विशेषण वे शब्द होते हैं जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताते हैं। ये शब्द वाक्य में संज्ञा के साथ लगकर संज्ञा की विशेषता बताते हैं।
विशेषण विकारी शब्द होते हैं एवं इन्हें सार्थक शब्दों के आठ भेड़ों में से एक माना जाता है।
बड़ा, काला, लम्बा, दयालु, भारी, सुंदर, कायर, टेढ़ा – मेढ़ा, एक, दो, वीर पुरुष, गोरा, अच्छा, बुरा, मीठा, खट्टा आदि विशेषण शब्दों के कुछ उदाहरण हैं।
विशेषण की परिभाषा
जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता (गुण, सं ख्या, मात्रा या परिमाण आदि) बताते हैं विशेषण कहलाते हैं |
जैसे – बड़ा, काला, लंबा, दयालु, भारी, सुन्दर, अच्छा, गन्दा, बुरा, एक, दो आदि।
वहां चार लड़के बैठे थे।
अध्यापक के हाथ में लंबी छड़ी है
वह घर जा रहा था।
गीता सुंदर लड़की है
विशेष्य
जिन संज्ञा या सर्वनाम शब्दों की विशेषता बताई जाए वे विशेष्य कहलाते हैं।
जैसे – मोहन सुंदर लड़का है
प्रविशेषण
विशेषण शब्द की भी विशेषता बतलाने वाले शब्द ‘प्रविशेषण’ कहलाते हैं।
जैसे – राधा बहुत सुंदर लड़की है।
इस वाक्य में सुंदर (विशेषण) की विशेषता बहुत शब्द के द्वारा बताई जा रही है। इसलिए बहुत प्रविशेषण शब्द है।
विशेषण के भेद
हिन्दी व्याकरण में विशेषण के मुख्यतः 5 भेद या प्रकार होते हैं|
गुणवाचक
परिमाणवाचक
संख्यावाचक
सार्वनामिक
गुणवाचक :- जिस विशेषण से संज्ञा या सर्वनाम के गुण या दोष का बोध हो, उसे गुणवाचक विशेषण कहते हैं। ये विशेषण भाव, रंग, दशा, आकार, समय, स्थान, काल आदि से सम्बन्धित होते है।
सार्वनामिक :- पुरुषवाचक और निजवाचक सर्वनाम (मैं, तू, वह) के अतिरिक्त अन्य सर्वनाम जब किसी संज्ञा के पहले आते हैं, तब वे संकेतवाचक या सार्वनामिक विशेषण कहलाते हैं।
जैसे – यह घोड़ा अच्छा है।, वह नौकर नहीं आया। यहाँ घोड़ा और नौकर संज्ञाओं के पहले विशेषण के रूप में ‘यह’ और ‘वह’ सर्वनाम आये हैं। अतः ये सार्वनामिक विशेषण हैं।
जैसे – यह विद्यालय, वह बालक, वह खिलाड़ी आदि ।
सार्वनामिक विशेषण के भेद
व्युत्पत्ति के अनुसार सार्वनामिक विशेषण के भी दो भेद है-
मौलिक सार्वनामिक विशेषण
यौगिक सार्वनामिक विशेषण
मौलिक सार्वनामिक विशेषण :- जो सर्वनाम बिना रूपान्तर के संज्ञा के पहले आता हैं उसे मौलिक सार्वनामिक विशेषण कहते हैं।
जैसे –
वह लड़का,
यह कार,
कोई नौकर,
कुछ काम इत्यादि।
यौगिक सार्वनामिक विशेषण :- जो मूल सर्वनामों में प्रत्यय लगाने से बनते हैं।
जैसे –
कैसा घर, उतना काम, ऐसा आदमी, जैसा देश इत्यादि।
विशेष्य और विशेषण में संबंध
ऊपर आपने विशेषण और विशेष्य के बारे में पढ़ा, अब इन दोनों के संबंधों पर बात करेंगे।
“वाक्य में विशेषण का प्रयोग दो प्रकार से होता है- कभी विशेषण विशेष्य के पहले आता है और कभी विशेष्य के बाद।” इस प्रकार प्रयोग की दृष्टि से विशेषण के दो भेद हैं-
विशेष्य – विशेषण
विधेय – विशेषण
विशेष्य विशेषण :- जो विशेषण विशेष्य के पहले आये, वह विशेष्य – विशेष होता हैं।
जैसे –
मुकेश चंचल बालक है।,
संगीता सुंदर लड़की है।
इन वाक्यों में चंचल और सुंदर क्रमशः बालक और लड़की के विशेषण हैं, जो संज्ञाओं (विशेष्य) के पहले आये हैं।
विधेय विशेषण :- जो विशेषण विशेष्य और क्रिया के बीच आये, वहाँ विधेय – विशेषण होता हैं।
जैसे –
मेरा कुत्ता लाल हैं।,
मेरा लड़का आलसी है।
इन वाक्यों में लाल और आलसी ऐसे विशेषण हैं, जो क्रमशः कुत्ता (संज्ञा) और है (क्रिया) तथा लड़का (संज्ञा) और है (क्रिया) के बीच आये हैं।
महत्वपूर्ण
विशेषण के लिंग, वचन आदि विशेष्य के लिंग, वचन आदि के अनुसार होते हैं।
जैसे –
अच्छे लड़के पढ़ते हैं।,
नताशा भली लड़की है।,
रामू गंदा लड़का है। आदि
यदि एक ही विशेषण के अनेक विशेष्य हों तो विशेषण के लिंग और वचन समीप वाले विशेष्य के लिंग, वचन के अनुसार होंगे,
जो शब्द किसी दूसरे शब्द का उल्टा अर्थ बताते हैं, उन्हें विलोम शब्द या विपरीतार्थक शब्द कहते है। जैसे- अपेक्षा- नगद, आय- व्यय, आजादी-गुलाम, नवीन- प्राचीन शब्द एक दूसरे के उलटे अर्थ वाले शब्द है। अतः इन्हें ‘विलोम शब्द’ कहते हैं।
अत: विलोम का अर्थ है- उल्टा या विरोधी अर्थ देने वाल़ा।विलोम शब्द अपने सामनेवाले शब्द के सर्वदा विपरीत अर्थ प्रकट करते हैं।
जैसा कि विराम का अर्थ रुकना होता है, उसी प्रकार हिंदी व्याकरण में विराम शब्द का अर्थ है – ठहराव या रुक जाना। एक व्यक्ति अपनी बात कहने के लिए, उसे समझाने के लिए, किसी कथन पर बल देने के लिए, आश्चर्य आदि भावों की अभिव्यक्ति के लिए कहीं कम, कहीं अधिक समय के लिए ठहरता है। भाषा के लिखित रूप में कुछ समय ठहरने के स्थान पर जो निश्चित संकेत चिह्न लगाये जाते है, उन्हें विराम–चिह्न कहते है।
वाक्य में विराम–चिह्नों के प्रयोग से भाषा में स्पष्टता और सुन्दरता आ जाती है तथा भाव समझने में भी आसानी होती है। यदि विराम–चिह्नों का यथा स्थान उचित प्रयोग न किया जाये तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
उदाहरण-
रोको, मत जाने दो।
रोको मत, जाने दो।
इस प्रकार विराम–चिह्नों से अर्थ एवं भाव में परिवर्तन हो जाता है। इनका ध्यान रखना आवश्यक है।
विराम चिन्ह –
नाम
विराम चिह्न
अल्प विराम
( , )
अर्द्ध विराम
( ; )
पूर्ण विराम
( । )
प्रश्नवाचक चिह्न
( ? )
विस्मयसूचक चिह्न
( ! )
अवतरण या उद्धरण चिह्न
इकहरा — ( ‘ ’ ),दुहरा — ( “ ” )
योजक चिह्न
( – )
कोष्ठक चिह्न
( ) { } [ ]
विवरण चिह्न
( :– )
लोप चिह्न
( …… )
विस्मरण चिह्न
( ^ )
संक्षेप चिह्न
( . )
निर्देश चिह्न
( – )
तुल्यतासूचक चिह्न
( = )
संकेत चिह्न
( * )
समाप्ति सूचक चिह्न
( – : –)
विराम–चिह्नों का प्रयोग–
अल्प विराम-
अल्प विराम का अर्थ है, थोड़ी देर रुकना या ठहरना। अंग्रेजी में इसे हम ‘कोमा’ कह कर पुकारते है।
वाक्य में जब दो या दो से अधिक समान पदों पदांशो अथवा वाक्यों में संयोजक अव्यय ‘और’ की संभावना हो, वहाँ अल्प विराम का प्रयोग होता है।
उदाहरण-
पदों में—पंकज, लक्ष्मण, राजेश और मोहन ने विद्यालय में प्रवेश किया।
वाक्यों में—मोहन रोज खेल के मैदान में जाता है, खेलता है और वापस अपने घर चला जाता है।
वह काम करता है, क्योंकि वह गरीब है।
आज मैं बहुत थका हूँ, इसलिए जल्दी घर जाऊँगा।
यहाँ अल्प विराम द्वारा पार्थक्य/अलगाव को दिखाया गया है।
जहाँ शब्दों की पुनरावृत्ति की जाए और भावों की अधिकता के कारण उन पर अधिक बल दिया जाए।
उदाहरण-
सुनो, सुनो, वह नाच रही है।
जब कई शब्द जोड़े से आते है, तब प्रत्येक जोड़े के बाद अल्प विराम लगता है।
उदाहरण-
सुख और दुःख, रोना और हँसना,
क्रिया विशेषण वाक्यांशों के साथ,
उदाहरण-
वास्तव में यह बात, यदि सच पूछो तो, मैं भूल ही गया था।
संज्ञा वाक्य के अलावा, मिश्र वाक्य के शेष बड़े उपवाक्यों के बीच में।
उदाहरण-
यह वही पैन है, जिसकी मुझे आवश्यकता है।
चिंता चाहे जैसी भी हो, मनुष्य को जला देती है।
वाक्य के भीतर एक ही प्रकार के शब्दों को अलग करने में।
उदाहरण-
मोहन ने सेब, जामुन, केले आदि खरीदे।
उद्धरण चिह्नों के पहले,
उदाहरण-
वह बोला, “मैं तुम्हेँ नहीं जानता।”
समय सूचक शब्दों को अलग करने में।
उदाहरण-
कल शुक्रवार, दिनांक 18 मार्च से परीक्षाएँ प्रारम्भ होंगी।
पत्र में अभिवादन, समापन के साथ।
उदाहरण-
पूज्य पिताजी,
भवदीय,
मान्यवर ,
अर्द्ध विराम चिह्न-
अर्द्ध विराम का प्रयोग प्रायः विकल्पात्मक रूप में ही होता है। अंग्रेजी में इसे ‘सेमी कॉलन’ कहते है।
जब अल्प विराम से अधिक तथा पूर्ण विराम से कम ठहरना पड़े तो अर्द्ध विराम( ; ) का प्रयोग होता है।
उदाहरण-
बिजली चमकी ; फिर भी वर्षा नहीं हुई
एम. ए. ; एम. एड.
शिक्षक ने मुझसे कहा; तुम पढ़ते नहीं हो।
शिक्षा के क्षेत्र में छात्राएँ बढ़ती गई; छात्र पिछड़ते गए।
एक प्रधान पर आश्रित अनेक उपवाक्यों के बीच में।
उदाहरण-
जब तक हम गरीब है; बलहीन है; दूसरे पर आश्रित है; तब तक हमारा कुछ नहीं हो सकता।
जैसे ही सूर्योदय हुआ; अँधेरा दूर हुआ; पक्षी चहचहाने लगे और मैं प्रातः भ्रमण को चल पड़ा।
पूर्ण विराम (।)-
पूर्ण विराम का अर्थ है पूरी तरह से विराम लेना, अर्थात् जब वाक्य पूर्णतः अपना अर्थ स्पष्ट कर देता है तो पूर्ण विराम का प्रयोग होता है अर्थात जिस चिह्न के प्रयोग करने से वाक्य के पूर्ण हो जाने का ज्ञान होता है, उसे पूर्ण विराम कहते है। हिन्दी में इसका प्रयोग सबसे अधिक होता है। पूर्ण विराम का प्रयोग नीचे उदाहरणों में देखें –
साधारण, मिश्र या संयुक्त वाक्य की समाप्ति पर।
उदाहरण-
अजगर करे ना चाकर, पंछी करें ना काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।
पंछी डाल पर चहचहा रहे थे।
राम स्कूल जाता है।
प्रयाग में गंगा–यमुना का संगम है।
यदि सुरेश पढ़ता, तो अवश्य पास होता।
प्रायः शीर्षक के अन्त में भी पूर्ण विराम का प्रयोग होता है।
उदाहरण-
नारी और वर्तमान भारतीय समाज।
अप्रत्यक्ष प्रश्नवाचक वाक्य के अन्त में पूर्ण विराम लगाया जाता है।
उदाहरण-
उसने मुझे बताया नहीं कि वह कहाँ जा रहा है।
प्रश्नवाचक चिह्न (?)-
प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग प्रश्न सूचक वाक्यों के अन्त में पूर्ण विराम के स्थान पर किया जाता है। इसका प्रयोग निम्न स्थिति में किया जाता है–
क्या बोले, वे चोर है?
