अध्याय-5: शरीर मे गति
शरीर
मानव शरीर
मनुष्य के समस्त अंगों का समुच्चय। शरीररचना-विज्ञान – अंगों और उनके विन्यास का वर्णन करने वाला विज्ञान। शरीर योजना/शारीरिक योजना – किसी जीव के शरीर के ढाँचे व अकार, उसके अंगों और उनके आपस में काम करने का ढंग।
गति
जब कोई वस्तु अन्य वस्तुओं की तुलना में समय के सापेक्ष में स्थान परिवर्तन करती है, तो वस्तु के इसी अवस्था को गति (Motion) कहा जाता है। समय के सापेक्ष यदि वस्तु की स्थिति में कोई परिवर्तन ना हो तो वस्तु विराम अवस्था में होती है और यदि समय के साथ वस्तु की स्थिति में परिवर्तन हो तो वस्तु गतिशील अवस्था में होती है।
चलिए इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिये एक चिड़िया पेड़ पर बैठी है, चिड़िया जब तक बैठी रहेगी तबतक उसका विराम अवस्था रहेगा लेकिन जैसे ही चिड़िया पेड़ से उडी वह गतिशील अवस्था में आ जाएगी।
गति की परिभाषा (Motion) –
वस्तु की स्थिति में परिवर्तन गति कहलाती है। अर्थात जब कोई वस्तु अपने चारो और कि वस्तुओं की अपेक्षा अपनी स्थिति बदलती रहती है तो वस्तु की बदली हुई स्थिति को गति कहते है। जैसे-चलता हुआ आदमी, गतिमान वाहन, बहती हुई नदी आदि।
गतिशील वस्तुओं की गति अनेक प्रकार की होती है। जैसे-सरल रेखीय गति, वृतीय गति, घूर्णन गति, आवर्ती गति, दोलन / कम्पन गति।
सरल रेखीय गति (Linear Motion) –
जब कोई वस्तु सरल रेखा में गति करती है तो उसकी गति सर रेखीय गति कहलाती है। जैसे सड़क पर दौड़ते वाहनों की गति, दौड़ते खिलाड़ी की गति आदि सरल रेखीय गति के उदाहरण है।
वृतीय गति (Circular Motion) –
जब कोई वस्तु किसी निश्चित बिन्दु के चारों ओर एक निश्चित दूरी पर वृत्ताकार मार्ग पर चक्कर लगाती है तो उसकी गति वृत्तीय गति कहलाती है। जैसे सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की गति, पृथ्वी के चारों ओर चन्द्रमा की गति, घड़ी की सुइयों की गति, कोल्हू चलाते हुये बैल की गति आदि वृत्तीय गति के उदाहरण हैं।
घूर्णन गति (Rotational Motion) –
जब कोई वस्तु अपनी धुरी या अक्ष के चारों ओर घूमते है तो उसकी गति घूर्णन गति कहलाती है। जैसे बर्तन बनाने वाले कुम्हार के चाक की गति, घूमती फिरकी की गति, घिरनी की गति आदि घूर्णन गति के उदाहरण हैं।
आवर्ती गति (Recurring Speed) –
जब कोई गति करती हुई वस्तु एक निश्चित समय के बाद अपनी गति को दोहराती है तो उसकी गति आवर्ती गति कहलाती है। जैसे-सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की गति, घड़ी की सुइयों की गति आदि आवर्ती गति के उदाहरण हैं।
दोलन / कम्पन गति (Oscillatory Motion) –
जब कोई वस्तु अपनी मध्य स्थिति के दोनों ओर सरल रेखा में गति करता है तो उसकी गति दोलन / कम्पन गति कहलाती है। जैसे झूले में झूलते बच्चे की गति, दीवार घड़ी के पेण्डुलम की गति आदि दोलन गति के उदाहरण हैं।
शरीर में गति:-
गति: किसी भी वस्तु की स्थिति में परिवर्तन को गति कहते हैं। हमारे शरीर में और अन्य जीवों के शरीर में कई तरह की गतियाँ होती रहती हैं।
