रंग के कपड़े पसन्द करने का समय(ii) सर्दियाँ
(घ) हल्के रंग के कपड़े पसन्द करने का समय(i) गर्मियाँ

प्रश्न 5 सर्दियों में एक मोटा वस्त्र पहनने के तुलना में उसी मोटाई का कई परतों का बना वस्त्र अधिक उष्णता क्यों प्रदान करता है? व्याख्या कीजिए।

उत्तर- गर्म कपड़ों की दो परतों के बीच हवा फंस जाती है। वायु ऊष्मा के कुचालक जैसा कार्य करती है। यह परत हमारे शरीर की गर्मी को आसपास के वातावरण में जाने से रोकती है। पतली कपड़ों की अधिक परतें अधिक हवा को रोकेंगी और परिणामस्वरूप हमें ठंड नहीं लगेगी। यही कारण है कि सर्दियों के दौरान कपड़ों की अधिक परतें पहनना हमारे द्वारा सिर्फ एक मोटा टुकड़ा पहनने से ज्यादा गर्म रखती हैं।

प्रश्न 6 चित्र 4.13 को देखिए। अंकित कीजिए कि कहाँ-कहाँ चालन, संवहन तथा विकिरण द्वारा ऊष्मा स्थानांतरित हो रही है।

उत्तर-

  1. उबलते हुए जल में संवहन हो रहा है |
  2. स्टोव में जो ऊष्मा आ रही है वह चालन से आ रही है |
  3. स्टोव और बर्तन के आस पास कि ऊष्मा विकिरण से आ रही है | 

प्रश्न 7 गरम जलवायु के स्थानों पर यह परामर्श दिया जाता है कि घरों की बाहरी दीवारों पर श्वेत (सफ़ेद) पेन्ट किया जाए। व्याख्या कीजिए।

उत्तर- गर्म जलवायु के स्थानों में यह सलाह दी जाती है कि घरों की बाहरी दीवारों को सफेद रंग से रंगा जाए क्योंकि सफेद रंग गर्मी को कम अवशोषित करता है जबकि गहरा रंग ऊष्होमा को अधिक अवशोषित करता है। इसलिए, घर के अंदर का तापमान बहुत नहीं बढ़ता है।

प्रश्न 8 30°C के एक लिटर जल को 50 °C के एक लिटर जल के साथ मिलाया गया।

मिश्रण का ताप होगा?

  1. 80°C
  2. 50°C से अधिक लेकिन 80°C से कम
  3. 20°C
  4. 30°C तथा 50°C के बीच

उत्तर- d. 30°C तथा 50°C के बीच

प्रश्न 9 40 °C ताप की लोहे की किसी गोली को कटोरी में भरे 40 °C ताप के जल में डुबाया गया। इस प्रक्रिया में ऊष्मा?

  1. लोहे की गोली से जल की ओर स्थानांतरित होगी।
  2. न तो लोहे की गोली से जल की ओर और न ही जल से लोहे की गोली की ओर स्थानांतरित होगी।
  3. जल से लोहे की गोली की ओर स्थानांतरित होगी।
  4. दोनों के ताप में वृद्धि कर देगी।

उत्तर- b. न तो लोहे की गोली से जल की ओर और न ही जल से लोहे की गोली की ओर स्थानांतरित होगी।

प्रश्न 10 लकड़ी की एक चम्मच को आइसक्रीम के प्याले में डुबोया गया है। इसका दूसरा

सिरा?

  1. चालन के कारण ठंडा हो जाएगा।
  2. संवहन के कारण ठंडा हो जाएगा।
  3. विकिरण के कारण ठंडा हो जाएगा।
  4. ठंडा नहीं होगा।

उत्तर- d. ठंडा नहीं होगा।

प्रश्न 11 स्टेनलेस इस्पात की कड़ाही में प्रायः कॉपर (ताँबे) की तली लगाई जाती है। इसका कारण हो सकता है?

  1. ताँबे की तली कड़ाही को अधिक टिकाऊ बना देती है।
  2. ऐसी कड़ाही देखने में सुन्दर लगती है।
  3. स्टेनलेस इस्पात की अपेक्षा ताँबा ऊष्मा का अच्छा चालक है।
  4. स्टेनलेस इस्पात की अपेक्षा ताँबे को साफ करना अधिक आसान है।

उत्तर- c. स्टेनलेस इस्पात की अपेक्षा ताँबा ऊष्मा का अच्छा चालक है।

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