क्या वे घर पर नहीं हैं?
कल आप कहाँ थे?
आप शायद यू. पी. के रहने वाले हो?
जहाँ भ्रष्टाचार है, वहाँ ईमानदारी कैसे रहेगी?
इतने लड़के कैसे आ पाएँगे?
विस्मयादिबोधक चिह्न (!)-
जब वाक्य में हर्ष, विषाद, विस्मय, घृणा, आश्चर्य, करुणा, भय आदि भाव व्यक्त किए जाएँ तो वहाँ इस विस्मयादिबोधक चिह्न (!) का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा आदर सूचक शब्दों, पदों और वाक्यों के अन्त में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण-
हर्ष सूचक–
तुम्हारा कल्याण हो !
हे भगवान! अब तो तुम्हारा ही आसरा है।
हाय! अब क्या होगा।
छिः! छिः! कितनी गंदगी है।
शाबाश! तुमने गाँव का नाम रोशन कर दिया।
करुणा सूचक–
हे प्रभु! मेरी रक्षा करो
घृणा सूचक–
इस दुष्ट पर धिक्कार है!
विषाद सूचक–
हाय राम! यह क्या हो गया।
विस्मय सूचक–
सुनो! मोहन पास हो गया।
उद्धरण या अवतरण चिह्न-
जब किसी कथन को ज्यों का त्यों उद्धृत किया जाता है तो उस कथन के दोनों ओर इसका प्रयोग किया जाता है, इसलिए इसे अवतरण चिह्न या उद्धरण चिह्न कहते है। इस चिह्न के दो रूप होते है–
इकहरा उद्धरण ( ‘ ’ )-
जब किसी कवि का उपनाम, पुस्तक का नाम, पत्र–पत्रिका का नाम, लेख या कविता का शीर्षक आदि का उल्लेख करना हो तो इकहरे उद्धरण चिह्न का प्रयोग होता है।
जब किसी व्यक्ति या विद्वान तथा पुस्तक के अवतरण या वाक्य को ज्यों का त्यों उद्धृत किया जाए, तो वहाँ दुहरे उद्धरण चिह्न का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण-
“स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।”—तिलक।
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हेँ आजादी दूँगा।”—सुभाषचन्द्र बोस।
योजक चिह्न (-)
इसे समास चिह्न भी कहते है।अंग्रेजी में प्रयुक्त हाइफन (-) को हिन्दी में योजक चिह्न कहते है। हिन्दी में अधिकतर इस चिह्न (-) के स्थान पर डेश (–) का प्रयोग प्रचलित है। यह चिह्न सामान्यतः दो पदों को जोड़ता है और दोनों को मिलाकर एक समस्त पद बनाता है लेकिन दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व बना रहता है।
कमल-से पैर।
कली-सी कोमलता।
कभी-कभी
खेलते-खेलते
रात-दिन
माता-पिता
दो शब्दों को जोड़ने के लिए तथा द्वन्द्व एवं तत्पुरुष समास में।
उदाहरण-
सुख-दुःख, माता-पिता,।
पुनरुक्त शब्दों के बीच में।
उदाहरण-
धीरे-धीरे, घर -घर, रोज -रोज।
तुलना वाचक सा, सी, से के पहले लगता है।
उदाहरण-
भरत-सा भाई, सीता-सी माता।
शब्दों में लिखी जाने वाली संख्याओं के बीच।
उदाहरण-
एक-चौथाई
कोष्ठक चिह्न ( )-
किसी की बात को और स्पष्ट करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। कोष्ठक में लिखा गया शब्द प्रायः विशेषण होता है।
इस चिह्न का प्रयोग–
वाक्य में प्रयुक्त किसी पद का अर्थ स्पष्ट करने हेतु।
उदाहरण-
आपकी ताकत (शक्ति) को मैं जानता हूँ।
आवेदन-पत्र जमा कराने की तिथि में सात दिन की छूट दी गई है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (भारत के प्रथम राष्ट्रपति) बेहद सादगी पसन्द थे।
नाटक या एकांकी में पात्र के अभिनय के भावों को प्रकट करने के लिए।
उदाहरण-
राम – (हँसते हुए) अच्छा जाइए।
विवरण चिह्न (:–)-
किसी कही हुई बात को स्पष्ट करने के लिए या उसका विवरण प्रस्तुत करने के लिए वाक्य के अंत में इसका प्रयोग होता है। इसे अंग्रेजी में ‘कॉलन एंड डेश’ कहते है।
उदाहरण-
सर्वनाम छः प्रकार के होते हैः- पुरुषवाचक, निजवाचक, सम्बन्धवाचक, निश्चितवाचक, अनिश्चितवाचक, प्रश्नवाचक।
वेद चार हैः- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद।
पुरुषार्थ चार है:– धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
लोप सूचक चिह्न (….)-
जहाँ किसी वाक्य या कथन का कुछ अंश छोड़ दिया जाता है, वहाँ लोप सूचक चिह्न का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण-
तुम मान जाओ वरना……….।
मैं तो परिणाम भोग रहा हूँ, कहीं आप भी……।
विस्मरण चिह्न (^)-
इसे हंस पद या त्रुटिपूरक चिह्न भी कहते है। जब किसी वाक्य या वाक्यांश में कोई शब्द लिखने से छूट जाये तो छूटे हुए शब्द के स्थान के नीचे इस चिह्न का प्रयोग कर छूटे हुए शब्द या अक्षर को ऊपर लिख देते है।
उदाहरण-
मेरा भारत ^ देश है।
मुझे आपसे ^ परामर्श लेना है।
संक्षेप चिह्न या लाघव चिह्न (०)-
किसी बड़े शब्द को संक्षेप में लिखने हेतु उस शब्द का प्रथम अक्षर लिखकर उसके आगे यह चिह्न लगा देते है। प्रसिद्धि के कारण लाघव चिह्न होते हुए भी वह पूर्ण शब्द पढ़ लिया जाता है।
उदाहरण-
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय – रा० उ० मा० वि०।
भारतीय जनता पार्टी = भा० ज० पा०
मास्टर ऑफ आर्ट्स = एम० ए०
प्राध्यापक – प्रा०।
डॉक्टर – डॉ०।
पंडित – पं०।
निर्देशक चिह्न (–)-
यह चिह्न योजक चिह्न (-) से बड़ा होता है। इस चिह्न के दो रूप है–1. (–) 2. (—)। अंग्रेजी में इसे ‘डैश’ कहते है।
महाराज- द्वारपाल! जाओ।
द्वारपाल- जो आज्ञा स्वामी!
उद्धृत वाक्य के पहले।
उदाहरण-
वह बोला –“मैं नहीं जाऊँगा।”
समानाधिकरण शब्दों, वाक्यांशों अथवा वाक्यों के बीच में।
उदाहरण-
आँगन में ज्योत्सना–चाँदनी–छिटकी हुई थी।
तुल्यतासूचक चिह्न (=)-
समानता या बराबरी बताने के लिए या मूल्य अथवा अर्थ का ज्ञान कराने के लिए तुल्यतासूचक चिह्न का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण-
1 लीटर = 1000 मिलीलीटर
वायु = समीर
संकेत चिह्न (*)-
जब कोई महत्त्वपूर्ण बातें बतानी हो तो उसके पहले संकेत चिह्न लगा देते है।
उदाहरण-
स्वास्थ्य सम्बन्धी निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए–
प्रातःकाल उठना चाहिए।
भ्रमण के लिए जाना चाहिए।
समाप्ति सूचक चिह्न या इतिश्री चिह्न (–०–)-
किसी अध्याय या ग्रन्थ की समाप्ति पर इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यह चिह्न कई रूपों में प्रयोग किया जाता है।
दो या दो से अधिक पदों के सार्थक समूह को, जिसका पूरा पूरा अर्थ निकलता है, वाक्य कहते हैं।
उदाहरण : ‘सत्य कड़वा होता है ।’
एक वाक्य है क्योंकि इसका पूरा पूरा अर्थ निकलता है किन्तु ‘सत्य होता कड़वा।’ वाक्य नहीं है क्योंकि इसका अर्थ नहीं निकलता है।
वाक्य की परिभाषा –
दो या दो से अधिक शब्दों के समूह जिसका कोई अर्थ हो उसे वाक्य कहा जाता है। एक सामान्य वाक्य को बनाने के लिए कर्ता, कर्म और क्रिया का इस्तेमाल किया जाता है।
जैसे :-
मनुष्य का कर्म ही उसका धर्म है।
जीत सदैव सत्य की होती है।
वाक्य के भेद –
वाक्य का विभाजन दो आधार पर किया गया है|
रचना के आधार पर
अर्थ के आधार पर
रचना के आधार पर –
साधारण वाक्य
संयुक्त वाक्य
मिश्रित वाक्य
साधारण वाक्य –
ऐसे वाक्य जिन्हें एक ही विधेय और एक ही क्रिया होती है, इन्हें साधारण वाक्य कहा जाता है।
साधारण वाक्य के उदाहरण –
जैसे :-
राहुल पड़ता है।
मैंने भोजन कर लिया।
रीना घर जा रही है।
संयुक्त वाक्य –
जब दो या दो से अधिक साधारण वाक्य समानाधिकरण समुच्चयबोधको से जुड़े होते हैं, तो ऐसे वाक्य को संयुक्त वाक्य कहा जाता है।
संयुक्त वाक्य के उदाहरण –
जैसे :-
राहुल चला गया और गीता आ गई।
मैं जा रहा हूं लेकिन तुम आ रहे हो।
मैंने एक काम कर लिया पर दूसरा काम छोड़ दिया।
मिश्रित वाक्य –
ऐसे वाक्य जिनमें एक वाक्य मुख्य हो और दूसरा वाक्य उस पर आश्रित हो या उपवाक्य हो, तो ऐसे वाक्यों को मिश्रित वाक्य कहा जाता है।
मिश्रित वाक्य के उदाहरण –
जैसे:-
ज्यों ही अध्यापक मैं कक्षा में प्रवेश किया वैसे ही छात्र शांत हो गए।
यदि परिश्रम करोगे तो तुम अवश्य सफल हो जाओगे।
मैं जानता हूं कि तुम्हें क्या अच्छा लगता है।
अर्थ के आधार पर –
अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ भेद होते हैं।
विधानवाचक वाक्य
निषेधवाचक वाक्य
आज्ञावाचक वाक्य
प्रश्नवाचक वाक्य
विस्मयादिबोधक वाक्य
इच्छावाचक वाक्य
संदेहवाचक वाक्य
संकेतवाचक वाक्य
विधानवाचक वाक्य
ऐसे वाक्य जिनमें किसी भी कार्य के होने का या किसी के अस्तित्व का पता चलता है या बोध होता है, उन वाक्य को विधानवाचक वाक्य कहते हैं।
विधानवाचक वाक्य को दूसरे शब्दों में विधि वाचक वाक्य भी कहा जाता है।
विधानवाचक वाक्य के उदाहरण
राजस्थान मेरा राज्य है।
विशाल ने आम खा लिया।
पवन के पिता का नाम किशोर सिंह है।
निषेधवाचक वाक्य
ऐसे वाक्य जिनमें किसी भी कार्य के निषेध का बोध होता है, उन वाक्यों को निषेधवाचक वाक्य कहा जाता है।
निषेधवाचक वाक्य के उदाहरण
राधा आज स्कूल नहीं जाएगी।
आज मैं फिल्म देखने नहीं जाऊंगा।
हम आज कहीं पर भी घूमने नहीं जाएंगे।
आज्ञावाचक वाक्य
वह वाक्य जिनमें आदेश, आज्ञा या अनुमति का पता चलता हो, उन वाक्य को आज्ञा वाचक वाक्य कहा जाता है।
आज्ञावाचाक वाक्य के उदाहरण
कृपया वहां पर बैठ जाइए।
कृपया करके शांति बनाए रखें।
आपको अपनी मदद स्वयं करनी पड़ेगी।
प्रश्नवाचक वाक्य
ऐसे वाक्य जिनमें किसी प्रश्न का बोध हो, उन्हें प्रश्नवाचक वाक्य कहा जाता है। प्रश्नवाचक वाक्य के नाम से ही पता चलता है कि इस वाक्य में प्रश्नों का बोध होने वाला है।
इन वाक्यों के माध्यम से प्रश्न पूछकर वस्तु या किसी अन्य के बारे में जानकारी जानने की कोशिश की जाती है। इसके अलावा इन वाक्यों के पीछे (?) यह चिन्ह लगता है।
प्रश्नवाचक वाक्य के उदाहरण
तुम्हारा कौन सा देश है?
तुम कौन से गांव में रहते हो?
तुम्हारा नाम क्या है?
तुम्हारी बहन क्या काम करती है?