गमन: जब कोई वस्तु एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति करती है तो ऐसी गति को गमन कहते हैं। गति और गमन का अर्थ एक ही है लेकिन जीव विज्ञान में दोनों के अर्थ अलग अलग हो जाते हैं। हमारे शरीर में दिल का धड़कना या खून का संचार गति के उदाहरण हैं। लेकिन जब हमारा पूरा शरीर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाता है तो उसे गमन कहते हैं।
जंतु गाय मनुष्य साँप पक्षी कीट मछली गमन में प्रयुक्त होने वाला भाग/अंग पैर संपूणर् शरीर जंतु वैफसे गमन करते हैं चलती है रेंगकर जंतु एक स्थान से दूसरे स्थान तक किस प्रकार गमन करते हैं। चलना, टहलना, दौड़ना, उड़ना, छलाँग मारना, रेंगना एवं तैरना इत्यादि जंतुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के वुफछ ढंग हैं।
जोड़ (संधि): जहाँ पर दो या अधिक अस्थियों (हड्डियों) का मिलन होता है उसे स्थान को जोड़ कहते हैं।
दो हड्डियाँ आपस में लिगामेंट या अस्थिरज्जु से जुड़ी होती हैं। कोई भी अस्थि किसी पेशी से टेंडन या कंडरा की सहायता से जुड़ी होती है।
हमारे शरीर में स्वतः ही अनेक गतियाँ निरंतर होती रहती हैं। चलना, टहलना, दौड़ना, उड़ना, छलाँग मारना, रेंगना एवं तैरना इत्यादि।
हम शरीर के विभिन्न भागों को उसी स्थान से मोड़ अथवा घुमा पाते हैं, जहाँ पर दो हिस्से एक-दूसरे से जुड़े हो।
उदाहरण के लिए: – कोहनी, कंधा, अथवा गर्दन
संधि :-
हम शरीर के विभिन्न भागों को उसी स्थान से मोड़ अथवा घुमा पाते हैं, जहां पर दो हिस्से एक-दूसरे से जुड़े हो इन स्थानों को संधि कहते हैं।
सन्धियां (शरीर रचना) -:
हमारे शरीर में जिस स्थानों पर दो या दो से अधिक अस्थियां मिलती हैं। उस स्थान को अस्थि संधि या संधि कहते हैं। प्रत्येक अस्थियां संधि पर एक कठोर और लचीली पट्टी के माध्यम से जुड़ी रहती हैं जिसे अस्थिबंध कहा जाता है।
अस्थिबंध का कार्य होता है कि यह अस्थियों को उनके स्थान पर बनाए रखने में सहायता प्रदान करती हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर उन्हें गतिशील बनाती हैं। इस प्रकार वह स्थान जहां पर कंकाल की दो या दो से अधिक अस्थियां एक दूसरे से जुड़ती हैं उस स्थान को संधि या संधियोजन स्थान कहा जाता है।
संधियों के प्रकार (Types of Body Joints) -:
1. कोर संधि (Hinge Joints)
2. विसर्पी संधि (Gliding Joints)
3. कब्जा संधि (Pivot Joints)
4. अचल संधि (Immovable Joints)
5. कन्दुक खल्लिका संधि (Ball and Socket Joints)
कोर संधि (Hinge Joints) -:
यह संधि वहां पर होती है जहां पर एक संधि का उत्तल पृष्ठ, दूसरे संधि के अवतल पृष्ठ मे धँसा होता है जैसे घुटने और कोहनी की संधिया, कोर संधि के उदाहरण हैं। कोर संधि अस्थिबन्ध संधि की ओर स्थित होता है। इस संधि के द्वारा केवल एक ही सतह पर गति हो पाती है।
विसर्पी संधि (Gliding Joints) -:
यह ऐसी संधि होती है जिसके द्वारा अस्थियों की आगे-पीछे और अगल-बगल गति की जा सकती है। कलाई और टखने की संधि विसर्पी संधि के उदाहरण है। समान्यतः इन संधियों में अस्थियों के सिरे चपटे पाए जाते हैं। कशेरुकियो में भी इस प्रकार की ही संधि पाई जाती हैं, जिसके कारण और उसमे हल्की गति संभव हो पाती है। इस प्रकार की संधि को अचल संधि भी कहा जाता है। कलाई वाले भाग में पाई जाने वाली संधि, अचल संधि कहलाती है।
कब्जा संधि (Pivot Joints) -:
ऐसी संधिया जंहा पर एक अस्थि वलय किसी दूसरी अस्थि के चारों ओर घूमती हैं उन्हें कब्जा संधि कहते हैं। यह संधि वहां पर मिलती हैं जहां पर एक अस्थि वलय, दूसरी अस्थि के चारों ओर घूमता है। एटलस दंताभ चारों ओर अपने अक्ष पर घूमता है जो कब्जा संधि का एक उदाहरण है। इस प्रकार की संधि में एक हड्डी का सिरा दूसरी अस्थि के चारों ओर कब्जे के समान गति करते हुए घूमता है।
अचल संधि (Immovable Joints) -:
ऐसी संधिया जिसमें दो अस्थियों या हड्डियों के बीच गति नहीं हो पाती है अचल संधिया कहलाती हैं। इस प्रकार की संधि का उदाहरण हमारे ऊपरी जबड़े और कपाल के बीच तथा सिर की कुछ हड्डिया हैं। जब हम अपने मुंह को खोलते हैं तो हम देखते हैं हमारा निचला जबड़ा तो नीचे की ओर जाता है परंतु ऊपरी जबड़ा अपनी स्थिति पर ही रहता है या गति नहीं करता है जबकि नीचला जबड़ा गति करता है, जो अचल संधि का सबसे तगड़ा उदाहरण है।
कन्दुक खल्लिका संधि (Ball and Socket Joints) -:
ऐसी संधि जिसमें एक अस्थि का गेंद के आकार जैसा सिरा दूसरी अस्थि के गुहिका अथवा खोखले स्थान में धँसा होता है ति इस प्रकार की संधि को कन्दुक खल्लिका संधि (Ball and Socket Joints) कहते हैं। इस प्रकार की संधि से सभी दिशाओं में गति आसानी से की जा सकती है।
कंदुक-खल्लिका संधि :–
कंदुक-खल्लिका संधि एक जंगम संयुक्त है। यह एक हड्डी से बना होता है जिसमें गोल सिर होता है, जो किसी और हड्डी के कप के अवसाद में फिट बैठता है। यह हड्डी को स्वतंत्र रूप से घूमने में मदद करता है। सभी दिशाओं में गति करता है।
घुटना हिंज संधि का एक उदाहरण हैं।
कंकाल: –
हमारे शरीर को निश्चित आकार एवं आकृति प्रदान करने के लिए एक ढांचे की आवश्यकता होती है। इसके अभाव में शरीर न तो चल-फिर सकेगा और न ही कार्य कर सकेगा। यह ढांचा कंकाल तंत्र कहलाता है। कंकाल तंत्र का निर्माण अस्थियाँ, उपास्थियाँ, संधियाँ आदि मिलकर करते हैं। अस्थियों, उपास्थियों से मिलकर बने शरीर के ढाँचे को ही कंकाल तंत्र कहते हैं।
मानव शरीर के कंकाल का घटन एवं उसकी सरंचना खास तरह की होती है, जिसमे अलग-अलग आकारों एवं सरंचनाओ वाली हड्डियां या अस्थि-पिंजर विद्यमान रहते है| मानव शरीर में मुख्य रूप से 206 प्रकार की हड्डियां पाई जाती है और बचपन में इनकी संख्या 300 होती है| ये विभिन्न प्रकार की हड्डियाँ आपस में उत्तको के माध्यम से जुडी रहती है और संधिब्न्ध हड्डियाँ शरीर के जरूरत के अनुसार अपना कार्य करती है|
हड्डियों के ऊपर मांसपेशियों की परत होती है, जो अस्थियो के आकार के अनुसार शरीर को भी आकार प्रदान करती है| जोड़ वाली हड्डियों को मजबूत पकड़ एवं लचक प्रदान करने का कार्य स्नायु (ligament) करते है| कुछ अस्थिओं के मध्य में डिस्क के समान मौजूद रहती है, जो हड्डियों को मजबूत करने का कार्य करती है एवं उन्हें उनकी जगह पर स्थिर रखती है|