विस्मयादिबोधक वाक्य
जिन वाक्य में आश्चर्य, घृणा, अत्यधिक, खुशी, शौक का बोध होता हो, उन वाक्य को विस्मयादिबोधक वाक्य कहा जाता है। इसके अलावा इन वाक्यों में विस्मय शब्द होते हैं और इन शब्दों के पीछे (!) विस्मयसूचक लगता है और इसी से इन वाक्य की पहचान बनती है। मतलब यह है कि इसी सूचक चिन्ह के आधार पर इन वाक्यों को आसानी से पहचाना जाता है।
विस्मयादिबोधक वाक्य के उदाहरण
ओह! आज दिन कितना ठंडा है।
बल्ले बल्ले! हमें जीत मिल गई।
अरे! तुमयहां कब पहुंचे।
इच्छावाचक वाक्य
वे वाक्य जिसमें हमें वक्ता की कोई इच्छा, आकांक्षा, आशीर्वाद, कामना इत्यादि का पता चलता है, उन वाक्य को इच्छा वाचक वाक्य कहते हैं।
इच्छावाचक वाक्य के उदाहरण
सदा खुश रहो।
दीपावली की आपके परिवार को शुभकामनाएं।
तुम्हारा कल्याण हो।
संदेहवाचक वाक्य
जिन वाक्य में किसी भी प्रकार की संभावना और सदेंह का बोध होता हो, उन वाक्य को संदेहवाचक वाक्य कहा जाता है।
संदेहवाचक वाक्य के उदाहरण
लगता है राम अब ठीक हो गया है।
शायद आज बारिश हो सकती है।
शायद मेरा भाई इस काम के लिए मान गया है।
संकेतवाचक वाक्य
वह वाक्य जिनमें एक क्रिया या दूसरी क्रिया पर पूरी तरह से निर्भर हो, उन वाक्य को संकेतवाचक वाक्य कहा जाता है।
“शब्द के जिस रूप से एक या एक से अधिक का बोध होता है, उसे हिन्दी व्याकरण में ‘वचन’ कहते है।“
वचन की परिभाषा
दूसरे शब्दों में- “संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के जिस रूप से संख्या का बोध हो, उसे ‘वचन’ कहते है अर्थात जिस रूप से किसी व्यक्ति, वस्तु के एक या एक से अधिक होने का पता चलता है, उसे वचन कहते हैं।
जैसे:
लडकी खेलती है।
लडकियाँ खेलती हैं।
फ्रिज में सब्जियाँ रखी हैं।
तालाब में मछलियाँ तैर रही हैं।
माली पौधों को सींच रहा है।
कछुआ खरगोश के पीछे है।
उपर्युक्त वाक्यों में लडकी, फ्रिज, तालाब, बच्चे, माली, कछुआ शब्द उनके एक होने का तथा लडकियाँ, सब्जियाँ, मछलियाँ, पौधे, खरगोश शब्द उनके एक से अधिक होने का ज्ञान करा रहे हैं। अतः यहाँ लडकी, फ्रिज, तालाब, माली, कछुआ एकवचन के शब्द हैं तथा लडकियाँ, सब्जियाँ, मछलियाँ, पौधे, खरगोश बहुवचन के शब्द।
वचन का शाब्दिक अर्थ संख्यावचन होता है। संख्यावचन को ही संक्षेप में वचन कहते हैं। वचन का एक अर्थ कहना भी होता है।
वचन के भेद या वचन के प्रकार
वचन के दो भेद होते हैं:
एकवचन
बहुवचन
एकवचन: संज्ञा के जिस रूप से एक व्यक्ति या एक वस्तु होने का ज्ञान हो, उसे एकवचन कहते है अर्थात जिस शब्द के कारण हमें किसी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी, पदार्थ आदि के एक होने का पता चलता है उसे एकवचन कहते हैं।
बहुवचन: शब्द के जिस रूप से एक से अधिक व्यक्ति या वस्तु होने का ज्ञान हो, उसे बहुवचन कहते है अर्थात जिस शब्द के कारण हमें किसी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी, पदार्थ आदि के एक से अधिक या अनेक होने का पता चलता है उसे बहुवचन कहते हैं।
पुल्लिंग ईकारान्त, उकारान्त और ऊकारान्त शब्द दोनों वचनों में समान रहते है।
जैसे- एक मुनि, दस मुनि, एक डाकू, दस डाकू, एक आदमी, दस आदमी आदि।
बड़प्पन दिखाने के लिए कभी -कभी वक्ता अपने लिए ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ का प्रयोग करता है।
जैसे –
हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं
मालिक ने नौकर से कहा कि हम मीटिंग में जा रहे हैं।
जब गुरूजी घर आये तो वे बहुत खुश थे।
हमे याद नहीं हमने कभी ‘आपसे’ ऐसा कहा था।
व्यवहार में ‘तुम’ के स्थान पर ‘आप’ का प्रयोग करना अच्छा माना जाता है।
जैसे-
आप कहाँ पर गये थे।
आप आइयेगा जरुर, हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी
जातिवाचक संज्ञा का प्रयोग दोनों वचनों में किया जाता है।
जैसे-
कुत्ता भौंक रहा है।
कुत्ते भौंक रहे हैं।
शेर जंगल का राजा है।
बैल के चार पाँव होते हैं।
परन्तु धातुओं का बोध कराने वाली जातिवाचक संज्ञायें एकवचन में ही प्रयुक्त होती है।
जैसे-
सोना बहुत महँगा है।
चाँदी सस्ती है।
उसके पास बहुत धन है।
गुण वाचक और भाववाचक दोनों संज्ञाओं का प्रयोग एकवचन और बहुवचन दोनों में ही किया जाता है।
जैसे-
मैं उनके धोखे से ग्रस्त हूँ।
इन दवाईयों की अनेक खूबियाँ हैं।
डॉ राजेन्द्र प्रसाद की सज्जनता पर सभी मोहित थे।
मैं आपकी विवशता को जानता हूँ।
कुछ शब्द जैसे हर, प्रत्येक, और हर एक का प्रयोग सिर्फ एकवचन में होता है।
जैसे-
हर एक कुआँ का पानी मीठा नही होता।
प्रत्येक व्यक्ति यही कहेगा।
हर इन्सान इस सच को जानता है।
समूहवाचक संज्ञा का प्रयोग केवल एकवचन में ही किया जाता है।
जैसे-
इस देश की बहुसंख्यक जनता अनपढ़ है।
लंगूरों की एक टोली ने बहुत उत्पात मचा रखा है।
ज्यादा समूहों का बोध करने के लिए समूहवाचक संज्ञा का प्रयोग बहुवचन में किया जाता है।
जैसे- विद्यार्थियों की बहुत सी टोलियाँ इधर गई हैं।
एक से ज्यादा अवयवों को इंगित करने वाले शब्दों का प्रयोग बहुवचन में होता है लेकिन अगर उनको एकवचन में प्रयोग करना है तो उनके आगे एक लगा दिया जाता है।
जैसे- आँख, कान, ऊँगली, पैर, दांत, अंगूठा आदि।
उदाहरण-
राधा के दांत चमक रहे थे।
मेरे बाल सफेद हो चुके हैं।
मेरा एक बाल टूट गया।
मेरी एक आँख में खराबी है।
मंजू का एक दांत गिर गया।
करण कारक के शब्द जैसे- जाड़ा, गर्मी, भूख, प्यास आदि को बहुवचन में ही प्रयोग किया जाता है।
जैसे-
बेचारा बन्दर जाड़े से ठिठुर रहा है।
भिखारी भूखे मर रहे हैं।
कभी कभी कुछ एकवचन संज्ञा शब्दों के साथ गुण, लोग, जन, समूह, वृन्द, दल, गण, जाति आदि लगाकर उन शब्दों को बहुवचन में प्रयोग किया जाता है।
जैसे-
छात्रगण बहुत व्यस्त होते हैं।
मजदूर लोग काम कर रहे हैं।
स्त्रीजाति बहुत संघर्ष कर रही है।
एकवचन से बहुवचन बनाने के नियम
विभिक्तिरहित संज्ञाओं के बहुवचन बनाने के नियम-
आकारान्त पुल्लिंग शब्दों में ‘आ’ के स्थान पर ‘ए’ लगाने से-
एकवचन
बहुवचन
जूता
जूते
तारा
तारे
लड़का
लड़के
घोड़ा
घोडे
बेटा
बेटे
मुर्गा
मुर्गे
कपड़ा
कपड़े
बालिका
बालिकाएं
अकारांत स्त्रीलिंग शब्दों में ‘अ’ के स्थान पर ‘ए’ लगाने से-
कवचन
बहुवचन
कलम
कलमें
बात
बातें
रात
रातें
आँख
आखें
पुस्तक
पुस्तकें
सड़क
सड़कें
चप्पल
चप्पलें
जिन स्त्रीलिंग संज्ञाओं के अन्त में ‘या’ आता है, उनमें ‘या’ के ऊपर चन्द्रबिन्दु लगाने से बहुवचन बनता है।
जैसे-
एकवचन
बहुवचन
बिंदिया
बिंदियाँ
चिडिया
चिडियाँ
डिबिया
डिबियाँ
गुडिया
गुडियाँ
चुहिया
चुहियाँ
ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के ‘इ’ या ‘ई’ के स्थान पर ‘इयाँ’ लगाने से-
एकवचन
बहुवचन
तिथि
तिथियाँ
नारी
नारियाँ
गति
गतियाँ
थाली
थालियाँ
आकारांत स्त्रीलिंग एकवचन संज्ञा-शब्दों के अन्त में ‘एँ’ लगाने से बहुवचन बनता है।
जैसे-
एकवचन
बहुवचन
लता
लताएँ
अध्यापिका
अध्यापिकाएँ
कन्या
कन्याएँ
माता
माताएँ
भुजा
भुजाएँ
पत्रिका
पत्रिकाएँ
शाखा
शाखाएँ
कामना
कामनाएँ
कथा
कथाएँ
इकारांत स्त्रीलिंग शब्दों में ‘याँ’ लगाने से-
एकवचन
बहुवचन
जाति
जातियाँ
रीति
रीतियाँ
नदी
नदियाँ
लड़की
लड़कियाँ
उकारान्त व ऊकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के अन्त में ‘एँ’ लगाते है। ‘ऊ’ को ‘उ’ में बदल देते है-
एकवचन
बहुवचन
वस्तु
वस्तुएँ
गौ
गौएँ
बहु
बहुएँ
वधू
वधुएँ
गऊ
गउएँ
संज्ञा के पुंलिंग अथवा स्त्रीलिंग रूपों में ‘गण’ ‘वर्ग’ ‘जन’ ‘लोग’ ‘वृन्द’ ‘दल’ आदि शब्द जोड़कर भी शब्दों का बहुवचन बना देते हैं।
जैसे-
एकवचन
बहुवचन
स्त्री
स्त्रीजन
नारी
नारीवृन्द
अधिकारी
अधिकारीवर्ग
पाठक
पाठकगण
अध्यापक
अध्यापकवृंद
विद्यार्थी
विद्यार्थीगण
आप
आपलोग
श्रोता
श्रोताजन
मित्र
मित्रवर्ग
सेना
सेनादल
गुरु
गुरुजन
गरीब
गरीब लोग
कुछ शब्दों में गुण, वर्ण, भाव आदि शब्द लगाकर बहुवचन बनाया जाता है।
जैसे-
एकवचन
बहुवचन
व्यापारी
व्यापारीगण
मित्र
मित्रवर्ग
सुधी
सुधिजन
विभक्तिसहित संज्ञाओं के बहुवचन बनाने के नियम-
विभक्तियों से युक्त होने पर शब्दों के बहुवचन का रूप बनाने में लिंग के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता।
इसके कुछ सामान्य नियम निम्नलिखित है-
अकारान्त, आकारान्त (संस्कृत-शब्दों को छोड़कर) तथा एकारान्त संज्ञाओं में अन्तिम ‘अ’, ‘आ’ या ‘ए’ के स्थान पर बहुवचन बनाने में ‘ओं’ कर दिया जाता है।
जैसे-
एकवचन
बहुवचन
लडका
लडकों
घर
घरों
गधा
गधों
घोड़ा
घोड़ों
चोर
चोरों
संस्कृत की आकारान्त तथा संस्कृत-हिन्दी की सभी उकारान्त, ऊकारान्त, अकारान्त, औकारान्त संज्ञाओं को बहुवचन का रूप देने के लिए अन्त में ‘ओं’ जोड़ना पड़ता है। उकारान्त शब्दों में ‘ओं’ जोड़ने के पूर्व ‘ऊ’ को ‘उ’ कर दिया जाता है।
एकवचन
बहुवचन
लता
लताओं
साधु
साधुओं
वधू
वधुओं
घर
घरों
जौ
जौओं
सभी इकारान्त और ईकारान्त संज्ञाओं का बहुवचन बनाने के लिए अन्त में ‘यों’ जोड़ा जाता है। ‘इकारान्त’ शब्दों में ‘यों’ जोड़ने के पहले ‘ई’ का इ’ कर दिया जाता है।
जैसे-
एकवचन
बहुवचन
मुनि
मुनियों
गली
गलियों
नदी
नदियों
साड़ी
साड़ियों
श्रीमती
श्रीमतियों
वचन की पहचान
वचन की पहचान संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण अथवा उसमे प्रयुक्त क्रिया के द्वारा होती है.