कंकाल के मुख्य रूप से दो भाग होते है, बाहरी कंकाल एवं आन्तरिक कंकाल| बाहरी कंकाल शरीर के बाहरी भागो में पाया जाता है, जैसे कुछ मछलियों के सख्त शल्क, कछुए का खोल आदि बाहरी कंकाल का उदाहारण है, यह इन जीवो की रक्षा करने का कार्य करता है| इसके अलावा आन्तरिक कंकाल शरीर के अंदर सभी कशेरुक जीवों में पाया जाता है| यह शरीर को सही आकार प्रदान करता है| मनुष्य का कंकाल तन्त्र मुख्य रूप से २ भागों से मिलकर बना होता है, जिसका विवरण इस प्रकार है:
कंकाल तंत्र के प्रकार
शरीर में उपस्थिति के आधार पर ककाल तंत्र के दो प्रकार के होते हैं।
- बाहय कंकाल (Exo-skeleton)
- अंतः कंकाल (Endo-skeleton)
बाहय कंकाल (Exo-skeleton)
शरीर की बाहरी सतह पर पाये जाने वाले कंकाल को बाह्य कंकाल कहा जाता है। बाह्य कंकाल की उत्पत्ति भ्रूणीय एक्टोडर्म या मीसोडर्म से होती है । त्वचा की उपचर्म या चर्म ही बाह्य ककाल के रूप में रूपान्तरित हो जाती है।
बाह्य कंकाल शरीर के आंतरिक अंगों की रक्षा करता है तथा यह मृत होता है। मत्स्यों में शल्क कछुओं में ऊपरी कवच पक्षियों में पिच्छ तथा स्तनधारियों में बाल बाह्य कंकाल होते हैं जो इन प्राणियों को अत्यधिक सर्दी एवं गर्मी से सुरक्षित रखते हैं।
अन्तः कंकाल (Endo-skeleton)
शरीर के अंदर पाये जाने वाले ककाल को अन्तः कंकाल कहते हैं। इसकी उत्पत्ति भ्रूणीय मीसोडर्म से होती है। अन्तःकंकाल सभी कशेरुकियों में पाया जाता है। कशेरुकियों में अन्तःकंकाल ही शरीर का मुख्य ढ़ाँचा बनाता है। यह मांसपेशियों (Muscles) से ढंका रहता है। संरचनात्मक दृष्टि से अन्तःकंकाल दो भागों से मिलकर बना होता है-
- अस्थि
- उपास्थि
अस्थि (Bone)
अस्थि एक ठोस, कठोर एवं मजबूत संयोजी ऊतक है जो तन्तुओं एवं मैट्रिक्स का बना होता है। इसके मैट्रिक्स में कैल्सियम और मैग्नीशियम के लवण पाये जाते हैं तथा इसमें अस्थि कोशिकाएँ एवं कोलेजन तंतु व्यवस्थित होते हैं।
कैल्सियम एवं मैग्नीशियम के लवणों की उपस्थिति के कारण ही अस्थियाँ कठोर होती हैं। प्रत्येक अस्थि के चारों ओर तंतुमय संयोजी ऊतक से निर्मित एक दोहरा आवरण पाया जाता है जिसे परिअस्थिक कहते हैं। इसी परिअस्थिक के द्वारा लिगामेण्ट्स टेन्ड्न्स तथा दूसरी मांसपेशियाँ जुड़ी होती हैं।
मोटी एवं लम्बी अस्थियों में एक प्रकार की खोखली गुहा पायी जाती है, जिसे मज्जा गुहा कहते हैं। मज्जा गुहा में एक प्रकार का तरल पदार्थ पाया जाता है जिसे अस्थि मज्जा कहते हैं। अस्थि मज्जा मध्य में पीली तथा अस्थियों के सिरों पर लाल होती है।
इन्हें क्रमशः पीली अस्थि मज्जा तथा लाल अस्थि मज्जा कहते हैं। लाल अस्थि मज्जा लाल रुधिर कणिकाओं का निर्माण करती है जबकि पीली अस्थि मज्जा श्वेत रुधिर कणिकाओं (wBCs) का निर्माण करती है। लाल अस्थि मज्जा केवल स्तनधारियों में पायी जाती है।
अस्थि के प्रकार
विकास के आधार पर अस्थियाँ दो प्रकार की होती हैं।
- कलाजात अस्थि (Investing bone)
- उपास्थिजात अस्थि (Cartilage bone)
कलाजात अस्थि (Investing bone):
यह अस्थि त्वचा के नीचे संयोजी ऊतक की झिल्लियों से निर्मित होती है। इसे मेम्ब्रेन अस्थि कहते हैं। खोपड़ी की सभी चपटी अस्थियाँ कलाजात अस्थियाँ होती हैं।
उपास्थिजात अस्थि (Cartilage bone):
यह अस्थियाँ सदैव भ्रूण की उपास्थि को नष्ट करके उन्हीं के स्थानों पर बनती हैं। इस कारण इन्हें रिप्लेसिंग बोन भी कहा जाता है। कशेरुक दण्ड तथा पैरों की अस्थियाँ उपास्थिजात अस्थियाँ होती हैं।
उपास्थि (Cartilage)
उपास्थि का निर्माण ककाली संयोजी ऊतकों से होता है। यह भी एक प्रकार का संयोजी ऊतक होता है। यह अर्द्ध ठोस, पारदर्शक एवं लचीले ग्लाइकोप्रोटीन से बने मैट्रिक्स से निर्मित होता है। उपास्थि का मैट्रिक्स थोड़ा कड़ा होता है। इसके मैट्रिक्स के बीच में रिक्त स्थान में छोटी-छोटी थैलियाँ होती हैं जिसे लैकुनी कहते हैं।
लैकुनी में एक प्रकार का तरल पदार्थ भरा रहता है। लैकुनी में कुछ जीवित कोशिकाएँ भी पायी जाती हैं, जिसे कोण्ड्रियोसाइट कहते हैं। इसके मैट्रिक्स में इलास्टिन तन्तु एवं कोलेजन भी पाये जाते हैं। उपास्थि के चारों ओर एक प्रकार की झिल्ली पायी जाती है जिसे पेरीकोण्ड्रियम कहते हैं।
मानव कंकाल तंत्र की अस्थियाँ
मनुष्य के कंकाल में कुल 206 अस्थियाँ होती हैं। मनुष्य के कंकाल को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।
- अक्षीय कंकाल
- उपांगीय कंकाल
अक्षीय कंकाल: –
शरीर का मुख्य अक्ष बनाने वाले कंकाल को अक्षीय कंकाल कहते हैं। इसमें खोपड़ी की हड्डी, मेरुदंड, पसलियां एवं उरोस्थि होते हैं।
यह कंकाल तन्त्र का मुख्य अंग है, चूँकि यह शरीर के अक्ष का निर्माण करता है, इसलिए इसे अक्षीय कंकाल कहा जाता है| इसके अंतर्गत मनुष्य की खोपड़ी, मेरुदंड, पसलिया या छाती की अस्थियां आती है|
अक्षीय कंकाल के दो प्रकार होते हैं।
- खोपड़ी (Skull)
- कशेरुक दण्ड (Vertebral Column)
खोपड़ी:
मनुष्य के सिर के अन्तः कंकाल के भाग को खोपड़ी कहते हैं इसमें 29 अस्थियाँ होती हैं इसमें से 8 अस्थियाँ संयुक्त रूप से मनुष्य के मस्तिष्क को सुरक्षित रखती हैं। इन अस्थियों से बनी रचना को कपाल कहते हैं।
कपालों की सभी अस्थियाँ सीवनों के द्वारा दृढ़तापूर्वक जुड़ी रहती हैं इनके अतिरिक्त 14 अस्थियाँ चेहरे को बनाती हैं 6 अस्थियाँ कान को हायड नामक एक और अस्थि खोपड़ी में होती हैं।
मनुष्य की खोपड़ी में कुल 22 अस्थियाँ होती हैं। इनमें से 8 अस्थियाँ संयुक्त रूप से मनुष्य के मस्तिष्क को सुरक्षित रखती है। इन अस्थियों से बनी रचना को कपाल कहते हैं। ये सभी अस्थियाँ सीवनों के द्वारा जुड़ी रहती है।
इनके अतिरिक्त 14 अस्थियाँ और होती हैं जो चेहरे को बनाती है। मनुष्य की खोपड़ी में महारन्ध्र नीचे की ओर होता है। महारन्ध्र के दोनों ओर अनुकपाल अस्थिकन्द होते हैं, जो एटलस कशेरुक के अवतलों में स्थित होते हैं।
खोपड़ी की मुख्य अस्थियाँ निम्न हैं
- फ्रॉण्टल (Frontal),
- पेराइटल (Parietal),
- ऑक्सीपिटल (Occipital),
- टेम्पोरल (Temporal),
- मेलर (Maler),
- मैक्सिला (Maxilla),
- डेण्टरी (Dentary),
- नेजल (Nasal),
मेरुदंड या कशेरुक दंड:
मनुष्य का कशेरुक दण्ड 33 कशेरुकाओं से मिलकर बना है सभी कशेरुक उपास्थि गदिदयो के द्वावा जुड़े रहते हैं।
इन गदिदयो से कशेरुक दण्ड लचीला रहता हैं सम्पूर्ण कशेरुक दण्ड को हम निम्लिखित भागों में विभक्त करते हैं। इसका पहला कशेरुक दण्ड जो कि एटलस कशेरुक दण्ड कहलाता हैं।
कशेरुक दण्ड के कार्य
यह सिर को साधे रहता हैं।
यह गर्दन तथा धड़ को आधार प्रदान करता हैं।