हिंदी भाषा में आदर प्रकट करने के लिए एकवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग किया जाता है।
जैसे-
गाँधी जी हमारे राष्ट्रपिता हैं।
पिता जी, आप कब आए?
मेरी माता जी मुंबई गई हैं।
शिक्षक पढ़ा रहे हैं।
नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं।
कुछ शब्द सदैव एकवचन में रहते है।
जैसे-
निर्दलीय नेता का चयन जनता द्वारा किया गया।
नल खुला मत छोड़ो, वरना सारा पानी खत्म हो जाएगा।
मुझे बहुत क्रोध आ रहा है।
राजा को सदैव अपनी प्रजा का ख्याल रखना चाहिए।
गाँधी जी सत्य के पुजारी थे।
द्रव्यवाचक, भाववाचक तथा व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ सदैव एकवचन में प्रयुक्त होती है।
जैसे-
चीनी बहुत महँगी हो गई है।
पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।
बुराई की सदैव पराजय होती है।
प्रेम ही पूजा है।
किशन बुद्धिमान है।
कुछ शब्द सदैव बहुवचन में रहते है।
जैसे-
दर्दनाक दृश्य देखकर मेरे तो प्राण ही निकल गए।
आजकल मेरे बाल बहुत टूट रहे हैं।
रवि जब से अफसर बना है, तब से तो उसके दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं।
आजकल हर वस्तु के दाम बढ़ गए हैं।
वचन सम्बन्धी विशेष निर्देश
‘प्रत्येक’ तथा ‘हरएक’ का प्रयोग सदा एकवचन में होता है।
जैसे–
प्रत्येक व्यक्ति यही कहेगा
हरएक कुआँ मीठे जल का नहीं होता।
दूसरी भाषाओँ के तत्सम या तदभव शब्दों का प्रयोग हिन्दी व्याकरण के अनुसार होना चाहिए।
जैसे, अँगरेजी के ‘फुट’ (foot) का बहुवचन ‘फीट’ (feet) होता है किन्तु हिन्दी में इसका प्रयोग इस प्रकार होगा- दो फुट लम्बी दीवार है न कि ‘दो फीट लम्बी दीवार है’।
प्राण, लोग, दर्शन, आँसू, होंठ, दाम, अक्षत इत्यादि शब्दों का प्रयोग हिन्दी में बहुवचन में होता है।
जैसे-
आपके होंठ खुले कि प्राण तृप्त हुए।
आपलोग आये, आर्शीवाद के अक्षत बरसे, दर्शन हुए।
द्रव्यवाचक संज्ञाओं का प्रयोग एकवचन में होता है।
जैसे-
उनके पास बहुत सोना है।
उनका बहुत-सा धन बरबाद हुआ।
न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।
किन्तु, यदि द्रव्य के भित्र-भित्र प्रकारों का बोध हों, तो द्रव्यवाचक संज्ञा बहुवचन में प्रयुक्त होगी।
किसी विशेष स्थान पर प्रसिद्ध हो जाने वाले कथन को ‘लोकोक्ति’ कहते हैं।
जब कोई पूरा कथन किसी प्रसंग विशेष में उद्धत किया जाता है तो लोकोक्ति कहलाता है। इसी को कहावत कहते है।
उदाहरण –
‘उस दिन बात-ही-बात में राम ने कहा, हाँ, मैं अकेला ही कुँआ खोद लूँगा। इन पर सबों ने हँसकर कहा, व्यर्थ बकबक करते हो, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता’। यहाँ ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता’ लोकोक्ति का प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ है ‘एक व्यक्ति के करने से कोई कठिन काम पूरा नहीं होता’।
‘लोकोक्ति’ शब्द ‘लोक + उक्ति’ शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है-लोक में प्रचलित उक्ति या कथन’। संस्कृत में ‘लोकोक्ति’ अलंकार का एक भेद भी है तथा सामान्य अर्थ में लोकोक्ति को ‘कहावत’ कहा जाता है।
चूँकि लोकोक्ति का जन्म व्यक्ति द्वारा न होकर लोक द्वारा होता है अतः लोकोक्ति के रचनाकार का पता नहीं होता। इसलिए अँग्रेजी में इसकी परिभाषा दी गई है-अर्थात लोकोक्ति ऐसी उक्ति है जिसका कोई रचनाकार नहीं होता।
वृहद् हिंदी कोश में लोकोक्ति की परिभाषा इस प्रकार दी गई है-
‘विभिन्न प्रकार के अनुभवों, पौराणिक तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों एवं कथाओं, प्राकृतिक नियमों और लोक विश्वासों आदि पर आधारित चुटीली, सारगर्भित, संक्षिप्त, लोकप्रचलित ऐसी उक्तियों को लोकोक्ति कहते हैं, जिनका प्रयोग किसी बात की पुष्टि, विरोध, सीख तथा भविष्य-कथन आदि के लिए किया जाता है।
‘लोकोक्ति’ के लिए यद्यपि सबसे अधिक मान्य पर्याय ‘कहावत’ ही है पर कुछ विद्वानों की राय है कि ‘कहावत’ शब्द ‘कथावृत्त’ शब्द से विकसित हुआ है अर्थात कथा पर आधारित वृत्त, अतः ‘कहावत’ उन्हीं लोकोक्तियों को कहा जाना चाहिए जिनके मूल में कोई कथा रही हो।
जैसे – ‘नाच न जाने आँगन टेढ़ा’ या ‘अंगूर खट्टे होना’ कथाओं पर आधारित लोकोक्तियाँ हैं। फिर भी आज हिंदी में लोकोक्ति तथा ‘कहावत’ शब्द परस्पर समानार्थी शब्दों के रूप में ही प्रचलित हो गए हैं।
लोकोक्ति किसी घटना पर आधारित होती है। इसके प्रयोग में कोई परिवर्तन नहीं होता है। ये भाषा के सौन्दर्य में वृद्धि करती है। लोकोक्ति के पीछे कोई कहानी या घटना होती है। उससे निकली बात बाद में लोगों की जुबान पर जब चल निकलती है, तब ‘लोकोक्ति’ हो जाती है।
लोकोक्ति : प्रमुख अभिलक्षण
लोकोक्तियाँ ऐसे कथन या वाक्य हैं जिनके स्वरूप में समय के अंतराल के बाद भी परिवर्तन नहीं होता और न ही लोकोक्ति व्याकरण के नियमों से प्रभावित होती है। अर्थात लिंग, वचन, काल आदि का प्रभाव लोकोक्ति पर नहीं पड़ता। इसके विपरीत मुहावरों की संरचना में परिवर्तन देखे जा सकते हैं।
उदाहरणके लिए ‘अपना-सा मुँह लेकर रह जाना’ मुहावरे की संरचना लिंग, वचन आदि व्याकरणिक कोटि से प्रभावित होती है
जैसे –
लड़का अपना सा मुँह लेकर रह गया।
लड़की अपना-सा मुँह लेकर रह गई।
जबकि लोकोक्ति में ऐसा नहीं होता। उदाहरण के लिए ‘यह मुँह मसूर की दाल’ लोकोक्ति का प्रयोग प्रत्येक स्थिति में यथावत बना रहता है
जैसे –
है तो चपरासी पर कहता है कि लंबी गाड़ी खरीदूँगा। यह मुँह और मसूर की दाल।
लोकोक्ति एक स्वतः पूर्ण रचना है अतः यह एक पूरे कथन के रूप में सामने आती है। भले ही लोकोक्ति वाक्य संरचना के सभी नियमों को पूरा न करे पर अपने में वह एक पूर्ण उक्ति होती है जैसे – ‘जाको राखे साइयाँ, मारि सके न कोय’।
लोकोक्ति एक संक्षिप्त रचना है। लोकोक्ति अपने में पूर्ण होने के साथ-साथ संक्षिप्त भी होती है। आप लोकोक्ति में से एक शब्द भी इधर-उधर नहीं कर सकते। इसलिए लोकोक्तियों को विद्वानों ने ‘गागर में सागर’ भरने वाली उक्तियाँ कहा है।
लोकोक्ति सारगर्भित एवं साभिप्राय होती है। इन्हीं गुणों के कारण लोकोक्तियाँ लोक प्रचलित होती हैं।
लोकोक्तियाँ जीवन अनुभवों पर आधारित होती है तथा ये जीवन-अनुभव देश काल की सीमाओं से मुक्त होते हैं। जीवन के जो अनुभव भारतीय समाज में रहने वाले व्यक्ति को होते हैं वे ही अनुभव योरोपीय समाज में रहने वाले व्यक्ति को भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए निम्नलिखित लोकोक्तियों में अनुभूति लगभग समान है-
एक पंथ दो काज
नया नौ दिन पुराना सौ दिन
लोकोक्ति का एक और प्रमुख गुण है उनकी सजीवता। इसलिए वे आम आदमी की जुबान पर चढ़ी होती है।
लोकोक्ति जीवन के किसी-न-किसी सत्य को उद्घाटित करती है जिससे समाज का हर व्यक्ति परिचित होता है।
सामाजिक मान्यताओं एवं विश्वासों से जुड़े होने के कारण अधिकांश लोकोक्तियाँ लोकप्रिय होती है।
चुटीलापन भी लोकोक्ति की प्रमुख विशेषता है। उनमें एक पैनापन होता है। इसलिए व्यक्ति अपनी बात की पुष्टि के लिए लोकोक्ति का सहारा लेता है।
मुहावरा और लोकोक्ति में अंतर
मुहावरे
लोकोक्तियाँ
मुहावरे वाक्यांश होते हैं, पूर्ण वाक्य नहीं; जैसे- अपना उल्लू सीधा करना, कलम तोड़ना आदि। जब वाक्य में इनका प्रयोग होता तब ये संरचनागत पूर्णता प्राप्त करती है।
लोकोक्तियाँ पूर्ण वाक्य होती हैं। इनमें कुछ घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता। भाषा में प्रयोग की दृष्टि से विद्यमान रहती है; जैसे- चार दिन की चाँदनी फेर अँधेरी रात।
मुहावरा वाक्य का अंश होता है, इसलिए उनका स्वतंत्र प्रयोग संभव नहीं है; उनका प्रयोग वाक्यों के अंतर्गत ही संभव है।
लोकोक्ति एक पूरे वाक्य के रूप में होती है, इसलिए उनका स्वतंत्र प्रयोग संभव है।
मुहावरे शब्दों के लाक्षणिक या व्यंजनात्मक प्रयोग हैं।
लोकोक्तियाँ वाक्यों के लाक्षणिक या व्यंजनात्मक प्रयोग हैं।
वाक्य में प्रयुक्त होने के बाद मुहावरों के रूप में लिंग, वचन, काल आदि व्याकरणिक कोटियों के कारण परिवर्तन होता है; जैसे- आँखें पथरा जाना। प्रयोग- पति का इंतजार करते-करते माला की आँखें पथरा गयीं।
लोकोक्तियों में प्रयोग के बाद में कोई परिवर्तन नहीं होता; जैसे- अधजल गगरी छलकत जाए। प्रयोग- वह अपनी योग्यता की डींगे मारता रहता है जबकि वह कितना योग्य है सब जानते हैं। उसके लिए तो यही कहावत उपयुक्त है कि ‘अधजल गगरी छलकत जाए।
मुहावरों का अंत प्रायः इनफीनीटिव ‘ना’ युक्त क्रियाओं के साथ होता है; जैसे- हवा हो जाना, होश उड़ जाना, सिर पर चढ़ना, हाथ फैलाना आदि।
लोकोक्तियों के लिए यह शर्त जरूरी नहीं है। चूँकि लोकोक्तियाँ स्वतः पूर्ण वाक्य हैं अतः उनका अंत क्रिया के किसी भी रूप से हो सकता है; जैसे- अधजल गगरी छलकत जाए, अंधी पीसे कुत्ता खाए, आ बैल मुझे मार, इस हाथ दे, उस हाथ ले, अकेली मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है।
मुहावरे किसी स्थिति या क्रिया की ओर संकेत करते हैं; जैसे हाथ मलना, मुँह फुलाना?