यह मनुष्य को खड़े होकर चलने, खड़े होने आदि में मदद करता हैं।
यह गर्दन व धड़ को लचक प्रदान करते हैं जिससे मनुष्य किसी भी दिशा में अपनी गर्दन और धड़ को मोड़ने में सफर होता हैं।
यह मेरुरज्जु को सुरक्षा प्रदान करता हैं
अक्षीय कंकाल खोपड़ी के घटक
मानव की खोपड़ी में 29 अस्थियां होती हैं जिनमें से 8 अस्थियां मानव के मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करती हैं और खोपड़ी के अस्थि के जोड़ से जुड़ी होती हैं। बाकी की अस्थियां मनुष्य का चेहरा बनाती है जिनमें से 14 अस्थियां उल्लेखनीय रूप से प्रतिवादी होती हैं।
उपांगीय कंकाल (Appendicular Skeleton)
उपांगीय कंकाल इसके अन्तर्गत मेखलाएँ तथा हाथ-पैरों की अस्थियाँ आती हैं।
- मेखलाएँ
- अंसमेखला
- श्रोणि मेखला तथा पैर की अस्थियाँ
मेखलाएँ (Girdles)
मनुष्य में अग्रपाद तथा पश्चपाद् को अक्षीय कंकाल पर साधने के लिए दो चाप पाये जाते हैं, जिन्हें मेखलाएँ कहते हैं। अग्रपाद की मेखला को अंसमेखला तथा पश्च पाद की मेखला को श्रोणि मेखला कहते हैं।
अंस मेखला से अग्रपाद की अस्थि ह्यूमरस एवं श्रोणि मेखला से पश्च पाद की अस्थि फीमर जुड़ी होती है। ये अस्थियाँ गुहाओं में व्यवस्थित होती हैं जिन्हें एसिटेबुलम कहते हैं।
अंसमेखला तथा हाथ की अस्थियाँ (Bones of dectoral girdle and hand)
मनुष्य की अंसमेखला के दोनों भाग अलग-अलग होते हैं। इसके प्रत्येक भाग में केवल एक चपटी व तिकोनी अस्थि होती है, जिसे स्कैपुला कहते हैं। यह आगे की पसलियों को पृष्ठ तल की ओर ढके रहती है। इसका आगे वाला मोटा भाग क्लेविकिल से जुड़ा रहता है।
इसी सिरे पर एक गोल गड्ढ़ा होता है, जिसे ग्लीनॉइड गुहा कहते हैं। ग्लीनॉइड गुहा में ह्यूमरस का सिर जुड़ा रहता है। ग्लीनॉइड गुहा के निकट ही एक प्रवर्द्ध होता है जिसे कोरोकॉइड प्रवर्द्ध कहते हैं। अंसमेखला हाथ की अस्थियों को अपने से जोड़ने के लिए सन्धि स्थान प्रदान करती है। यह हृदय तथा फेफड़ों को सुरक्षा प्रदान करती है।
यह मांसपेशियों को अपने से जोड़ने के लिए स्थान प्रदान करती है। मनुष्य के हाथ की अस्थियों में ह्यूमरस, रेडियस अलना, कार्पलस, मेटाकार्पल्स तथा फैलेन्जस होती है। मनुष्य की रेडियस अलना जुड़ी न होकर एक-दूसरे से स्वतंत्र होती है।
श्रोणि मेखला तथा पैर की अस्थियाँ (Bones of Pelvic girdle and legs)
मनुष्य की श्रोणि मेखला तीन प्रकार की अस्थियों से मिलकर बनी होती है।
ये तीनों अस्थियाँ हैं इलियम, इश्चियम तथा प्यूबिस। वयस्क में ये तीनों अस्थियाँ आपस में जुड़ी रहती हैं। प्यूबिस अधर तल पर दूसरी ओर की प्यूबिस से, इलियम आगे की ओर सेंक्रम से तथा इश्चियम पृष्ठ तल की ओर दूसरी ओर की इश्चियम से जुड़ी रहती है। इलियम, इश्चियम तथा प्यूबिस के संधि स्थल पर एक गड्ढ़ा होता है जिसे एसिटेबुलम कहते हैं। एसिटेबुलम में फीमर अस्थि का सिर जुड़ा रहता है।
श्रोणि मेखला पैरों की अस्थियों को अपने से जोड़ने के लिए संधि स्थान प्रदान करती है। यह अन्तरांगों को सुरक्षा प्रदान करती है। मनुष्य के पैर में फीमर, टिबियो फिबुला, टॉर्सल्स तथा मेटा टॉर्सल्स अस्थियाँ होती हैं। इनमें टिबियोफिबुला मुक्त रहती है।