लोकोक्तियाँ जीवन के भोगे हुए यथार्थ को व्यंजित करती हैं; जैसे- न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी, ओस चाटे से प्यास नहीं बुझती, नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
मुहावरे किसी क्रिया को पूरा करने का काम करते हैं।
लोकोक्ति का प्रयोग किसी कथन के खंडन या मंडन में प्रयुक्त किया जाता है।
मुहावरों से निकलने वाला अर्थ लक्ष्यार्थ होता है जो लक्षणा शक्ति से निकलता है।
लोकोक्तियों के अर्थ व्यंजना शक्ति से निकलने के कारण व्यंग्यार्थ के स्तर के होते हैं।
मुहावरे ‘तर्क’ पर आधारित नहीं होते अतः उनके वाच्यार्थ या मुख्यार्थ को स्वीकार नहीं किया जा सकता; जैसे- ओखली में सिर देना, घाव पर नमक छिड़कना, छाती पर मूँग दलना।
लोकोक्तियाँ प्रायः तर्कपूर्ण उक्तियाँ होती हैं। कुछ लोकोक्तियाँ तर्कशून्य भी हो सकती हैं; जैसे- तर्कपूर्ण : (i) काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती। (ii) एक हाथ से ताली नहीं बजती। (iii) आम के आम गुठलियों के दाम। तर्कशून्य : (i) छछूंदर के सिर में चमेली का तेल।
मुहावरे अतिशय पूर्ण नहीं होते।
लोकोक्तियाँ अतिशयोक्तियाँ बन जाती हैं।
लोकोक्तियाँ के उदाहरण
(अ)
अन्धों में काना राजा= (मूर्खो में कुछ पढ़ा-लिखा व्यक्ति)
प्रयोग :- मेरे गाँव में कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति तो है नही इसलिए गाँव वाले पण्डित अनोखेराम को ही सब कुछ समझते हैं। ठीक ही कहा गया है, अन्धों में काना राजा।
अन्धा क्या चाहे दो आँखें = (मनचाही बात हो जाना)
प्रयोग :- अभी मैं विद्यालय से अवकाश लेने की सोच ही रही थी कि मेघा ने मुझे बताया कि कल विद्यालय में अवकाश है। यह तो वही हुआ- अन्धा क्या चाहे दो आँखें।
अस्सी की आमद, चौरासी खर्च = (आमदनी से अधिक खर्च)
प्रयोग :- राजू के तो अस्सी की आमद, चौरासी खर्च हैं। इसलिए उसके वेतन में घर का खर्च नहीं चलता।
(आ)
आ बैल मुझे मार = (स्वयं मुसीबत मोल लेना)
प्रयोग :- लोग तुम्हारी जान के पीछे पड़े हुए हैं और तुम आधी-आधी रात तक अकेले बाहर घूमते रहते हो। यह तो वही बात हुई- आ बैल मुझे मार।
आँखों के अन्धे नाम नयनसुख = (गुण के विरुद्ध नाम होना)
प्रयोग :- उसका नाम तो करोड़ीमल है परन्तु वह पैसे-पैसे के लिए मारा-मारा फिरता है। इसे कहते है- आँखों के अन्धे नाम नयनसुख।
आम के आम गुठलियों के दाम = (अधिक लाभ)
प्रयोग :- सब प्रकार की पुस्तकें ‘साहित्य भवन’ से खरीदें और पास होने पर आधे दामों पर बेचें। ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ इसी को कहते हैं।
(इ, ई)
इतनी-सी जान, गज भर की जुबान = (बहुत बढ़-बढ़ कर बातें करना)
प्रयोग :- चार साल की बच्ची जब बड़ी-बड़ी बातें करने लगी तो दादाजी बोले- इतनी सी जान, गज भर की जुबान।
इधर कुआँ और उधर खाई = (हर तरफ विपत्ति होना)
प्रयोग :- न बोलने में भी बुराई है और बोलने में भी; ऐसे में मेरे सामने इधर कुआँ और उधर खाई है।
ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया = (ईश्वर की बातें विचित्र हैं।)
प्रयोग :- कई बेचारे फुटपाथ पर ही रातें गुजारते हैं और कई भव्य बंगलों में आनन्द करते हैं। सच है ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया।
ईंट की लेनी, पत्थर की देनी = (बदला चुकाना)
प्रयोग :- अशोक ईंट की लेनी, पत्थर की देनी वाले स्वभाव का आदमी है।
(उ)
उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे = (अपराधी निरपराध को डाँटे)
प्रयोग :- एक तो पूरे वर्ष पढ़ाई नहीं की और अब परीक्षा में कम अंक आने पर अध्यापिका को दोष दे रहे हैं। यह तो वही बात हो गई- उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।
उसी का जूता उसी का सिर = (किसी को उसी की युक्ति या चाल से बेवकूफ बनाना)
प्रयोग :- जब चोर पुलिस की बेल्ट से पुलिस को ही मारने लगा तो सबने यही कहा कि ये तो उसी का जूता उसी का सिर वाली बात हो गई।
(ऊ)
ऊँट के मुँह में जीरा = (जरूरत के अनुसार चीज न होना)
प्रयोग :- विद्यालय के ट्रिप में जाने के लिए 2,500 रुपये चाहिए थे, परंतु पिता जी ने 1,000 रुपये ही दिए। यह तो ऊँट के मुँह में जीरे वाली बात हुई।
ऊधो का लेना न माधो का देना = (केवल अपने काम से काम रखना)
प्रयोग :- प्रोफेसर साहब तो बस अध्ययन और अध्यापन में लगे रहते हैं। गुटबन्दी से उन्हें कोई लेना-देना नहीं- ऊधो का लेना न माधो का देना।
(ए)
एक पन्थ दो काज = (एक काम से दूसरा काम हो जाना)
प्रयोग :- दिल्ली जाने से एक पन्थ दो काज होंगे। कवि-सम्मेलन में कविता-पाठ भी करेंगे और साथ ही वहाँ की ऐतिहासिक इमारतों को भी देखेंगे।
एक हाथ से ताली नहीं बजती = (झगड़ा एक ओर से नहीं होता।)
प्रयोग :- आपसी लड़ाई में राम और श्याम-दोनों स्वयं को निर्दोष बता रहे थे, परंतु यह सही नहीं हो सकता, क्योंकि ताली एक हाथ से नहीं बजती।
एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा = (कुटिल स्वभाव वाले मनुष्य बुरी संगत में पड़ कर और बिगड़ जाते है।)
प्रयोग :- कालू तो पहले से ही बिगड़ा हुआ था अब उसने आवारा लोगों का साथ और कर लिया है- एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा।
एक तो चोरी, दूसरे सीनाज़ोरी = (गलत काम करके आँख दिखाना)
प्रयोग :- एक तो उसने मेरी किताब चुरा ली, ऊपर से आँखें दिखा रहा है। इसी को कहते हैं- ‘एक तो चोरी, दूसरे सीनाज़ोरी।’
(ऐ)
ऐरा-गैरा नत्थू खैरा = (मामूली आदमी)
प्रयोग :- कोई ‘ऐरा-गैरा नत्थू खैरा’ महेश के ऑंफिस के अन्दर नहीं जा सकता।
ऐरे गैरे पंच कल्याण = (ऐसे लोग जिनके कहीं कोई इज्जत न हो)
प्रयोग :- पंचों की सभा में ऐरे गैरे पंच कल्याण का क्या काम!
(ओ)
ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर = (कष्ट सहने के लिए तैयार व्यक्ति को कष्ट का डर नहीं रहता।)
प्रयोग :- बेचारी शांति देवी ने जब ओखली में सिर दे ही दिया है तब मूसलों से डरकर भी क्या कर लेगी!
ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती = (किसी को इतनी कम चीज मिलना कि उससे उसकी तृप्ति न हो।)
प्रयोग :- किसी के देने से कब तक गुजर होगी, तुम्हें यह जानना चाहिए कि ‘ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती’।
(क)
कोयले की दलाली में मुँह काला = (बुरों के साथ बुराई ही मिलती है)
प्रयोग :- तुम्हें हजार बार समझाया चोरी मत करो, एक दिन पकड़े जाओगे। अब भुगतो। कोयले की दलाली में हमेशा मुँह काला ही होता है।
कहीं की ईट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा = (बेमेल वस्तुओं को एक जगह एकत्र करना)
प्रयोग :- शर्मा जी ने ऐसी किताब लिखी है कि किताब में कहीं कुछ मेल नहीं खाता। उन्होंने तो वही हाल किया है- ‘कहीं की ईट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा’।
काला अक्षर भैंस बराबर = (बिल्कुल अनपढ़ व्यक्ति)
प्रयोग :- कालू तो अख़बार भी नहीं पढ़ सकता, वह तो काला अक्षर भैंस बराबर है।
प्रयोग :- बच्चा बेचारा दिन भर लाल बत्ती पर अख़बार बेचता रहा, परंतु उसे कमाई मात्र बीस रुपये की हुई। यह वही बात है- खोदा पहाड़ निकली चुहिया।
खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे = (किसी बात पर लज्जित होकर क्रोध करना)
प्रयोग :- दस लोगों के सामने जब मोहन की बात किसी ने नहीं सुनी, तो उसकी हालत उसी तरह हो गई ; जैसे खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे।
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है = एक को देखकर दूसरा बालक या व्यक्ति भी बिगड़ जाता है।
प्रयोग :- रोहन अन्य बालकों को देखकर बिगड़ गया है। सच ही है- ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है’।
(ग)
गागर में सागर भरना = (कम शब्दों में बहुत कुछ कहना)
प्रयोग :- बिहारी कवि ने अपने दोहों में गागर में सागर भर दिया है।
गया वक्त फिर हाथ नहीं आता = (जो समय बीत जाता है, वह वापस नहीं आता)
प्रयोग :- अध्यापक ने बताया कि हमें अपना समय व्यर्थ नहीं खोना चाहिए, क्योंकि गया वक्त फिर हाथ नहीं आता।
(घ)
घर में नहीं दाने, बुढ़िया चली भुनाने = (झूठा दिखावा करना)
प्रयोग :- रामू निर्धन है फिर भी ऐसा बन-ठन कर निकलता है जैसे लखपति हो। ऐसे ही लोगों के लिए कहते हैं- ‘घर में नहीं दाने, बुढ़िया चली भुनाने’।
घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या = (मेहनताना या पारिश्रमिक माँगने में संकोच नहीं करना चाहिए।)
प्रयोग :- भाई, मैंने दो महीने काम किया है। संकोच में तनख्वाह न माँगू तो क्या करूँ- ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या’
(च)
चोर पर मोर = (एक दूसरे से ज्यादा धूर्त)
प्रयोग :- मृदुल और करन दोनों को कम मत समझो। ये दोनों ही चोर पर मोर हैं।
चमड़ी जाय, पर दमड़ी न जाय = (अत्यधिक कंजूसी करना)
प्रयोग :- जेबकतरे ने सौ रुपए उड़ा लिए तो कुछ नहीं, पर मुन्ना ने मुझे पाँच रुपए उधार नहीं दिए। ये तो वही बात हुई कि चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाय।
(छ)
छोटा मुँह बड़ी बात = (कम उम्र या अनुभव वाले मनुष्य का लम्बी-चौड़ी बातें करना)
प्रयोग :- किशन तो हमेशा छोटा मुँह बड़ी बात करता है।
(ज)
जो करेगा, सो भरेगा = (जो जैसा काम करेगा वैसा फल पाएगा)
प्रयोग :- छोड़ो मित्र, जो करेगा, सो भरेगा, तुम्हें क्या
(झ)
झूठे का मुँह काला, सच्चे का बोलबाला = (अंत में सच्चे आदमी की ही जीत होती है।)
प्रयोग :- किसी आदमी को झूठ नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि- ‘झूठे का मुँह काला, सच्चे का बोलबाला’ होता है।
(ट)
टके की हांडी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई = (थोड़े ही खर्च में किसी के चरित्र को जान लेना)
प्रयोग :- जब रमेश ने पैसे वापस नहीं किए तो सोहन ने सोच लिया कि अब वह उसे दोबारा उधार नहीं देगा- ‘टके की हांडी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई’।
(ठ)
ठेस लगे, बुद्धि बढ़े = (हानि मनुष्य को बुद्धिमान बनाती है।)
प्रयोग :- राजेश ने व्यापार में बहुत क्षति उठाई है, तब वह सफल हुआ है। ठीक ही कहते हैं- ‘ठेस लगे, बुद्धि बढ़े’।
(ड)
डरा सो मरा = (डरने वाला व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता)
प्रयोग :- रामू उस जेबकतरे के चाकू से डर गया, वर्ना वह जेबकतरा पकड़ा जाता। कहते भी हैं- ‘जो डरा सो मरा’।
(ढ)
ढाक के वही तीन पात = (परिणाम कुछ नहीं निकलना, बात वहीं की वहीं रहना)
प्रयोग :- अध्यापक ने रामू को इतना समझाया कि वह सिगरेट पीना छोड़ दे, पर परिणाम ‘ढाक के वही तीन पात’, और एक दिन रामू के मुँह में कैंसर हो गया।
(त)
तेल देखो, तेल की धार देखो = (किसी कार्य का परिणाम देखने की बात करना)
प्रयोग :- रामू बोला- ‘तेल देखो, तेल की धार देखो’, घबराते क्यों हो
(थ)
थका ऊँट सराय तके = (दिनभर काम करने के बाद मजदूर को घर जाने की सूझती है।)
प्रयोग :- दिनभर काम करने के बादराजू घर जाने के लिए चलने लगा। ठीक ही है-‘थका ऊँट सराय तके’।
(फ)
फूंक दो तो उड़ जाय = (बहुत दुबला-पतला आदमी)
प्रयोग :- रमा तो ऐसी दुबली-पतली थी कि ‘फूंक दो तो उड़ जाय’।
(ब)
बहती गंगा में हाथ धोना = (अवसर का लाभ उठाना)
प्रयोग :- सत्संग के लिए काफी लोग एकत्रित हुए थे। ऐसे में क्षेत्रीय नेता भी वहाँ आ गए और उन्होंने अपना लंबा-चौड़ा भाषण दे डाला। इसे कहते हैं- बहती गंगा में हाथ धोना।
(भ)
भरी मुट्ठी सवा लाख की = (भेद न खुलने पर इज्जत बनी रहती है।)
प्रयोग :- रामपाल को वेतन बहुत कम मिलता है, लेकिन वह किसी को कुछ नहीं बताता। सही बात है- ‘भरी मुट्ठी सवा लाख की’ होती है।
(म)
मुँह में राम बगल में छुरी = (बाहर से मित्रता पर भीतर से बैर)
प्रयोग :- सुरभि और प्रतिभा दोनों आपस में अच्छी सहेलियाँ बनती हैं, परंतु मौका पाते ही एक-दूसरे की बुराई करना शुरू कर देती हैं। यह तो वही बात हुई- मुँह में राम बगल में छुरी।
मान न मान मैं तेरा मेहामन = (जबरदस्ती किसी के गले पड़ना)
प्रयोग :- जब एक अजनबी जबरदस्ती रामू से आत्मीयता दिखाने लगा तो रामू बोला- ‘मान न मान मैं तेरा मेहामन’।
मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है = (मनुष्य को अपने नाती-पोते अपने बेटे-बेटियों से अधिक प्रिय होते हैं)
प्रयोग :- सेठ अमरनाथ ने अपने बेटे के पालन-पोषण पर उतना खर्च नहीं किया जितना अपने पोते पर करता है। सच ही कहा गया है कि मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है।
(य)
यहाँ परिन्दा भी पर नहीं मार सकता = (जहाँ कोई आ-जा न सके)
प्रयोग :- मेरे ऑफिस में इतना सख्त पहरा है कि यहाँ कोई परिन्दा भी पर नहीं मार सकता।
यथा राजा, तथा प्रजाा = (जैसा स्वामी वैसा ही सेवक)
प्रयोग :- जिस गाँव का मुखिया ही भ्रष्ट और पाखंडी हो उस गाँव के लोग भले कैसे हो सकते हैं। वे भी वही सब करते हैं जो उनका मुखिया करता है। किसी ने ठीक ही तो कहा है कि यथा राजा, तथा प्रजा।
(ल)
लगा तो तीर, नहीं तो तुक्का = (काम बन जाए तो अच्छा है, नहीं बने तो कोई बात नहीं)
प्रयोग :- देखा-देखी रहीम ने भी आज लॉटरी खरीद ही ली। ‘लगा तो तीर, नहीं तो तुक्का’।
लाख जाए, पर साख न जाए = (धन व्यय हो जाए तो कोई बात नहीं, पर सम्मान बना रहना चाहिए)
प्रयोग :- विवेक बात का पक्का है, उसका एक ही सिद्धांत है-‘लाख जाए, पर साख न जाए’।
प्रत्येक व्यक्ति दूसरों पर अपने मन के भावों को प्रकट करने के लिए वाक्य बोलता है। जो व्यक्ति बोलने की कला भली-भाँति जानता है, उसके वाक्यों का दूसरों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। बोलने का उत्कृष्ट रूप भाषण या व्याख्यान होता है। इसके लिए अध्ययन और मनन तथा अभ्यास की आवश्यकता होती है।
लिखना बोलने से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। बहुत सारे व्यक्ति अच्छा बोल तो लेते हैं लेकिन अच्छा लिख नहीं पाते। कुछ में दोनों योग्यताएँ होती हैं। लिखने में विशेष कुशलता हासिल करने के लिए अध्ययन, निरीक्षण, भ्रमण, मनन तथा अभ्यास की महती आवश्यकता होती है।
लेखन कला के मूलतः बारह गुण होते हैं
शुद्धता
सुन्दर लेख के लिए पहली शर्त है – शुद्धता। हमें न सिर्फ वर्तनी की शुद्धता, बल्कि वाक्यों की शुद्धता पर भी ध्यान देना चाहिए। यदि उच्चारण करते समय ही ह्रस्व-दीर्ध, संयुक्त-असंयुक्त, शिरोरेखा, मात्रा आदि का ध्यान रखा जाय तो लिखने और बोलने में काफी सुगमता होती है।
हमें स्त्रीलिंग-पुंल्लिंग, वचन, कारक-चिह्नों एवं विराम-चिह्नों को ध्यान में रखते हुए लिखना चाहिए। हमें कर्त्ता, कर्म एवं क्रिया के क्रम पर विशेष ध्यान देना चाहिए, साथ ही हर संज्ञा के लिए उपयुक्त विशेषण और क्रिया के लिए क्रियाविशेषण का प्रयोग करने से वाक्य प्रभावोत्पादक होता है।
मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग उचित स्थानों पर ही करना चाहिए, यत्र-तत्र नहीं। लम्बे वाक्यों में कर्त्ता एवं क्रिया का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
सुलेख
प्रतिदिन के व्यवहार और परीक्षा में विशेषत सुलेख का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। लेख को देखते ही पाठक या परीक्षक के मन में लेखक या परीक्षार्थी के प्रति प्रतिकूल अथवा अनुकूल भाव उत्पन्न हो जाता है। अतएव, आपका लेख सुन्दर, सुस्पष्ट और सुपाठ्य होना चाहिए। सुलेख अभ्यास से बनता है। इसके लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए।
कभी भी अतिशीघ्रता न करें।
हाथ को ढीला न रखें, कलम अथवा पेंसिल को सही रूप से पकड़ें।
सभी अक्षरों के वास्तविक स्वरूप को ही लिखें।
जैसे – ‘उ’ और ‘ड’ में ‘रा’ और ‘ए’, ‘ख’ और ‘रव’ में, ‘क’ और ‘फ’ में ‘क्ष’ और ‘झ’ में, ‘द्य’ और ‘घ’ में, ‘घ’ और ‘ध’ में फर्क समझे।
अपनी सुविधानुसार अक्षरों में एकरूपता लायें। यानी यदि आपके अक्षर बायीं ओर झुकते हैं तो सभी अक्षर बायीं ओर ही हों। कुछ बायीं, कुछ दायीं, कुछ सीधे लिखने से लिखावट भद्दी होती है।
खुरदरे और स्याही फैलनेवाले कागज पर मत लिखें।
मौलिकता
‘मौलिकता’ का अर्थ है- आपकी अपनी चीज या सोच। किसी के भावों की कल्पनाओं की या शैली की पूरी नकल नहीं करनी चाहिए। आपकी रचनाओं में नवीनता, अपनापन, अपनी शैली और अपनी छाप जरूर हो। मौलिक रचना लिखने के लिए सतत अध्ययन, मनन, चिन्तन और अभ्यास की जरूरत पड़ती है।
सरलता
सरलता किसी लेख का विशेष गुण है। भाषा के कठिन होने और शैली के बोझिल होने से भाव की स्पष्टता जाती रहती है। प्रयास यह होना चाहिए कि आपकी भाषा अत्यन्त सरल, बोधगम्य और रोचक हो। कठिन शब्दों के प्रयोग से अशुद्धियों की ज्यादा संभावना होती है और भाषा भी बनावटी हो जाती है।
एक प्रोफेसर ने एक सामान्य घटना का जिक्र इस प्रकार किया-
”श्रीमन्त, मेरे द्विचक्र का अग्रचक्र दुश्चक्र में पड़कर वक्र हो गया।” अर्थात महाशय, मेरी साइकिल का अगला पहिया खड्ड में पड़ने के कारण टेढ़ा हो गया। आप स्वयं कल्पना करें उपर्युक्त वाक्य कितना अस्पष्ट है और बात कितनी सरल-सी है। हमें इस तरह की रचनाओं से बचना चाहिए। इसी अस्पष्टता के कारण संस्कृत जो कभी जन-जन की भषा थी वह आम जनता से कटती चली गई और आज मरणासन्न स्थिति को प्राप्त हुई है।
मधुरता
आपकी भाषा और शैली माधुर्ययुक्त होनी चाहिए। मधुरता सहज ही पाठकों को आकर्षित कर लेती है। अत्यधिक संयुक्ताक्षरों, सामासिक पदों या संधिपदों के प्रयोग से बचना चाहिए। हाँ, यदि आपकी शैली मुहावरेदार होती है तो निश्चित रूप से वह पाठकों को आकृष्ट करेगी। ट, ठ, ड, ढ़, ण, क्ष, त्र-
जैसे वर्ण कटु वर्ण कहलाते हैं। इन वर्णों से युक्त पदों के प्रयोग से लेख की मधुरता नष्ट होती है। हाँ, वीररस-प्रधान रचनाओं में संयुक्ताक्षरों एवं टवर्गीय व्यंजनों का प्रयोग अच्छा लगता है।
वीररस-प्रधान कुछ पंक्तियाँ देखें
डग-डग-डग-डग रण के डंके,
मारु के साथ भयद बाजे।
टप-टप-टप घोड़े कूद पड़े,
कट-कट मतंग के रद बाजे।।
शर-दण्ड चले, कोदण्ड चले,
कर की कहारियाँ तरज उठीं।
खूनी बरछे-भाले चमके,
पर्वत पर तोपें गरज उठीं।।
घनघोर घटा के बीच चमक,
तड़-तड़ नभ पर तड़िता तड़की।
झन-झन असि की झनकार इधर
कायर-दल की छाती धड़की।।
रोचकता
चाहे कैसी भी भाषा हो, यदि वह रोचक होगी, तो चाव से पढ़ी जाएगी और अपना पूरा प्रभाव छोड़ेगी। अरोचक लेख अच्छा नहीं माना जाता है। इसलिए पत्र, कहानी, निबंध की भाषा रोचक होनी चाहिए तभी पढ़नेवाले आद्यन्त पढ़ सकेंगे। रोचकता उत्पन्न करने के लिए कहीं-कहीं हास्य का पुट भी देना चाहिए किन्तु फूहड़ शब्दों या अश्लील बातों को लिखने से परहेज करना चाहिए। यही कारण है कि काका हाथरसी के अच्छे खासे व्यंग्य भी अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाए। एक रोचक लेख का अंश देखें-
”आलस्य अकर्मण्यता का पिता, पाप का सहचर और रोगों का हेतु है। जीवन के भीतर विनाश के कीटाणु बनकर जब यह प्रवेश कर जाता है तो आसानी से इसे बाहर नहीं निकाला जा सकता। यह ऐसा राजरोग है जिसका रोगी कभी नहीं सँभलता। यह आधि भी है और व्याधि भी।”
”समय बदला। शिक्षा की पद्धति बदली। राजपूतों के शौर्यकाल में शिक्षा का एक ही क्षेत्र था- अस्त्र-शस्त्रों की झंकार। मुगलों के समय तक संस्कृति के पवित्र आदर्श सर्वथा विलुप्त हो गए थे और विशाल वासना की सेज पर शिक्षा की संस्कृति को विवश भाव से शिथिल हो जाना पड़ा। अंग्रेजों ने अपने ढंग से इसकी नकेल थामी और उसे अपने स्वार्थ के अनुकूल घुमाना शुरू और आज की शिक्षा भी उसी विरासत को ढोती नजर आ रही है।”
लाघव
संक्षिप्तता अच्छी रचना की विशेष पहचान है। साधारण लेखक एक सामान्य विचार को भी बहुत-सारे वाक्य लिखकर व्यक्त कर पाता है तो उत्तम लेखक कम-से-कम वाक्यों का प्रयोग बड़ी ही आसानी से उसी बात को अभिव्यक्त कर डालता है। लेकिन इस बात का भी सदैव ख्याल रखना चाहिए कि हम लाघव के दीवाने होकर कहीं भावों का ही गला तो नहीं घोंट रहे हैं। लेख या किसी रचना को कई अनुच्छेदों (Paragraph) में बाँटकर लिखना चाहिए। वाक्य तथा अनुच्छेद नपे-तुले होने चाहिए।
कल्पना
भावों या विचारों की स्वतंत्र उड़ान को कल्पना कहते हैं। कल्पना यथार्थपरक होनी चाहिए। बाबू देवकीनंदन खत्री-जैसी अति कल्पना मनोरंजन भले ही करे, यथार्थ से कोसों दूर हो जाती है। ऐसी रचनाओं से पाठकों का मार्गदर्शन नहीं हो पाता है। परन्तु, कई बातें प्रत्यक्ष नहीं होतीं, कल्पनाजन्य होती हैं। कल्पना-शक्ति के अभाव के कारण बहुत-से विद्यार्थी अच्छा लेख नहीं लिख पाते हैं हमें किसी विषय-वस्तु पर लिखने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए।
उसे कई बिन्दुओं में बाँटे।
हर बिन्दु की व्याख्या करें।
एक तरह की तमाम बातों की चर्चा एक अनुच्छेद में करें।