फीमर तथा टिबियोफिबुला के सन्धि स्थान पर एक गोल अस्थि होती है, जिसे घुटने की अस्थि या पटेला कहते हैं। इस जोड़ पर मनुष्य का पैर केवल एक ओर ही मुड़ सकता है। टॉर्सल्स में से एक बड़ी होती है जो ऐड़ी बनाती है। तलवे की अस्थियाँ मेटाटॉर्सल्स कहलाती है।
अँगूठे में केवल दो तथा अन्य अँगुलियों में तीन-तीन अंगुलास्थियाँ होती हैं। इसके निम्न भाग होते हैं।
- पाद अस्थियाँ
- मेखलाएँ
मेखलाएँ (Girdles):
मनुष्य में अग्र पाद तथा पश्च पाद को अक्षीय कंकाल पर साधने के लिए दो चाप पाए जाते हैं जिन्हें मेखलाएँ कहते है।
अग्र पाद की मेखला को अंश मेखला तथा पश्च पाद की मेखला को श्रेणी मेखला कहते हैं। अंश मेखला से अग्र पाद की अस्थि ह्यूमरस एवं श्रेणी मेखला से पश्च पाद की हड्डी फीमर जुड़ी होती हैं।
कंकाल तंत्र के कार्य :-
- यह शरीर को निश्चित आकृति एवं आधार प्रदान करता है।
- शरीर के आंतरिक कोमल अंगों की बाह्य आघातों से रक्षा करता है।
- यह पेशियों की सहायता से सम्पूर्ण शरीर एवं शरीर के अंगों को गति प्रदान करता है।
- यह शरीर को मजबूती प्रदान करता है।
हड्डियों के कार्य (Function of skeleton)
- हड्डियां शरीर को एक निश्चित रुप देता है।
- हड्डियां से शरीर को सहारा मिलता है।
- कंकाल से शरीर के अंगों की रक्षा होती है।
- शरीर को बाहरी आघातों से रक्षा करता है।
- कंकाल की मज्जा गुहा फैट को इकट्ठा करता है।
- Rbc यानि लाल रक्त कंडिकाओ का निर्माण करता है।
जंतुओं की चाल
जंतुओं में गमन
पक्षी
- (i) पक्षी हवा में उड़ते हैं तथा भूमि पर चलते हैं। शरीर उड़ने के लिए अनुकूलित होता है।
- (ii) उनकी अस्थियों में वायु प्रकोष्ठ होते हैं जिनके कारण उनकी अस्थियाँ हल्की परंतु मज़बूत होती हैं।
- (iii) पश्च पैरों की अस्थियाँ चलने एवं बैठने के लिए अनुकूलित होती हैं। कधे की अस्थियाँ मज़बूत होती है।
- (iv) वक्ष की अस्थियाँ उड़ने वाली पेशियों को जकड़े रखने के लिए विशेष रूप से रूपांतरित होती है।
पक्षी पंखों की सहायता से उड़ते हैं।
केंचुआ:
केंचुए का शरीर छल्ले जैसे कई खंडों का बना होता है। इसके शरीर के अधर सतह (आधार के निकट) असंख्य छोटे-छोटे शूक (बाल जैसी आकृति) होते हैं। ये शूक पेशियों से जुड़े होते हैं। केंचुआ अपने शरीर को लंबाई में सिकोड़कर और फैलाकर गमन करता है। केंचुआ अपने शरीर के अगले भाग को सिकोड़ता है तो इस भाग के शूक आधार को पकड़ कर रखते हैं। इसके कारण शरीर का पिछला भाग आगे की ओर खिंच जाता है। उसके बाद केंचुआ अपने शरीर के पिछले भाग को सिकोड़ता है और शूकों से जमीन को पकड़ता है। ऐसे में शरीर का अगला भाग फैलकर आगे बढ़ जाता है।
- केचुएं में गति – केंचुए में शूक शरीर में पेशियों से जुड़े होते हैं तथा केंचुए को भूमि पर अपनी पकड़ बनाने में सहायता करते हैं।
- चलने के दौरान, केंचुआ अपने शरीर के पश्च भाग को भूमि में जकड़े रहता है तथा अग्र भाग को फैलाता है।
- इसके बाद वह अग्र भाग से भूमि को पकड़ता है तथा पश्च भाग को स्वतंत्र कर देता है।
घोंघा:
- घोंघा की पीठ पर एक गोल संरचना होती है। यह घोंघे का बाह्य कंकाल होता है
- इसे कवच भी कहते है। परंतु यह अस्थियों का बना नहीं होता।