पुनरुक्ति दोष से बचें।
चिन्तन करें यानी अपनी स्मृति पर जोर देकर कुछ क्षण के लिए सोचें कि इससे मिलती-जुलती बातें आपने कहाँ-कहाँ सुनी और पढ़ी हैं।
किसी लेखक, विचारक के कथन (विषय से संबंधित) यदि याद हों तो उन्हें ‘कोट’ करें बिल्कुल स्वतंत्र अनुच्छेद मानकर उद्धरण चिह्न के साथ।
चमत्कार
अलंकारों, मुहावरों आदि के प्रयोगों से भाषा चमत्कारपूर्ण बनती है तथा विस्मयार्थक अव्ययों (जैसे – काश, हाय, वाह, अहा…… आदि) से शुरू करने पर भाषा में जीवंतता आती है। एक बात का ध्यान अवश्य रहे कि अलंकार स्वाभाविक हों। अलंकारों की अधिकता और गूढ़ता से रचना के बिगड़ने का डर भी बना रहता है।
नमूने
अलंकार-विहीन वाक्य :- ज्योति का मुख बहुत ही आकर्षक है। गर्म प्रदेशों के लोगों का रंग बहुत काला होता है। आसमान में काले-काले और घने बादलों को देखकर मोर नाच उठता है।
अलंकार-युक्त वाक्य :- ज्योति का मुख चाँद-सा है। गर्म प्रदेशों के लोगों का रंग तबे को भी मात कर देता है। आसमान में काले-कजरारे उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देख मोर थिरक उठता है।
व्यंग्य या व्यंजना शक्ति
हमारी रचनाओं में कहीं-कहीं व्यंग्यार्थ भी झलकना चाहिए क्योंकि इसके प्रयोग से रचना की उत्कृष्टता बढ़ती है।
घायल सूबेदार जोगिन्दर सिंह ने चीनी सैनिकों से कहा, ”मैं वही सिपाही हूँ, जिसने तुम्हारे- जैसे कई सैनिकों को मौत के घाट उतार दिए थे।”
”मैं वही सिपाही हूँ, जिससे चीनी सिपाहियों की रूहें काँप उठती थीं।”
भावों की प्रबलता
हमारी रचनाओं में भावपक्ष प्रबल होने चाहिए। कारण, भाव भाषा के प्राण होते हैं, भाषा तो मात्र भावों की वाहिका होती है। यदि भाव जोरदार ढंग से न कहा जाय तो भाषा स्वतः स्वादहीन और निष्प्राण हो जाती है। उसमें किसी को उत्साहित या प्रभावित करने की शक्ति नहीं रह पाती है। निम्नलिखित वाक्यों को ध्यानपूर्वक देखें
गरीबों का जीवन भी क्या जीवन है? (प्रबल भाव)
गरीबों का जीवन कुछ नहीं है। (निर्बल भाव)
भारतीय सैनिक बलहीनता तथा कायरता से सख्त नफ़रत करते हैं। (प्रबल भाव)
भारतीय सैनिक बलहीन और कायर नहीं हैं। (निर्बल भाव)
हाय ! सही नहीं जाती ग्रीष्म की उष्णता। (प्रबल भाव)
गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही है। (निर्बल भाव)
विराम चिह्नों का उचित प्रयोग
विराम चिह्नों के उचित स्थानों पर प्रयोग करने के कारण ही ऐसा कहा जाता है कि ‘बेनीपुरी के विराम-चिह्न बोलते है। किस स्थान पर कौन-सा विराम-चिह्न आना चाहिए लिखते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए क्योंकि गलत जगहों पर गलत चिह्नों के लग जाने पर अर्थ का अनर्थ हो जाया करता है।
शब्द के जिस रूप से उसकी जाति (नर, मादा) का बोध होता है, उसे लिंग (Gender in hindi)कहते हैं।
लिंग दो प्रकार के होते हैं –
पुल्लिंग
स्त्रीलिंग
शब्दों के जिस रूप में उनके ’नरत्व’ (पुरुषत्व) का बोध होता है, उसे ’पुल्लिंग ’ तथा शब्दों के जिस रूप से उसके ’स्त्रीत्व’ का बोध होता है, उसे ’स्त्रीलिंग’ कहते हैं |
जैसे –
पुल्लिंग शब्द – लङका, बैल, पेङ, नगर आदि।
स्त्रीलिंग शब्द – गाय, लङकी, लता, नदी आदि।
हिन्दी भाषा में सृष्टि के समस्त पदार्थों को दो ही लिंगों में विभक्त किया गया है।
निर्जीव शब्दों का लिंग निर्धारण कठिन होता है, सजीव शब्दों का लिंग निर्धारण सरलता से हो जाता है।
संस्कृत के पुल्लिंग तथा नपुंसकलिंग शब्द, जो हिन्दी में प्रयुक्त होते हैं, उसी रूप में स्वीकार कर लिए गए हैं, जैसे- तन, मन, धन, देश, जगत् आदि पुल्लिंग तथा सुन्दरता, आशा, लता दिशा जैसे शब्द स्त्रीलिंग है।
पुल्लिंग
हिन्दी में जो शब्द रूप या बनावट के आधार पर पुल्लिंग होते हैं, उनका परिचय इस प्रकार है
सर्वनाम में लिंग भेद नहीं होता, क्योंकि सर्वनाम का लिंग निर्णय ’क्रिया’ के आधार पर होता है।
विशेषण पद प्रायः अपने निकटतम विशेष्य के अनुसार ही स्त्रीलिंग या पुल्लिंग होते हैं – अच्छा लङका, अच्छी बात, काला बछङा, काली गाय, बङा बेटा, बङी बेटी आदि।
क्रिया पदों का लिंग कर्ता के अनुसार होता है, नदी बहती है। झरना बहता है।
कर्ता में विकल्प होने पर क्रिया का लिंग बाद वाले कर्ता के समान होता है, जैसे-राम या सीता गई। वहाँ कुआँ या नदी दिखाई पङेगी।
लिंग – परिवर्तन
पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के कतिपय नियम इस प्रकार हैं –
शब्दान्त ’अ’ को ’आ’ में बदलकर-
छात्र-छात्रा
वृद्ध-वृद्धा
पूज्य-पूज्या
भवदीय-भवदीया
सुत-सुता
अनुज-अनुजा
शब्दान्त ’अ’ को ’ई’ में बदलकर –
देव-देवी
पुत्र -पुत्री
ब्राह्मण-ब्राह्मणी
मेंढक-मेंढकी
गोप-गोपी
दास-दासी
शब्दान्त ’आ’ को ’ई’ में बदलकर-
नाना-नानी
बेटा-बेटी
लङका-लङकी
रस्सा-रस्सी
घोङा-घोङी
चाचा-चाची
शब्दान्त ’आ’ को ’इया’ में बदलकर –
बूढ़ा-बुढ़िया
चूहा-चुहिया
कुत्ता-कुतिया
डिब्बा-डिबिया
बेटा-बेटिया
लोटा-लुटिया
शब्दान्त प्रत्यय ’अक’ को ’इका’ में बदलकर –
बालक-बालिका
लेखक-लेखिका
पाठक-पाठिका
गायक-गायिका
नायक-नायिका
’आनी’ प्रत्यय लगाकर –
देवर-देवरानी
चौधरी -चौधरानी
भव-भवानी
जेठ-जेठानी
सेठ-सेठानी
’नी’ प्रत्यय लगाकर –
शेर-शेरनी
मोर-मोरनी
सिंह-सिंहनी
ऊँट-ऊँटनी
जाट-जाटनी
भील-भीलनी
शब्दान्त में ’ई’ के स्थान पर ’इनी’ लगाकर –
हाथी-हथिनी
तपस्वी-तपस्विनी
स्वामी-स्वामिनी
’इन’ प्रत्यय लगाकर –
माली-मालिन
चमार-चमारिन
नाई-नाइन
कुम्हार-कुम्हारिन
धोबी-धोबिन
सुनार-सुनारिन
’आइन’ प्रत्यय लगाकर –
चौधरी – चौधराइन
ठाकुर-ठकुराइन
मुंशी -मुंशियाइन
शब्दान्त ’मान’ के स्थान पर ’मती’ लगाकर –
श्रीमान्-श्रीमती
बुद्धिमान-बुद्धिमती
आयुष्मान-आयुष्मती
शब्दान्त ’ता’ के स्थान पर ’त्री’ लगाकर –
कर्ता -कर्त्री
नेता-नेत्री
दाता-दात्री
शब्द के पूर्व में ’मादा’ शब्द लगाकर –
खरगोश-मादा खरगोश
भालू-मादा भालू
भेङिया-मादा भेङिया
भिन्न रूप वाले कतिपय शब्द –
कवि-कवयित्री
वर-वधू
वीर-वीरांगना
मर्द-औरत
दूल्हा-दुलहिन
नर-नारी
राजा-रानी
पुरुष-स्त्री
बादशाह-बेगम
युवक-युवती
विद्वान-विदुषी
साधु-साध्वी
बैल-गाय
भाई-भाभी
ससुर-सास
महत्त्वपूर्ण तथ्य –
शब्द के जिस रूप से उसकी जाति (नर-मादा) का बोध हो, वह लिंग है।
हिन्दी में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग का निर्धारण ’रूप या बनावट’ तथा ’अर्थ’ की दृष्टि से किया जाता है।
भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर व पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों का आदान-प्रदान करता है।
अथवा
जिसके द्वारा हम अपने भावों को लिखित अथवा कथित रूप से दूसरों को समझा सके और दूसरों के भावो को समझ सके उसे भाषा कहते है।
अथवा
सरल शब्दों में: सामान्यतः भाषा मनुष्य की सार्थक व्यक्त वाणी को कहते है।
मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुअों के विषय अपनी इच्छा और मति का आदान प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि-संकेतो का जो व्यवहार होता है, उसे भाषा कहते है।
भाषा के प्रकार
भाषा के तीन रूप होते है:
1.मौखिक भाषा
2.लिखित भाषा
3.सांकेतिक भाषा
मौखिक भाषा
विद्यालय में वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में वक्ताओं ने बोलकर अपने विचार प्रकट किए तथा श्रोताओं ने सुनकर उनका आनंद उठाया। यह भाषा का मौखिक रूप है। इसमें वक्ता बोलकर अपनी बात कहता है व श्रोता सुनकर उसकी बात समझता है।
इस प्रकार, भाषा का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति बोलकर विचार प्रकट करता है और दूसरा व्यक्ति सुनकर उसे समझता है, मौखिक भाषा कहलाती है।
दूसरे शब्दों में- जिस ध्वनि का उच्चारण करके या बोलकर हम अपनी बात दुसरो को समझाते है, उसे मौखिक भाषा कहते है।
उदाहरण: टेलीफ़ोन, दूरदर्शन, भाषण, वार्तालाप, नाटक, रेडियो आदि।
मौखिक या उच्चरित भाषा, भाषा का बोल-चाल का रूप है। उच्चरित भाषा का इतिहास तो मनुष्य के जन्म के साथ जुड़ा हुआ है। मनुष्य ने जब से इस धरती पर जन्म लिया होगा तभी से उसने बोलना प्रारंभ कर दिया होगा तभी से उसने बोलना प्रारंभ कर दिया होगा। इसलिए यह कहा जाता है कि भाषा मूलतः मौखिक है।
यह भाषा का प्राचीनतम रूप है। मनुष्य ने पहले बोलना सीखा। इस रूप का प्रयोग व्यापक स्तर पर होता है।
मौखिक भाषा की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं
यह भाषा का अस्थायी रूप है।
उच्चरित होने के साथ ही यह समाप्त हो जाती है।
वक्ता और श्रोता एक-दूसरे के आमने-सामने हों प्रायः तभी मौखिक भाषा का प्रयोग किया जा सकता है।
इस रूप की आधारभूत इकाई ‘ध्वनि’ है। विभिन्न ध्वनियों के संयोग से शब्द बनते हैं जिनका प्रयोग वाक्य में तथा विभिन्न वाक्यों का प्रयोग वार्तालाप में किया जाता हैं।
यह भाषा का मूल या प्रधान रूप हैं।
लिखित भाषा
मुकेश छात्रावास में रहता है। उसने पत्र लिखकर अपने माता-पिता को अपनी कुशलता व आवश्यकताओं की जानकारी दी। माता-पिता ने पत्र पढ़कर जानकारी प्राप्त की। यह भाषा का लिखित रूप है। इसमें एक व्यक्ति लिखकर विचार या भाव प्रकट करता है, दूसरा पढ़कर उसे समझता है।
इस प्रकार भाषा का वह रूप जिसमें एक व्यक्ति अपने विचार या मन के भाव लिखकर प्रकट करता है और दूसरा व्यक्ति पढ़कर उसकी बात समझता है, लिखित भाषा कहलाती है।
दूसरे शब्दों में- जिन अक्षरों या चिन्हों की सहायता से हम अपने मन के विचारो को लिखकर प्रकट करते है, उसे लिखित भाषा कहते है।
उच्चरित भाषा की तुलना में लिखित भाषा का रूप बाद का है। मनुष्य को जब यह अनुभव हुआ होगा कि वह अपने मन की बात दूर बैठे व्यक्तियों तक या आगे आने वाली पीढ़ी तक भी पहुँचा दे तो उसे लिखित भाषा की आवश्यकता हुई होगी। अतः मौखिक भाषा को स्थायित्व प्रदान करने हेतु उच्चरितध्वनि प्रतीकों के लिए ‘लिखित-चिह्नों’ का विकास हुआ होगा।
इस तरह विभिन्न भाषा-भाषी समुदायों ने अपनी-अपनी भाषिक ध्वनियों के लिए तरह-तरह की आकृति वाले विभिन्न लिखित-चिह्नों का निर्माण किया और इन्हीं लिखित-चिह्नों को ‘वर्ण’ (letter) कहा गया। अतः जहाँ मौखिक भाषा की आधारभूत इकाई ध्वनि (Phone) है तो वहीं लिखित भाषा की आधारभूत इकाई ‘वर्ण‘ (letter) हैं।
लिखित भाषा की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं
यह भाषा का स्थायी रूप है।
इस रूप में हम अपने भावों और विचारों को अनंत काल के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।
यह रूप यह अपेक्षा नहीं करता कि वक्ता और श्रोता आमने-सामने हों।
इस रूप की आधारभूत इकाई ‘वर्ण’ हैं जो उच्चरित ध्वनियों को अभिव्यक्त (represent) करते हैं।
यह भाषा का गौण रूप है।
इस तरह यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि भाषा का मौखिक रूप ही प्रधान या मूल रूप है। किसी व्यक्ति को यदि लिखना-पढ़ना (लिखित भाषा रूप) नहीं आता तो भी हम यह नहीं कह सकते कि उसे वह भाषा नहीं आती। किसी व्यक्ति को कोई भाषा आती है, इसका अर्थ है- वह उसे सुनकर समझ लेता है तथा बोलकर अपनी बात संप्रेषित कर लेता है।
सांकेतिक भाषा
जिन संकेतो के द्वारा बच्चे या गूँगे अपनी बात दूसरों को समझाते है, वे सब सांकेतिक भाषा कहलाती है।
दूसरे शब्दों में- जब संकेतों (इशारों) द्वारा बात समझाई और समझी जाती है, तब वह सांकेतिक भाषा कहलाती है।
जैसे- चौराहे पर खड़ा यातायात नियंत्रित करता सिपाही, मूक-बधिर व्यक्तियों का वार्तालाप आदि।
इसका अध्ययन व्याकरण में नहीं किया जाता।
बोली और भाषा में अन्तर क्या है
बोली और भाषा में अन्तर है। भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है। भाषा में लिखित और मौखिक दोनों रूप होते हैं। बोली भाषा का ऐसा रूप है जो किसी छोटे क्षेत्र में बोला जाता है। जब बोली इतनी विकसित हो जाती है कि वह किसी लिपि में लिखी जाने लगे, उसमें साहित्य-रचना होने लगे और उसका क्षेत्र भी अपेक्षाकृत विस्तृत हो जाए तब उसे भाषा कहा जाता है।
हिन्दी भाषा
बहुत सारे विद्वानों का मत है कि हिन्दी भाषा संस्कृत से निष्पन्न है; परन्तु यह बात सत्य नहीं है। हिन्दी की उत्पत्ति अपभ्रंश भाषाओं से हुई है और अपभ्रंश की उत्पत्ति प्राकृत से। प्राकृत भाषा अपने पहले की पुरानी बोलचाल की संस्कृत से निकली है।
स्पष्ट है कि हमारे आदिम आर्यों की भाषा पुरानी संस्कृत थी। उनके नमूने ऋग्वेद में दिखते हैं। उसका विकास होते-होते कई प्रकार की प्राकृत भाषाएँ पैदा हुई। हमारी विशुद्ध संस्कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई है। प्राकृत भाषाओं के बाद अपभ्रशों और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है।
हिन्दी भाषा और उसका साहित्य किसी एक विभाग और उसके साहित्य के विकसित रूप नहीं हैं; वे अनेक विभाषाओं और उनके साहित्यों की समष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं।
एक बहुत बड़े क्षेत्र- जिसे चिरकाल से मध्यदेश कहा जाता रहा है- की अनेक बोलियों के ताने-बाने से बुनी यही एक ऐसी आधुनिक भाषा है, जिसने अनजाने और अनौपचारिक रीति से देश की ऐसी व्यापक भाषा बनने का प्रयास किया था, जैसी संस्कृत रहती चली आई थी; किन्तु जिसे किसी नवीन भाषा के लिए अपना स्थान तो रिक्त करना ही था।
वर्तमान हिन्दी भाषा का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक हो चला। है इसे निम्नलिखित विभागों में बाँटा गया हैं-
बिहारी भाषा : बिहारी भाषा बँगला भाषा से अधिक संबंध रखती है। यह पूर्वी उपशाखा के अंतर्गत है और बँगला, उड़िया और आसामी की बहन लगती है। इसके अंतर्गत निम्न बोलियाँ हैं- मैथली, मगही, भोजपुरी, पूर्वी आदि। मैथली के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ठाकुर और भोजपुरी के बहुत बड़े प्रचारक भिखारी ठाकुर हुए।
पूर्वी हिन्दी : अर्द्धमागधी प्राकृत के अप्रभ्रंश से पूर्वी हिन्दी निकली है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसे महाकाव्यों की रचना पूर्वी हिन्दी में ही की। दूसरी तीन बोलियाँ हैं- अवध, बघेली और छत्तीसगढ़ी। मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी प्रसिद्ध रचनाएँ इसी भाषा में लिखी हैं।
पश्चिमी हिन्दी : पूर्वी हिन्दी तो बाहरी और भीतरी दोनों शाखाओं की भाषाओं के मेल से बनी हैं; परन्तु पश्चिमी हिन्दी का संबंध भीतरी शाखा से है।
जो शब्दांश किसी शब्द के बाद लगकर उसके अर्थ को बदल देते हैं और नए अर्थ का बोध कराते हैं उसे प्रत्यय कहते हैं। भाषा में प्रत्यय का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि उसके प्रयोग से मूल शब्द के अनेक अर्थों को प्राप्त किया जा सकता है। यौगिक शब्द बनाने में प्रत्यय का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
प्रत्यय के उदाहरण –
खिल + आङी
खिलाङी
मिल + आवट
मिलावट
पढ़ + आकू
पढ़ाकू
झूल + आ
झूला
प्रत्यय तीन प्रकार–
संस्कृत प्रत्यय
हिन्दी प्रत्यय
विदेशी प्रत्यय
हिन्दी प्रत्यय के दो प्रकार होते है –
कृत् प्रत्यय
तद्धित प्रत्यय
संस्कृत प्रत्यय –
जैसे –
इत
हर्षित, गर्वित, लज्जित, पल्लवित
इक
मानसिक, धार्मिक, मार्मिक, पारिश्रमिक
ईय
भारतीय, मानवीय, राष्ट्रीय, स्थानीय
एय
आग्नेय, पाथेय, राधेय, कौंतेय
तम
अधिकतम, महानतम, वरिष्ठतम, श्रेष्ठतम
वान्
धनवान, बलवान, गुणवान, दयावान
मान्
श्रीमान्, शोभायमान, शक्तिमान, बुद्धिमान
त्व
गुरुत्व, लघुत्व, बंधुत्व, नेतृत्व
शाली
वैभवशाली, गौरवशाली, प्रभावशाली, शक्तिशाली
तर
श्रेष्ठतर, उच्चतर, निम्नतर, लघूत्तर
हिन्दी प्रत्यय –
हिंदी प्रत्यय मुख्यतया दो प्रकार के होते है –
कृत् प्रत्यय
तद्धित प्रत्यय
कृत् प्रत्यय
वे प्रत्यय जो धातु अथवा क्रिया के अन्त में लगकर नए शब्दों की रचना करते उन्हें कृत् प्रत्यय कहते हैं। कृत् प्रत्ययों से संज्ञा तथा विशेषण शब्दों की रचना होती है।
संज्ञा की रचना करने वाले कृत प्रत्यय –
कृत प्रत्यय उदाहरण –
न
बेलन, बंधन, नंदन, चंदन
ई
बोली, सोची, सुनी, हँसी
आ
झूला, भूला, खेला, मेला
अन
मोहन, रटन, पठन
आहट
चिकनाहट, घबराहट, चिल्लाहट
जैसे –विशेषण की रचना करने वाले कृत प्रत्यय –
आङी
खिलाङी, अगाङी, अनाङी, पिछाङी
एरा
लुटेरा, बसेरा
आऊ
बिकाऊ, टिकाऊ, दिखाऊ
ऊ
डाकू, चाकू, चालू, खाऊ
कृत् प्रत्यय के भेद
कृत् वाचक
कर्म वाचक
करण वाचक
भाव वाचक
क्रिया वाचक
कृत् वाचक –
कर्ता का बोध कराने वाले प्रत्यय कृत् वाचक प्रत्यय कहलाते है।
कृत् वाचक प्रत्यय उदाहरण –
हार
पालनहार, चाखनहार, राखनहार
वाला
रखवाला, लिखनेवाला, पढ़नेवाला
क
रक्षक, भक्षक, पोषक, शोषक
अक
लेखक, गायक, पाठक, नायक
ता
दाता, माता, गाता, नाता
कर्म वाचक कृत् प्रत्यय –
कर्म का बोध कराने वाले कृत् प्रत्यय कर्म वाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
कर्म वाचक कृत् प्रत्यय उदाहरण :
औना
खिलौना, बिछौना
नी
ओढ़नी, मथनी, छलनी
ना
पढ़ना, लिखना, गाना
करण वाचक कृत् प्रत्यय –
साधन का बोध कराने वाले कृत् प्रत्यय करण वाचक कृत प्रत्यय कहलाते हैं।
करण वाचक कृत प्रत्यय उदाहरण :
अन
पालन, सोहन, झाङन
नी
चटनी, कतरनी, सूँघनी
ऊ
झाडू, चालू
ई
खाँसी, धाँसी, फाँसी
भाव वाचक कृत् प्रत्यय –
क्रिया के भाव का बोध कराने वाले प्रत्यय भाववाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
भाववाचक कृत् प्रत्यय उदाहरण :
आप
मिलाप, विलाप
आवट
सजावट, मिलावट, लिखावट
आव
बनाव, खिंचाव, तनाव
आई
लिखाई, खिंचाई, चढ़ाई
क्रियावाचक कृत् प्रत्यय –
क्रिया शब्दों का बोध कराने वाले कृत् प्रत्यय क्रिया वाचक कृत प्रत्यय कहलाते हैं
क्रिया वाचक कृत प्रत्यय उदाहरण :
या
आया, बोया, खाया
कर
गाकर, देखकर, सुनकर
आ
सूखा, भूला
ता
खाता, पीता, लिखता
तद्धित प्रत्यय –
क्रिया को छोङकर संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि में जुङकर नए शब्द बनाने वाले प्रत्यय तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
तद्धित प्रत्यय उदाहरण –
मानव + ता
मानवता
जादू + गर
जादूगर
बाल +पन
बालपन
लिख + आई
लिखाई
तद्धित प्रत्यय के भेद
कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय
भाववाचक तद्धित प्रत्यय
सम्बन्ध वाचक तद्धित प्रत्यय
गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय
ऊनतावाचक तद्धित प्रत्यय
स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय
कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय –
कर्ता का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय कर्तृवाचक तद्धति प्रत्यय कहलाते हैं।
कर्तृवाचक तद्धति प्रत्यय उदाहरण :
आर
सुनार, लुहार, कुम्हार
ई
माली, तेली
वाला
गाङीवाला, टोपीवाला, इमलीवाला
भाववाचक तद्धित प्रत्यय –
भाव का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
भाववाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :
आहट
कङवाहट
ता
सुन्दरता, मानवता, दुर्बलता
आपा
मोटापा, बुढ़ापा, बहनापा
ई
गर्मी, सर्दी, गरीबी
सम्बन्ध वाचक तद्धित प्रत्यय –
सम्बन्ध का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय सम्बन्ध वाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
सम्बन्ध वाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :
इक
शारीरिक, सामाजिक, मानसिक
आलु
कृपालु, श्रद्धालु, ईर्ष्यालु
ईला
रंगीला, चमकीला, भङकीला
तर
कठिनतर, समानतर, उच्चतर
गुणवाचक तद्धित प्रत्यय –
गुण का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय गुणवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
गुणवाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :
वान
गुणवान, धनवान, बलवान
ईय
भारतीय, राष्ट्रीय, नाटकीय
आ
सूखा, रूखा, भूखा
ई
क्रोधी, रोगी, भोगी
स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय –
स्थान का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :
वाला
शहरवाला, गाँववाला, कस्बेवाला
इया
उदयपुरिया, जयपुरिया, मुंबइया
ई
रूसी, चीनी, राजस्थानी
ऊनतावाचक तद्धित प्रत्यय –
लघुता का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय ऊनतावाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
जैसे –
इया
लुटिया
ई
प्याली, नाली, बाली
ङी
चमङी, पकङी
ओला
खटोला, संपोला, मंझोला
स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय –
स्त्रीलिंग का बोध कराने वाले तद्धित प्रत्यय स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
स्त्रीवाचक तद्धित प्रत्यय उदाहरण :
आइन
पंडिताइन, ठकुराइन
इन
मालिन, कुम्हारिन, जोगिन
नी
मोरनी, शेरनी, नन्दनी
आनी
सेठानी, देवरानी, जेठानी
उर्दू के प्रत्यय
उर्दू भाषा का हिन्दी के साथ लम्बे समय तक प्रचलन में रहने के कारण हिन्दी भाषा में उर्दू भाषा प्रत्यय भी प्रयोग में आने लगे हैं।