- घोंघा की चाल कछुए से भी धीमी मानी जाती है। यह दुनिया के सबसे धीमी गति से चलने वाले जीवों में शामिल है
तिलचट्टा:
- तिलचट्टा ज़मीन पर चलता है, दीवार पर चढ़ता है और वायु में भी उड़ताहै।
- इनके तीन जोड़ी पैर होते है जो चलने में सहायता करते है। इसका शरीर कठोर बाहय-कंकाल द्वारा आवरित होता है।
- इसका बाह्य-कंकाल विभिन्न एककों की परस्पर संधियों द्वारा बनता है जिसके कारण गति संभव हो पाती है।
मछली:
मछलियों मे तैरने के लिए खास रूप से पख और पूँछ होती है। मछली का शरीर धारारेखीय होता है। मछली अपने शरीर को एक ओर मोड़ती है तो पूँछ दूसरी दिशा में मुड़ जाती है। उसके बाद मछली अपने शरीर को दूसरी ओर मोड़ती है तो पूँछ विपरीत दिशा में मुड़ जाती है। इस के कारण आगे की ओर धक्का मिलता है जिससे मछली आगे बढ़ जाती है। पूँछ से दिशा बदलने में मदद मिलती है।
सांप:
सर्प के शरीर में कशेरुक एँ अधिक संख्या में होती हैं। इन कशेरुकाओं से पतली पेशियाँ जुड़ी रहती हैं। जब एक सांप गमन करता है तो यह अगल बगल लूप या अंग्रेजी के S अक्षर जैसी आकृति बनाता है। इसी लूप से आगे बढ़ने के लिये बल मिलता है और सांप आगे बढ़ता है।
NCERT SOLUTIONS
प्रश्न (पृष्ठ संख्या 77-78)
प्रश्न 1 रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।
(क) अस्थियों की संधियाँ शरीर को —————— में सहायता करती हैं।
(ख) अस्थियाँ एवं उपास्थि संयुक्त रूप से शरीर का —————— बनाते हैं।
(ग) कोहनी की अस्थियाँ —————— संधि द्वारा जुड़ी होती हैं।
(घ) गति करते समय —————— के संकुचन से अस्थियाँ खिंचती हैं।
उत्तर-
(क) अस्थियों की संधियाँ शरीर को –गति– में सहायता करती हैं।
(ख) अस्थियाँ एवं उपास्थि संयुक्त रूप से शरीर का – कंकाल – बनाते हैं।
(ग) कोहनी की अस्थियाँ –हिंज– संधि द्वारा जुड़ी होती हैं।
(घ) गति करते समय – मांसपेशियों– के संकुचन से अस्थियाँ खिंचती हैं।
प्रश्न 2 निम्न कथनों के आगे सत्य (T) तथा असत्य (F) को इंगित कीजिए।
(क) सभी जंतुओं की गति एवं चलन बिलकुल एक समान होता है। ( )
(ख) उपास्थि अस्थि की अपेक्षा कठोर होती हैं। ( )
(ग) अंगुलियों की अस्थियों में संधि नहीं होतीं। ( )
(घ) अग्रभुजा में दो अस्थियाँ होती हैं। ( )
(ङ) तिलचट्टों में बाह्य-कंकाल पाया जाता है। ( )
उत्तर-
(क) False
(ख) False
(ग) False
(घ) True
(ङ) True
प्रश्न 3 कॉलम 1 में दिए गए शब्दों का संबंध् कॉलम 2 के एक अथवा अधिक कथन से जोडि़ए।
उत्तर-
प्रश्न 4 निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(क) कंदुक-खल्लिका संधि क्या है?
उत्तर- कंदुक-खल्लिका संधि एक गतिशील संधि है। इसमें एक अस्थि के सिरे पर बॉल और दुसरे अस्थि के सिरे पर एक सॉकेट होता है। जो एक दुसरे से जुड़कर संधि को सभी दिशाओं में घूमने की अनुमति देता है। उदाहरण: कंधे की संधि।
(ख) कपाल की कौन-सी अस्थि गति करती है?
उत्तर- कपाल की अस्थियों में केवल निचला जबड़ा गति करता है।
(ग) हमारी कोहनी पीछे की ओर क्यों नहीं मुड़ सकती?
उत्तर- कोहनी में हिंज संधि होती है, जिससे केवल आगे और पीछे एक ही दिशा में गति हो सकती है इसलिए कोहिनी पीछे की ओर मुड़ नहीं सकती है।
